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त्रयोविंशति पुतली धर्मवती: मृग-शिशु की करुणा, व्याध का बाण और सम्राट का अभय-दान

सिंहासन बत्तीसी (३२ पुतलियों की अमर गाथा)• katha

त्रयोविंशति पुतली धर्मवती: मृग-शिशु की करुणा, व्याध का बाण और सम्राट का अभय-दान

The Twenty-Third Statue: Dharmavati & The Starving Doe

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दृश्य 1

तेईसवाँ सूर्योदय और धर्मवती का प्रबोधन

The Twenty-Third Dawn & Dharmavati
Morning sunlight streams across the sandstone colonnade onto the 32-step golden throne

तेईसवें प्रभात की स्वर्णिम किरणों ने धारानगरी के राजप्रासाद को आलोकित किया, जहाँ राजा भोज ने पूर्ण निष्ठा से अपनी साधना पूर्ण की।

Panel 1
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King Bhoja in sacred saffron silks approaches the twenty-third step of the throne

केसरिया परिधान धारण कर राजा भोज विनीत चरणों से तेईसवीं सीढ़ी की ओर बढ़े।

Panel 2
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The marble dais erupts with brilliant emerald-green and solar golden radiance

जैसे ही राजा का चरण तेईसवीं सीढ़ी के निकट पहुँचा, मणिक वेदी मरकत-हरित और प्रखर स्वर्णिम दिव्य प्रकाश से प्रदीप्त हो उठी!

Panel 3
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The twenty-third carved statue Dharmavati opens her glowing emerald-green eyes, laughing musically
पुतली धर्मवती
ठहरो, राजा भोज! इस तेईसवीं सीढ़ी पर कदम रखने का दुस्साहस मत करो!

तेईसवीं कांस्य-पुतली—धर्मवती—की हरित-नयन खुले और वह सुवर्ण-मृग-शिशु व धर्म-ढाल हाथ में लिए दिव्य हँसी के साथ सजीव हो उठी!

पुतली धर्मवती

ठहरो, राजा भोज! इस तेईसवीं सीढ़ी पर कदम रखने का दुस्साहस मत करो!

Panel 4
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King Bhoja halts in deep reverence with folded hands, gazing at the living bronze maiden
राजा भोज
हे धर्मवती देवि! विक्रमादित्य के किस प्राणि-दया और अभय-दान की पावन गाथा आज आप मुझे सुनाना चाहती हैं?

राजा भोज ने नतमस्तक होकर हाथ जोड़े और मृग-शिशु धारण की हुई पुतली की ओर देखा।

राजा भोज

हे धर्मवती देवि! विक्रमादित्य के किस प्राणि-दया और अभय-दान की पावन गाथा आज आप मुझे सुनाना चाहती हैं?

Panel 5
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Dharmavati speaks: 'Do you possess the universal compassion of Vikramaditya?'
पुतली धर्मवती
क्या तुममें विक्रमादित्य जैसी सर्वभूत-दया और अहिंसा का तेज है, जब एक गर्भवती मृगी की प्राण-रक्षा हेतु उन्होंने व्याध के विषैले बाण के सम्मुख अपना सीना अड़ा दिया और भूखे शिकारी को सुवर्ण-दान देकर अभयारण्य का निर्माण किया?

धर्मवती ने सुवर्ण-मृग-शिशु उठाकर गम्भीर वाणी में कहा:

पुतली धर्मवती

क्या तुममें विक्रमादित्य जैसी सर्वभूत-दया और अहिंसा का तेज है, जब एक गर्भवती मृगी की प्राण-रक्षा हेतु उन्होंने व्याध के विषैले बाण के सम्मुख अपना सीना अड़ा दिया और भूखे शिकारी को सुवर्ण-दान देकर अभयारण्य का निर्माण किया?

Panel 6
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दृश्य 2

विन्ध्याचल का सघन अरण्य, गर्भवती मृगी और व्याध का बाण

The Forest Hunt & The Desperate Hunter
In the lush, sun-dappled sal forest of the Vindhyas, Vikramaditya rides on a quiet royal patrol

विन्ध्याचल के सघन, धूप-छाँव वाले शाल-वनों में सम्राट विक्रमादित्य सीमा-निरीक्षण हेतु शान्त भाव से अश्व पर विचरण कर रहे थे।

Panel 7
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Beside a crystal-clear forest brook, a pregnant doe drinks peacefully amidst wildflowers

निर्मल वन-निर्झर के तट पर एक रूपवती गर्भवती मृगी वन-पुष्पों के बीच शान्ति से जल पी रही थी।

Panel 8
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In the dense green thicket, hunter Lubdhaka draws his weathered bow, aiming a poisoned iron arrow
व्याध लुब्धक
यदि आज यह शिकार न मिला, तो मेरी पत्नी और तीनों नन्हे बच्चे भूख से दम तोड़ देंगे!

