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एकत्रिंशत् पुतली सुलक्षणा: शिव-पार्वती का ताण्डव-लास, सहस्र सुवर्ण-नूपुर और निष्काम भक्ति-वरदान

सिंहासन बत्तीसी (३२ पुतलियों की अमर गाथा)• katha

एकत्रिंशत् पुतली सुलक्षणा: शिव-पार्वती का ताण्डव-लास, सहस्र सुवर्ण-नूपुर और निष्काम भक्ति-वरदान

The Thirty-First Statue: Sulakshana & The Cosmic Dance of Shiva

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दृश्य 1

इकतीसवाँ सूर्योदय और सुलक्षणा का प्रबोधन

The Thirty-First Dawn & Sulakshana
Morning sunlight streams across the sandstone colonnade onto the 32-step golden throne

इकतीसवें प्रभात की स्वर्णिम किरणों ने धारानगरी के राजप्रासाद को आलोकित किया, जहाँ राजा भोज ने पूर्ण निष्ठा से अपनी साधना पूर्ण की।

Panel 1
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King Bhoja in sacred saffron silks approaches the thirty-first step of the throne

केसरिया परिधान धारण कर राजा भोज विनीत चरणों से इकतीसवीं सीढ़ी की ओर बढ़े।

Panel 2
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The marble dais erupts with brilliant cosmic-amethyst and celestial-golden radiance

जैसे ही राजा का चरण इकतीसवीं सीढ़ी के निकट पहुँचा, मणिक वेदी ब्रह्माण्डीय जामुनी और दिव्य-स्वर्णिम प्रकाश से प्रदीप्त हो उठी!

Panel 3
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The thirty-first carved statue Sulakshana opens her glowing amethyst eyes, laughing musically
पुतली सुलक्षणा
ठहरो, राजा भोज! इस इकतीसवीं सीढ़ी पर कदम रखने का दुस्साहस मत करो!

इकतीसवीं कांस्य-पुतली—सुलक्षणा (कौशल्या-द्वितीया)—की जामुनी-नयन खुले और वह सुवर्ण-त्रिशूल व बजते सुवर्ण-नूपुर हाथ में लिए दिव्य हँसी के साथ सजीव हो उठी!

पुतली सुलक्षणा

ठहरो, राजा भोज! इस इकतीसवीं सीढ़ी पर कदम रखने का दुस्साहस मत करो!

Panel 4
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King Bhoja halts in deep reverence with folded hands, gazing at the living bronze maiden
राजा भोज
हे सुलक्षणा देवि! विक्रमादित्य के किस अद्वैत-ज्ञान और शिव-शक्ति के साक्षात दर्शन की अमर गाथा आज आप मुझे सुनाना चाहती हैं?

राजा भोज ने नतमस्तक होकर हाथ जोड़े और त्रिशूल धारण की हुई पुतली की ओर देखा।

राजा भोज

हे सुलक्षणा देवि! विक्रमादित्य के किस अद्वैत-ज्ञान और शिव-शक्ति के साक्षात दर्शन की अमर गाथा आज आप मुझे सुनाना चाहती हैं?

Panel 5
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Sulakshana speaks: 'Do you possess the fearless spiritual wisdom of Vikramaditya?'
पुतली सुलक्षणा
क्या तुममें विक्रमादित्य जैसा निर्भय अद्वैत-विवेक और परा-भक्ति का तेज है, जब उन्होंने महाशिवरात्रि की आधी रात में महाकाल के श्मशान में शिव-पार्वती के ताण्डव-लास का साक्षात् दर्शन किया, बिना किसी भय के दिव्य नृत्य का न्याय किया और धर्म-संरक्षण का अमर वरदान प्राप्त किया?

सुलक्षणा ने सुवर्ण-त्रिशूल उठाकर गम्भीर वाणी में कहा:

पुतली सुलक्षणा

क्या तुममें विक्रमादित्य जैसा निर्भय अद्वैत-विवेक और परा-भक्ति का तेज है, जब उन्होंने महाशिवरात्रि की आधी रात में महाकाल के श्मशान में शिव-पार्वती के ताण्डव-लास का साक्षात् दर्शन किया, बिना किसी भय के दिव्य नृत्य का न्याय किया और धर्म-संरक्षण का अमर वरदान प्राप्त किया?

