चतुर्दश पुतली तारामती: असत्य का नगर, मणिक-व्यापारी का संताप और सत्य-दर्पण का न्याय
The Fourteenth Statue: Taramati & The Mirror of Truth
चतुर्दश सूर्योदय और तारामती का प्रबोधन
The Fourteenth Dawn & Taramati
चौदहवें प्रभात की स्वर्णिम किरणों ने धारानगरी के राजप्रासाद को आलोकित किया, जहाँ राजा भोज ने पूर्ण निष्ठा से अपनी साधना पूर्ण की।

केसरिया परिधान धारण कर राजा भोज विनीत चरणों से चौदहवीं सीढ़ी की ओर बढ़े।

जैसे ही राजा का चरण चौदहवीं सीढ़ी के निकट पहुँचा, मणिक वेदी तारक-रजत और स्वर्णिम दिव्य प्रकाश से प्रदीप्त हो उठी!

चौदहवीं कांस्य-पुतली—तारामती—की तारक-नेत्र खुले और वह सत्य-दर्पण हाथ में लिए दिव्य हँसी के साथ सजीव हो उठी!
ठहरो, राजा भोज! इस चौदहवीं सीढ़ी पर कदम रखने का दुस्साहस मत करो!

राजा भोज ने नतमस्तक होकर हाथ जोड़े और सत्य-दर्पण धारण की हुई पुतली की ओर देखा।
हे तारामती देवि! विक्रमादित्य के किस गुप्तचर साहस और सत्य-दर्पण के न्याय की गाथा आज आप मुझे सुनाना चाहती हैं?

तारामती ने सत्य-दर्पण उठाकर गम्भीर वाणी में कहा:
क्या तुममें विक्रमादित्य जैसा गुप्तचर साहस और सूक्ष्म न्याय-बुद्धि है, जब कूटमणि नगरी के धूर्त स्वर्णकारों और भ्रष्ट न्यायाधीशों ने एक निर्दोष व्यापारी के अनमोल रत्न लूट लिए, और विक्रमादित्य ने छद्मवेश में जाकर सूर्य-दर्पण से पूरे षड्यन्त्र को उघाड़ दिया?
ताम्रलिप्ति के मणिक-व्यापारी की व्यथा और सात पद्मराग मणियाँ
The Swindled Gem Merchant of Tamralipti
उज्जयिनी के सभागार में ताम्रलिप्ति का प्रतिष्ठित मणिक-व्यापारी मणिभद्र फूट-फूट कर रोते हुए सम्राट विक्रमादित्य के सम्मुख उपस्थित हुआ।

मणिभद्र ने बताया कि सीमांत व्यापारिक नगर 'कूटमणि नगरी' (असत्य का नगर) में धूर्त स्वर्णकारों और भ्रष्ट अधिकारियों ने मिलकर उसकी सात अनमोल पद्मराग मणियाँ चुरा लीं!
महाराज! उस नगर में हर गवाह बिकाऊ है और हर न्यायाधीश हिस्सेदार! उन्होंने मेरे असली रत्न बदलकर काँच के पत्थर रख दिए और मुझे कंगाल कर बाहर फेंक दिया!

वे सातों पद्मराग मणियाँ इतनी कान्तिमान थीं कि घने अन्धकार में भी दीपक की भाँति लाल प्रकाश बिखेरती थीं।

कूटमणि नगरी की गुप्त मदिराशाला में स्वर्णकार सुवर्णदत्त और नगर-दण्डाधिकारी ने आधी रात को बक्से का ताला खोलकर असली रत्नों की जगह लाल काँच के मनके रख दिए थे।

जब व्यापारी ने न्यायालय में गुहार लगाई, तो भ्रष्ट न्यायाधीश ने बीस झूठे गवाह खड़े कर उल्टे व्यापारी पर दस हज़ार दीनार का जुरमाना ठोक दिया!