घनी झाड़ियों में दुबला-पतला, भूखा व्याध लुब्धक अपने धनुष पर विष-बुझा तीक्ष्ण बाण साधे खड़ा था; उसके घर में चार दिनों से अन्न का एक दाना न था।

व्याध लुब्धक

यदि आज यह शिकार न मिला, तो मेरी पत्नी और तीनों नन्हे बच्चे भूख से दम तोड़ देंगे!

Panel 9
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The doe senses the drawn bow, gazing back with soulful, tear-filled eyes
सम्राट विक्रमादित्य
रुक जाओ, व्याध!

मृगी ने धनुष की टंकार भाँप ली; उसने बड़ी-बड़ी आर्त, अश्रुपूर्ण आँखों से शिकारी की ओर देखा, मानो अपने गर्भ के शिशु हेतु दया की भीख माँग रही हो!

सम्राट विक्रमादित्य

रुक जाओ, व्याध!

Panel 10
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The hunter lets fly the deadly poisoned arrow with a sharp twang

व्याध ने प्रत्यञ्चा छोड़ दी; विषैला बाण सनसनाती गति से हरी पत्तियों को चीरता हुआ मृगी की ओर लपका!

Panel 11
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Vikramaditya leaps from his horse in mid-air, throwing his body into the path of the arrow

तभी एक दिव्य कौंध के समान विक्रमादित्य ने अपने अश्व से छलाँग लगाई और अपना कवच-युक्त सीना उस उड़ते हुए बाण के ठीक सामने अड़ा दिया!

Panel 12
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दृश्य 3

सम्राट का आत्म-बलिदान, बाण का प्रतिघात और व्याध का पश्चाताप

The King Shields the Doe with His Own Chest
The iron arrow strikes Vikramaditya's golden chest medallion, shattering in a shower of sparks

विषैला बाण सम्राट के स्वर्ण-पदक पर टकराया और चिंगारियाँ बिखेरते हुए धरती पर गिरकर टूट गया!

Panel 13
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The pregnant doe darts safely into the dense green fern grove, looking back in gratitude

गर्भवती मृगी फुर्ती से घने वन में सुरक्षित भाग गई और मुड़कर असीम कृतज्ञता से अपने रक्षक सम्राट को निहारा।

Panel 14
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Lubdhaka realizes he almost killed the Emperor, falling prostrate in utter horror
व्याध लुब्धक
त्राहि माम्, देव! मैंने अनजाने में पृथ्वीपति पर बाण चला दिया! मुझे मृत्युदण्ड दीजिए!

व्याध लुब्धक ने जब देखा कि उसका बाण आर्यावर्त के चक्रवर्ती सम्राट पर लगा था, तो वह भय से थर-थर काँपते हुए धरती पर गिर पड़ा!

व्याध लुब्धक

त्राहि माम्, देव! मैंने अनजाने में पृथ्वीपति पर बाण चला दिया! मुझे मृत्युदण्ड दीजिए!

Panel 15
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Vikramaditya extends his hand calmly, lifting the trembling hunter to his feet

विक्रमादित्य ने कृपाण खींचने के बजाय स्नेहपूर्वक अपना हाथ बढ़ाया और धूल में लोटते हुए शिकारी को उठाया।

Panel 16
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Vikramaditya asks gently: 'Why do you hunt pregnant mother animals with poisoned arrows?'
सम्राट विक्रमादित्य
मूक प्राणियों की भी अपनी सन्तान और परिवार होता है; उनकी पीड़ा को समझो।

सम्राट ने करुणा-भरे स्वर में पूछा: 'हे व्याध! इस तपोवन में गर्भ से भारी निरीह जननी पर विषैला बाण चलाने की ऐसी क्या विवशता थी?'

सम्राट विक्रमादित्य

मूक प्राणियों की भी अपनी सन्तान और परिवार होता है; उनकी पीड़ा को समझो।

Panel 17
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Lubdhaka breaks down in tears: 'My wife and three infant children are starving!'

लुब्धक ने रोते हुए कहा: 'सूखे के कारण वन उजड़ गया है; मेरी झोंपड़ी में तीन बच्चे और पत्नी भूख से तड़प रहे हैं!'

