एकत्रिंशत् पुतली सुलक्षणा: शिव-पार्वती का ताण्डव-लास, सहस्र सुवर्ण-नूपुर और निष्काम भक्ति-वरदान
The Thirty-First Statue: Sulakshana & The Cosmic Dance of Shiva
इकतीसवाँ सूर्योदय और सुलक्षणा का प्रबोधन
The Thirty-First Dawn & Sulakshana
इकतीसवें प्रभात की स्वर्णिम किरणों ने धारानगरी के राजप्रासाद को आलोकित किया, जहाँ राजा भोज ने पूर्ण निष्ठा से अपनी साधना पूर्ण की।

केसरिया परिधान धारण कर राजा भोज विनीत चरणों से इकतीसवीं सीढ़ी की ओर बढ़े।

जैसे ही राजा का चरण इकतीसवीं सीढ़ी के निकट पहुँचा, मणिक वेदी ब्रह्माण्डीय जामुनी और दिव्य-स्वर्णिम प्रकाश से प्रदीप्त हो उठी!

इकतीसवीं कांस्य-पुतली—सुलक्षणा (कौशल्या-द्वितीया)—की जामुनी-नयन खुले और वह सुवर्ण-त्रिशूल व बजते सुवर्ण-नूपुर हाथ में लिए दिव्य हँसी के साथ सजीव हो उठी!
ठहरो, राजा भोज! इस इकतीसवीं सीढ़ी पर कदम रखने का दुस्साहस मत करो!

राजा भोज ने नतमस्तक होकर हाथ जोड़े और त्रिशूल धारण की हुई पुतली की ओर देखा।
हे सुलक्षणा देवि! विक्रमादित्य के किस अद्वैत-ज्ञान और शिव-शक्ति के साक्षात दर्शन की अमर गाथा आज आप मुझे सुनाना चाहती हैं?

सुलक्षणा ने सुवर्ण-त्रिशूल उठाकर गम्भीर वाणी में कहा:
क्या तुममें विक्रमादित्य जैसा निर्भय अद्वैत-विवेक और परा-भक्ति का तेज है, जब उन्होंने महाशिवरात्रि की आधी रात में महाकाल के श्मशान में शिव-पार्वती के ताण्डव-लास का साक्षात् दर्शन किया, बिना किसी भय के दिव्य नृत्य का न्याय किया और धर्म-संरक्षण का अमर वरदान प्राप्त किया?
महाशिवरात्रि की निशीथ वेला और महाकाल का महा-श्मशान
The Midnight Pilgrimage to Mahakaleshwar
महाशिवरात्रि के परम पावन पर्व पर उज्जयिनी की शिप्रा नदी के तटवर्ती मन्दिरों पर आकाश के तारे मुकुट के समान जगमगा रहे थे।

सम्राट विक्रमादित्य ने राजसी वस्त्र त्यागकर श्वेत सूती चादर ओढ़ी और नंगे पाँव महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग की ओर प्रस्थान किया।

सारे अंगरक्षकों को पीछे छोड़ सम्राट अकेले ही महा-श्मशान के निर्जन प्रांगण में प्रवेश कर गए, जहाँ केवल शान्त भस्म और बेलपत्र बिखरे थे।

अचानक वायुमण्डल में 'अनाहत-नाद' (ॐ) की प्रचण्ड ब्रह्माण्डीय ध्वनि गूँज उठी, जिसने सम्पूर्ण दिशाओं को आलोकित कर दिया!

अन्धकारमय श्मशान भूमि पल भर में स्फटिक-मणिक ब्रह्माण्डीय रंगमंच में परिवर्तित हो गई, जो तारों के बीच तैर रहा था!