Panel 6
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दृश्य 2

महाशिवरात्रि की निशीथ वेला और महाकाल का महा-श्मशान

The Midnight Pilgrimage to Mahakaleshwar
On the sacred night of Maha Shivaratri in ancient Ujjayini, stars glitter over Shipra temples

महाशिवरात्रि के परम पावन पर्व पर उज्जयिनी की शिप्रा नदी के तटवर्ती मन्दिरों पर आकाश के तारे मुकुट के समान जगमगा रहे थे।

Panel 7
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Dressed in simple ascetic white cotton, Vikramaditya walks barefoot through silent streets

सम्राट विक्रमादित्य ने राजसी वस्त्र त्यागकर श्वेत सूती चादर ओढ़ी और नंगे पाँव महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग की ओर प्रस्थान किया।

Panel 8
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Leaving all guards behind, Vikramaditya enters the ancient Maha-Smashana

सारे अंगरक्षकों को पीछे छोड़ सम्राट अकेले ही महा-श्मशान के निर्जन प्रांगण में प्रवेश कर गए, जहाँ केवल शान्त भस्म और बेलपत्र बिखरे थे।

Panel 9
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Suddenly, the air hums with the profound vibration of the cosmic Anahata-Nada sound

अचानक वायुमण्डल में 'अनाहत-नाद' (ॐ) की प्रचण्ड ब्रह्माण्डीय ध्वनि गूँज उठी, जिसने सम्पूर्ण दिशाओं को आलोकित कर दिया!

Panel 10
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The dark cremation ground miraculously transforms into a luminous crystal arena

अन्धकारमय श्मशान भूमि पल भर में स्फटिक-मणिक ब्रह्माण्डीय रंगमंच में परिवर्तित हो गई, जो तारों के बीच तैर रहा था!

Panel 11
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In a burst of cosmic brilliance, Lord Shiva and Goddess Parvati manifest
भगवान् शिव
ॐ नमः शिवाय!

दिव्य प्रकाश के मध्य देवाधिदेव भगवान् शिव नटराज और जगज्जननी माँ पार्वती अपने साक्षात् ब्रह्माण्डीय रूपों में प्रकट हुए!

भगवान् शिव

ॐ नमः शिवाय!

Panel 12
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दृश्य 3

शिव का प्रचण्ड ताण्डव और माँ पार्वती का मनोहर लास्य

The Cosmic Tandava & Lasya Dance
Lord Shiva begins the furious cosmic Tandava dance, Damaru beating thunder
भगवान् शिव
डिम-डिम-डिम! डमरू का नाद ही सृष्टि का सत्य है!

भगवान् शिव ने डमरू की प्रचण्ड गूँज के साथ 'रुद्र-ताण्डव' आरम्भ किया; उनके पैरों के आघात से ब्रह्माण्ड के अहंकार का संहार होने लगा!

भगवान् शिव

डिम-डिम-डिम! डमरू का नाद ही सृष्टि का सत्य है!

Panel 13
•
Goddess Parvati dances the graceful Lasya in counter-rhythm, her lotus-feet showering blossoms
माँ पार्वती
यह लास्य चराचर में अमृत और प्रेम का संचार करता है!

प्रत्युत्तर में जगदम्बा पार्वती ने अमृतमयी 'लास्य-नृत्य' किया, जिनके कोमल चरण-कमलों से सृष्टि में जीवन, रस और पुष्पों की वर्षा होने लगी!

माँ पार्वती

यह लास्य चराचर में अमृत और प्रेम का संचार करता है!

Panel 14
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Heavenly Gandharvas play ethereal veenas in the starry sky as dance reaches infinite speed

आकाश में गन्धर्वों और किन्नरों की वीणाएँ बज उठीं; नृत्य की गति और लय अनन्त की पराकाष्ठा पर पहुँच गई!