विक्रमादित्य ने अचल संकल्प लिया: 'असत्य के गढ़ में भी धर्म की विजय होगी! मैं स्वयं कूटमणि नगरी जाऊँगा!'
धैर्य रखो, मणिभद्र! तुम्हारे सातों रत्न ससम्मान तुम्हें वापस मिलेंगे!
हीरकवर्धन का छद्मवेश और कूटमणि नगरी में प्रवेश
The Emperor
दक्षिण के धनी, अनुभवहीन युवा हीरक-व्यापारी 'हीरकवर्धन' का वेश बनाकर विक्रमादित्य सजे-धजे ऊँट पर कूटमणि नगरी पहुँचे।

कूटमणि नगरी के बाज़ारों में कपटी व्यापारी और षड्यन्त्रकारी पहरेदार नए शिकार की ताक में रहते थे।

स्वर्णकार सुवर्णदत्त ने उस युवा सेठ की मणियों से जड़ी लोहे की तिजोरी देखकर मीठी बातों का जाल बिछाया।
पधारिए, सेठ जी! हमारे नगर की सुरक्षा-तिजोरी में अपने अनमोल रत्न सुरक्षित रखिए!

षड्यन्त्रकारियों ने नगर की सबसे भव्य धर्मशाला में विक्रमादित्य को स्वादिष्ट भोज और सुरा अर्पित कर असावधान करने का प्रयास किया।

मध्यरात्रि को दीपक के मन्द प्रकाश में सुवर्णदत्त ने तिजोरी खोलकर असली हीरे निकाल लिए और सीसे के टुकड़े व काँच के मनके भर दिए!

ऊपर अन्धकार में छिपे विक्रमादित्य ने पूरी चोरी को अपनी आँखों से देखा और मन्द मुस्कान से सिर हिलाया। जाल पूरा बिछ चुका था!
लोभ ने तुम्हारे विवेक को अन्धा कर दिया है; कल सूर्योदय के साथ तुम्हारा कपट खुलेगा!
नगर-न्यायालय का षड्यन्त्र और सूर्य-सत्य दर्पण का प्राकट्य
The Courtroom Trap & The Solar Truth Mirror
अगले दिन प्रातःकाल नगर-न्यायालय में विक्रमादित्य ने अपनी तिजोरी से असली हीरे गायब होने की शिकायत दर्ज कराई।

सुवर्णदत्त और भ्रष्ट न्यायाधीश ने ठहाका लगाया और बीस झूठे गवाह खड़े कर दिए जिन्होंने शपथ खाई कि सेठ केवल घटिया काँच लाया था!
तुम्हारा दावा झूठा है! तुमने नगर की तिजोरी का अपमान किया है!

छद्मवेशी विक्रमादित्य ने मन्द मुस्कान के साथ कहा: 'जब मनुष्य के मुख झूठे हो जाएँ, तो वैदिक सूर्य-सत्य दर्पण से न्याय कराया जाए!'

विक्रमादित्य ने सूर्य-मन्त्रों से अभिमन्त्रित एक विशाल, गोल उत्तल कांस्य-दर्पण (ज्योतिर्-दर्पण) वेदी पर स्थापित किया!

विक्रमादित्य ने रहस्य बताया: 'सच्चा हीरा सूर्य की धूप में इस दर्पण के सामने श्वेत अग्नि बिखेरता है, जबकि काँच और सीसा काली धूसर छाया फेंकते हैं!'
यदि तुम्हारी तिजोरी के पत्थर सच्चे हैं, तो उन्हें इस दर्पण के सम्मुख रखो!

हज़ारों की संख्या में उपस्थित नागरिक दम साधे खड़े हो गए; धूप की किरणें सीधे दर्पण पर चमक रही थीं।
सूर्य का प्रकाश अब सत्य और कपट का निर्णय करेगा!
सत्य का विस्फोट, सम्राट का प्राकट्य और कूटमणि का उद्धार
The Chemical Exposure & Syndicate Dismantled
काँपते हाथों से सुवर्णदत्त ने काँच के पत्थर दर्पण के सामने रखे; उनसे काली, गन्दली धुएँ जैसी छाया निकली और कोई तेज नहीं फूटा!
यह... यह कैसे हो सकता है?!