दिव्य प्रकाश के मध्य देवाधिदेव भगवान् शिव नटराज और जगज्जननी माँ पार्वती अपने साक्षात् ब्रह्माण्डीय रूपों में प्रकट हुए!
ॐ नमः शिवाय!
शिव का प्रचण्ड ताण्डव और माँ पार्वती का मनोहर लास्य
The Cosmic Tandava & Lasya Dance
भगवान् शिव ने डमरू की प्रचण्ड गूँज के साथ 'रुद्र-ताण्डव' आरम्भ किया; उनके पैरों के आघात से ब्रह्माण्ड के अहंकार का संहार होने लगा!
डिम-डिम-डिम! डमरू का नाद ही सृष्टि का सत्य है!

प्रत्युत्तर में जगदम्बा पार्वती ने अमृतमयी 'लास्य-नृत्य' किया, जिनके कोमल चरण-कमलों से सृष्टि में जीवन, रस और पुष्पों की वर्षा होने लगी!
यह लास्य चराचर में अमृत और प्रेम का संचार करता है!

आकाश में गन्धर्वों और किन्नरों की वीणाएँ बज उठीं; नृत्य की गति और लय अनन्त की पराकाष्ठा पर पहुँच गई!

शिव का प्रचण्ड संहारक तेज और शक्ति का करुणामयी सृजक माधुर्य एक अविभाज्य दिव्य सन्तुलन में एकाकार हो गए!

ताल के चरमोत्कर्ष पर शिव और पार्वती दोनों एक साथ स्थिर हो गए; दोनों के नयन दिव्य प्रेम और सन्तुलन में मुस्कुराए।

महादेव ने छाया में खड़े समाधिस्थ सम्राट विक्रमादित्य को देखकर गम्भीर वाणी में पुकारा:
आगे आओ, उज्जयिनी-नरेश! तुम नाट्यशास्त्र और आत्म-तत्व के ज्ञाता हो! निष्पक्ष होकर निर्णय दो—हम दोनों में से किसका नृत्य श्रेष्ठ था?
सम्राट का अद्वैत-न्याय और अर्धनारीश्वर का पावन रहस्य
The Sovereign
सम्राट विक्रमादित्य आगे बढ़े और साष्टाङ्ग दण्डवत् प्रणाम कर जगत्-माता-पिता के युगल चरणों में अपना मस्तक रख दिया।

आकाश में देवता भयभीत थे; शिव को श्रेष्ठ कहें तो शक्ति रुष्ट होंगी, शक्ति को श्रेष्ठ कहें तो शिव रुष्ट होंगे!

विक्रमादित्य ने हाथ जोड़कर अद्वैत-दर्शन की अमृत वाणी में कहा: 'हे देवाधिदेव! भगवान् शिव साक्षात् 'पुरुष' हैं—सृष्टि और प्रलय के आधार में स्थित शाश्वत मौन!'
शिव का ताण्डव मोह को भस्म करने वाला सत्य है!

'और माँ पार्वती साक्षात् 'प्रकृति' हैं—वह दिव्य शक्ति और करुणा जिसके द्वारा सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड साँस लेता और आनन्दित होता है!'
माँ पार्वती का लास्य चराचर को अमृत प्रदान करने वाली ममता है!

'ताण्डव और लास्य को अलग करना अग्नि से उसकी दाहकता या शब्द से उसके अर्थ को अलग करने जैसा असम्भव है! आप दोनों साक्षात् अखण्ड **अर्धनारीश्वर** हैं!'
दोनों का नृत्य एक ही ब्रह्म की दो आँखें हैं!

इस अद्वितीय अद्वैत-सत्य को सुनकर भगवान् शिव और माँ पार्वती के मुखमण्डल पर अगाध आनन्द की दिव्य मुस्कान खिल उठी!
सुवर्ण-नूपुर का उपहार, शिव का वरदान और निष्काम प्रार्थना
The Boon of the Golden Bells & Divine Protection
जगदम्बा पार्वती ने अपने चरण-कमलों से बजते हुए 'सहस्र सुवर्ण-नूपुर' उतारे और स्नेहपूर्वक सम्राट विक्रमादित्य को प्रदान किए।

माँ पार्वती ने आशीर्वाद दिया: 'जब तक ये नूपुर तुम्हारे पास रहेंगे, तुम्हारे राज्य में सत्य, समृद्धि और निष्कलंक न्याय का साम्राज्य रहेगा!'
तुम्हारी प्रजा कभी अन्याय का दुःख नहीं भोगेगी, वत्स!