Panel 15
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The furious power of Shiva and tender grace of Parvati merge into a breathtaking vortex

शिव का प्रचण्ड संहारक तेज और शक्ति का करुणामयी सृजक माधुर्य एक अविभाज्य दिव्य सन्तुलन में एकाकार हो गए!

Panel 16
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Both Shiva and Parvati pause simultaneously at the peak of rhythm, their eyes meeting

ताल के चरमोत्कर्ष पर शिव और पार्वती दोनों एक साथ स्थिर हो गए; दोनों के नयन दिव्य प्रेम और सन्तुलन में मुस्कुराए।

Panel 17
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Lord Shiva turns toward the shadows, spotting the mortal Emperor: 'Judge our dance without fear!'
भगवान् शिव
आगे आओ, उज्जयिनी-नरेश! तुम नाट्यशास्त्र और आत्म-तत्व के ज्ञाता हो! निष्पक्ष होकर निर्णय दो—हम दोनों में से किसका नृत्य श्रेष्ठ था?

महादेव ने छाया में खड़े समाधिस्थ सम्राट विक्रमादित्य को देखकर गम्भीर वाणी में पुकारा:

भगवान् शिव

आगे आओ, उज्जयिनी-नरेश! तुम नाट्यशास्त्र और आत्म-तत्व के ज्ञाता हो! निष्पक्ष होकर निर्णय दो—हम दोनों में से किसका नृत्य श्रेष्ठ था?

Panel 18
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दृश्य 4

सम्राट का अद्वैत-न्याय और अर्धनारीश्वर का पावन रहस्य

The Sovereign
Vikramaditya walks forward, prostrating with full devotion before the feet of the Divine Couple

सम्राट विक्रमादित्य आगे बढ़े और साष्टाङ्ग दण्डवत् प्रणाम कर जगत्-माता-पिता के युगल चरणों में अपना मस्तक रख दिया।

Panel 19
•
Celestial gods in the sky watch with bated breath to see how a mortal king can judge

आकाश में देवता भयभीत थे; शिव को श्रेष्ठ कहें तो शक्ति रुष्ट होंगी, शक्ति को श्रेष्ठ कहें तो शिव रुष्ट होंगे!

Panel 20
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Vikramaditya speaks: 'Lord Shiva is Purusha—the eternal silence beneath all creation'
सम्राट विक्रमादित्य
शिव का ताण्डव मोह को भस्म करने वाला सत्य है!

विक्रमादित्य ने हाथ जोड़कर अद्वैत-दर्शन की अमृत वाणी में कहा: 'हे देवाधिदेव! भगवान् शिव साक्षात् 'पुरुष' हैं—सृष्टि और प्रलय के आधार में स्थित शाश्वत मौन!'

सम्राट विक्रमादित्य

शिव का ताण्डव मोह को भस्म करने वाला सत्य है!

Panel 21
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Vikramaditya explains: 'Mother Parvati is Prakriti—the dynamic cosmic grace'
सम्राट विक्रमादित्य
माँ पार्वती का लास्य चराचर को अमृत प्रदान करने वाली ममता है!

'और माँ पार्वती साक्षात् 'प्रकृति' हैं—वह दिव्य शक्ति और करुणा जिसके द्वारा सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड साँस लेता और आनन्दित होता है!'

सम्राट विक्रमादित्य

माँ पार्वती का लास्य चराचर को अमृत प्रदान करने वाली ममता है!

Panel 22
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'Tandava and Lasya are inseparable like fire and heat; you are the unbroken Ardhanarishvara!'
सम्राट विक्रमादित्य
दोनों का नृत्य एक ही ब्रह्म की दो आँखें हैं!

'ताण्डव और लास्य को अलग करना अग्नि से उसकी दाहकता या शब्द से उसके अर्थ को अलग करने जैसा असम्भव है! आप दोनों साक्षात् अखण्ड **अर्धनारीश्वर** हैं!'

सम्राट विक्रमादित्य

दोनों का नृत्य एक ही ब्रह्म की दो आँखें हैं!