विक्रमादित्य ने दण्डाधिकारी की गुप्त थैली से असली रत्न निकालकर दर्पण के सम्मुख किए; प्रचण्ड श्वेत सूर्य-प्रकाश के बाणों से पूरा न्यायालय जगमगा उठा!

विक्रमादित्य ने अपना छद्मवेश उतार फेंका; मस्तक पर लाल-स्वर्णिम पगड़ी और हाथ में चक्रवर्ती गरुड़-मुद्रा चमक उठी!
मैं उज्जयिनी का सम्राट विक्रमादित्य हूँ! असत्य के इस गढ़ का आज अन्त होगा!

सम्राट का नाम सुनते ही सुवर्णदत्त और भ्रष्ट न्यायाधीश भय से मूर्च्छित होकर चरणों में गिर पड़े और सारा षड्यन्त्र स्वीकार कर लिया।

विक्रमादित्य ने अपराधियों को कारागार भेजा और व्यापारी मणिभद्र को उसके सातों पद्मराग रत्न व बीस हज़ार दीनार क्षतिपूर्ति दिलवाई।
महाराज! आपने असत्य के नगर को धर्म का धाम बना दिया!

कूटमणि नगरी की प्रजा ने पुष्प-वर्षा के साथ धर्म के सूर्य चक्रवर्ती विक्रमादित्य का महा-उत्सव मनाया।
तारामती का निर्णय और राजा भोज का संकोच
Taramati
धारानगरी के सभा-भवन में सजीव पुतली तारामती ने राजा भोज को गम्भीर रजत-नयनों से देखा।

तारामती ने चौदहवीं सीढ़ी की चुनौती दी:
अब कहो, राजा भोज—क्या तुमने कभी प्रजा की रक्षा हेतु अकेले छद्मवेश में असत्य के गढ़ में प्रविष्ट होकर सत्य-दर्पण से कपट का अन्त किया है? यदि ऐसा अदम्य साहस तुममें है, तो कदम बढ़ाओ! अन्यथा लौट जाओ!

राजा भोज ने लज्जा और श्रद्धा से सिर झुका लिया:
मुझमें विक्रमादित्य जैसा गुप्तचर साहस और सत्य-दर्पण से कपट को भेदने का वैज्ञानिक विवेक नहीं है, देवि। मैं इस चौदहवीं सीढ़ी के भी योग्य नहीं हूँ।

राजा भोज चौदहवीं सीढ़ी से नीचे उतरे और धारानगरी तथा पूरे मालवा के बाज़ारों में स्वतंत्र व्यापार-निरीक्षण और उपभोक्ता संरक्षण न्यायालय स्थापित करने का आदेश दिया।

राज्य-भर में व्यापारियों और ग्राहकों के अधिकारों की रक्षा हेतु प्रामाणिक माप-तोल मण्डलों का गठन हुआ।

संध्याकाल के शंख गूँज उठे और तारामती मन्द मुस्कान के साथ पुनः मौन कांस्य-प्रतिमा बन गई। **सिंहासन बत्तीसी का चौदहवाँ दिन सम्पन्न हुआ!**

शेष अठारह कांस्य-पुतलियाँ सन्ध्या की मशालों में जगमगाती रहीं, पंद्रहवीं पुतली की अमर गाथा की प्रतीक्षा करते हुए।

राजा भोज धर्म और निष्पक्ष न्याय के अमर आदर्शों से प्रेरित होकर मौन भाव से राजसभा से प्रस्थान कर गए।
कल प्रातःकाल हम पंद्रहवीं सीढ़ी पर कदम रखेंगे और पंद्रहवीं पुतली—कमलिनी—की अमर गाथा सुनेंगे!