महादेव ने त्रिशूल से सम्राट के मस्तक को स्पर्श किया: 'तुम्हारा नाम तीनों लोकों में न्याय और धर्म का अमर पर्याय बनेगा; यह बत्तीस पुतलियों का सुवर्ण-सिंहासन सदा तुम्हारी कीर्ति गाएगा!'
माँग लो, विक्रमादित्य! अपने लिए जो चाहो!

सम्राट ने हाथ जोड़कर कहा: 'हे भोलेनाथ! मुझे कोई व्यक्तिगत धन या भोग नहीं चाहिए; केवल इतना वर दीजिए कि मेरी मति कभी धर्म से न डिगे और मेरी प्रजा कभी दुखी न हो!'
धर्म ही मेरा जीवन और प्रजा ही मेरा परिवार है!

दिव्य प्रकाश मन्द होकर प्रातःकाल की स्वर्णिम किरणों में विलीन हो गया; मन्दिरों के शंख-घड़ियाल गूँजने लगे।

हाथ में दिव्य नूपुर थामे सम्राट विक्रमादित्य परम शान्ति और शिव-कृपा से सराबोर होकर राजप्रासाद लौटे।
सुलक्षणा का निर्णय और राजा भोज का संकोच
Sulakshana
धारानगरी के सभा-भवन में सजीव पुतली सुलक्षणा ने राजा भोज को गम्भीर जामुनी-नयनों से देखा।

सुलक्षणा ने इकतीसवीं सीढ़ी की चुनौती दी:
अब कहो, राजा भोज—क्या तुमने कभी साक्षात् शिव-शक्ति के सम्मुख निर्भय होकर अद्वैत-न्याय किया है, और वरदान में अपने लिए कुछ भी न माँगकर केवल प्रजा के धर्म की प्रार्थना की है? यदि ऐसा परा-विवेक तुममें है, तो कदम बढ़ाओ! अन्यथा लौट जाओ!

राजा भोज ने लज्जा और श्रद्धा से सिर झुका लिया:
मुझमें विक्रमादित्य जैसा अद्वैत-ज्ञान, शिव-शक्ति के साक्षात् दर्शन का तेज और सर्वथा निष्काम प्रार्थना का शील नहीं है, देवि। मैं इस इकतीसवीं सीढ़ी के भी योग्य नहीं हूँ।

राजा भोज इकतीसवीं सीढ़ी से नीचे उतरे और धारानगरी तथा पूरे मालवा में अद्वैत वेदान्त अध्ययन पीठ, मन्दिर संगीत न्यास और महाशिवरात्रि महोत्सव के आयोजन की आज्ञा दी।

राज्य-भर में दार्शनिकों और शास्त्र-वेत्ताओं के सम्मान हेतु विशेष राजसी वृत्तियों का गठन हुआ।

संध्याकाल के शंख गूँज उठे और सुलक्षणा मन्द मुस्कान के साथ पुनः मौन कांस्य-प्रतिमा बन गई। **सिंहासन बत्तीसी का इकतीसवाँ दिन सम्पन्न हुआ!**

सिंहासन के सर्वोच्च शिखर पर बत्तीसवीं और अन्तिम पुतली—**राजरूपा (पद्मावती-चरम)**—दीपक की आभा में जगमगाती रही, कल प्रातःकाल के महा-समापन और राजा भोज के अन्तिम न्याय की प्रतीक्षा करते हुए!

राजा भोज परम अद्वैत-ज्ञान और शिव-भक्ति को हृदय में संजोकर मौन भाव से राजसभा से प्रस्थान कर गए।
"कल प्रातःकाल हम बत्तीसवीं सीढ़ी पर कदम रखेंगे और बत्तीसवीं पुतली—राजरूपा—की अन्तिम अमर गाथा सुनकर इस दिव्य यात्रा का महा-समापन करेंगे!"