Panel 23
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Both Lord Shiva and Mother Parvati smile in profound divine delight at the King's wisdom

इस अद्वितीय अद्वैत-सत्य को सुनकर भगवान् शिव और माँ पार्वती के मुखमण्डल पर अगाध आनन्द की दिव्य मुस्कान खिल उठी!

Panel 24
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दृश्य 5

सुवर्ण-नूपुर का उपहार, शिव का वरदान और निष्काम प्रार्थना

The Boon of the Golden Bells & Divine Protection
Goddess Parvati takes off her golden singing ankle-bells, placing them in Vikramaditya's hands

जगदम्बा पार्वती ने अपने चरण-कमलों से बजते हुए 'सहस्र सुवर्ण-नूपुर' उतारे और स्नेहपूर्वक सम्राट विक्रमादित्य को प्रदान किए।

Panel 25
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Mother Parvati blesses: 'Whenever these bells chime, truth and justice shall reign!'
माँ पार्वती
तुम्हारी प्रजा कभी अन्याय का दुःख नहीं भोगेगी, वत्स!

माँ पार्वती ने आशीर्वाद दिया: 'जब तक ये नूपुर तुम्हारे पास रहेंगे, तुम्हारे राज्य में सत्य, समृद्धि और निष्कलंक न्याय का साम्राज्य रहेगा!'

माँ पार्वती

तुम्हारी प्रजा कभी अन्याय का दुःख नहीं भोगेगी, वत्स!

Panel 26
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Lord Shiva touches the Emperor's head with his trident: 'Your name shall stand for Dharma!'
भगवान् शिव
माँग लो, विक्रमादित्य! अपने लिए जो चाहो!

महादेव ने त्रिशूल से सम्राट के मस्तक को स्पर्श किया: 'तुम्हारा नाम तीनों लोकों में न्याय और धर्म का अमर पर्याय बनेगा; यह बत्तीस पुतलियों का सुवर्ण-सिंहासन सदा तुम्हारी कीर्ति गाएगा!'

भगवान् शिव

माँग लो, विक्रमादित्य! अपने लिए जो चाहो!

Panel 27
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Vikramaditya prays: 'Grant only that my mind never wavers from Dharma!'
सम्राट विक्रमादित्य
धर्म ही मेरा जीवन और प्रजा ही मेरा परिवार है!

सम्राट ने हाथ जोड़कर कहा: 'हे भोलेनाथ! मुझे कोई व्यक्तिगत धन या भोग नहीं चाहिए; केवल इतना वर दीजिए कि मेरी मति कभी धर्म से न डिगे और मेरी प्रजा कभी दुखी न हो!'

सम्राट विक्रमादित्य

धर्म ही मेरा जीवन और प्रजा ही मेरा परिवार है!

Panel 28
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The cosmic arena dissolves into the golden rays of dawn over the Shipra river

दिव्य प्रकाश मन्द होकर प्रातःकाल की स्वर्णिम किरणों में विलीन हो गया; मन्दिरों के शंख-घड़ियाल गूँजने लगे।

Panel 29
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Holding the singing golden bells, Vikramaditya returns to his palace

हाथ में दिव्य नूपुर थामे सम्राट विक्रमादित्य परम शान्ति और शिव-कृपा से सराबोर होकर राजप्रासाद लौटे।

Panel 30
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दृश्य 6

सुलक्षणा का निर्णय और राजा भोज का संकोच

Sulakshana
Back in Dharanagari palace, Sulakshana looks directly at King Bhoja with cosmic-amethyst eyes

धारानगरी के सभा-भवन में सजीव पुतली सुलक्षणा ने राजा भोज को गम्भीर जामुनी-नयनों से देखा।

Panel 31
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Sulakshana challenges: 'Have you ever stood before the Divine Couple with fearless non-dual wisdom?'
पुतली सुलक्षणा
अब कहो, राजा भोज—क्या तुमने कभी साक्षात् शिव-शक्ति के सम्मुख निर्भय होकर अद्वैत-न्याय किया है, और वरदान में अपने लिए कुछ भी न माँगकर केवल प्रजा के धर्म की प्रार्थना की है? यदि ऐसा परा-विवेक तुममें है, तो कदम बढ़ाओ! अन्यथा लौट जाओ!

सुलक्षणा ने इकतीसवीं सीढ़ी की चुनौती दी:

पुतली सुलक्षणा

अब कहो, राजा भोज—क्या तुमने कभी साक्षात् शिव-शक्ति के सम्मुख निर्भय होकर अद्वैत-न्याय किया है, और वरदान में अपने लिए कुछ भी न माँगकर केवल प्रजा के धर्म की प्रार्थना की है? यदि ऐसा परा-विवेक तुममें है, तो कदम बढ़ाओ! अन्यथा लौट जाओ!

Panel 32
•
King Bhoja lowers his head in deep humility and introspection, acknowledging Vikramaditya's wisdom
राजा भोज
मुझमें विक्रमादित्य जैसा अद्वैत-ज्ञान, शिव-शक्ति के साक्षात् दर्शन का तेज और सर्वथा निष्काम प्रार्थना का शील नहीं है, देवि। मैं इस इकतीसवीं सीढ़ी के भी योग्य नहीं हूँ।

राजा भोज ने लज्जा और श्रद्धा से सिर झुका लिया:

राजा भोज

मुझमें विक्रमादित्य जैसा अद्वैत-ज्ञान, शिव-शक्ति के साक्षात् दर्शन का तेज और सर्वथा निष्काम प्रार्थना का शील नहीं है, देवि। मैं इस इकतीसवीं सीढ़ी के भी योग्य नहीं हूँ।

Panel 33
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King Bhoja steps down from the thirty-first step, ordering philosophy chairs established

राजा भोज इकतीसवीं सीढ़ी से नीचे उतरे और धारानगरी तथा पूरे मालवा में अद्वैत वेदान्त अध्ययन पीठ, मन्दिर संगीत न्यास और महाशिवरात्रि महोत्सव के आयोजन की आज्ञा दी।

Panel 34
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King Bhoja issues royal proclamations establishing Advaita Vedanta study centers

राज्य-भर में दार्शनिकों और शास्त्र-वेत्ताओं के सम्मान हेतु विशेष राजसी वृत्तियों का गठन हुआ।

Panel 35
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Twilight conches echo across Dharanagari as Sulakshana smiles and freezes back into silent bronze

संध्याकाल के शंख गूँज उठे और सुलक्षणा मन्द मुस्कान के साथ पुनः मौन कांस्य-प्रतिमा बन गई। **सिंहासन बत्तीसी का इकतीसवाँ दिन सम्पन्न हुआ!**

Panel 36
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The thirty-second and final living statue Rajarupa gleams at the throne summit

सिंहासन के सर्वोच्च शिखर पर बत्तीसवीं और अन्तिम पुतली—**राजरूपा (पद्मावती-चरम)**—दीपक की आभा में जगमगाती रही, कल प्रातःकाल के महा-समापन और राजा भोज के अन्तिम न्याय की प्रतीक्षा करते हुए!

Panel 37
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King Bhoja departs the throne hall in quiet contemplation, preparing for the thirty-second dawn
राजा भोज
"कल प्रातःकाल हम बत्तीसवीं सीढ़ी पर कदम रखेंगे और बत्तीसवीं पुतली—राजरूपा—की अन्तिम अमर गाथा सुनकर इस दिव्य यात्रा का महा-समापन करेंगे!"

राजा भोज परम अद्वैत-ज्ञान और शिव-भक्ति को हृदय में संजोकर मौन भाव से राजसभा से प्रस्थान कर गए।

राजा भोज

"कल प्रातःकाल हम बत्तीसवीं सीढ़ी पर कदम रखेंगे और बत्तीसवीं पुतली—राजरूपा—की अन्तिम अमर गाथा सुनकर इस दिव्य यात्रा का महा-समापन करेंगे!"

Panel 38
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