Panel 18
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दृश्य 4

पहाड़ी झोंपड़ी की दुर्दशा और सम्राट की करुणामयी आँखें

The Hunter
Vikramaditya walks alongside the hunter along a narrow rugged mountain path

विक्रमादित्य ने सत्य जानने हेतु व्याध के साथ उसकी दुर्गम पहाड़ी झोंपड़ी की ओर पैदल यात्रा की।

Panel 19
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A decaying thatch-and-mud hut on a rocky ridge surrounded by dry parched scrubland

चट्टान की ढलान पर एक टूटी-फूटी घास-फूस की कुटिया खड़ी थी, जहाँ चारों ओर सूखा पसरा था।

Panel 20
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Three emaciated tribal children sit on the dirt floor, crying in hunger
भूखा बालक
माँ! भूख से जान निकल रही है... कुछ खाने को दो...

कुटिया के भीतर मिट्टी के फर्श पर तीन कंकाल-समान नन्हे बच्चे भूख की पीड़ा से बिलख रहे थे।

भूखा बालक

माँ! भूख से जान निकल रही है... कुछ खाने को दो...

Panel 21
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The hunter's wife weeps as she boils wild bitter tree bark in an empty earthen pot
व्याध-पत्नी
सो जाओ, मेरे लाल... अभी भोजन पक रहा है...

शिकारी की पत्नी मिट्टी की ठंडी हांडी में कड़वी जंगली छालें उबाल रही थी ताकि बच्चों को झाँसा देकर सुला सके।

व्याध-पत्नी

सो जाओ, मेरे लाल... अभी भोजन पक रहा है...

Panel 22
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Vikramaditya watches with deep sorrow, realizing that crime was born from starvation

यह हृदय-विदारक दृश्य देखकर सम्राट विक्रमादित्य के नयनों से अश्रु बह निकले; उन्होंने समझ लिया कि अपराध क्रूरता से नहीं, भूख की विवशता से जन्मा था!

Panel 23
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Vikramaditya gently comforts the weeping children, placing his hand in blessing upon their heads
सम्राट विक्रमादित्य
जब तक विक्रमादित्य जीवित है, इस धरा पर कोई सन्तान भूख से नहीं रोएगी!

सम्राट ने आगे बढ़कर उन भूखे बालकों के सिर पर हाथ रखा और अपने वस्त्र से उनके आँसू पोंछे।

सम्राट विक्रमादित्य

जब तक विक्रमादित्य जीवित है, इस धरा पर कोई सन्तान भूख से नहीं रोएगी!

Panel 24
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दृश्य 5

सुवर्ण-दान, अभयारण्य की घोषणा और धनुष-भंग का संकल्प

The Gift of Gold & The First Wildlife Sanctuary
Vikramaditya hands his entire heavy leather pouch of two hundred gold dinars to the hunter
सम्राट विक्रमादित्य
यह सुवर्ण लो! घाटी में उपजाऊ खेत, बैल और उत्तम बीज खरीदो; अब से तुम हत्यारा नहीं, अन्नदाता बनोगे!

विक्रमादित्य ने अपनी कमर से दो सौ स्वर्ण-दीनारों से भरी भारी चमड़े की थैली खोली और स्तब्ध शिकारी की हथेलियों में रख दी!

सम्राट विक्रमादित्य

यह सुवर्ण लो! घाटी में उपजाऊ खेत, बैल और उत्तम बीज खरीदो; अब से तुम हत्यारा नहीं, अन्नदाता बनोगे!

Panel 25
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Vikramaditya declares: 'No child in my realm shall starve into hunting!'
वन-पाल
सम्राट का आदेश शिरोधार्य है; सभी व्याधों को हल और भूमि प्रदान की जाएगी!

सम्राट ने घोषणा की कि पूरे वन-प्रान्त के सभी भील व निषाद परिवारों को कृषि-भूमि और राजकोष से सहायता दी जाएगी।

वन-पाल

सम्राट का आदेश शिरोधार्य है; सभी व्याधों को हल और भूमि प्रदान की जाएगी!

Panel 26
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The Emperor signs a royal copper decree establishing the Vindhya forest as an Abhayaranya

विक्रमादित्य ने ताम्र-पत्र पर ऐतिहासिक राज-आज्ञा जारी की: पाँच सौ योजन के विन्ध्याचल वन को आर्यावर्त का प्रथम **'अभयारण्य' (पवित्र वन्यजीव संरक्षण क्षेत्र)** घोषित किया गया!

Panel 27
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In tears of spiritual awakening, Lubdhaka snaps his hunting bow in two
व्याध लुब्धक
महाराज! आज आपने मुझे और मेरे कुल को पाप और मृत्यु दोनों से तार दिया!

आत्मिक जागरण के अश्रुओं से भीगे लुब्धक ने अपने दोनों हाथों से अपना शिकार-धनुष दो टुकड़ों में तोड़ दिया और जीवन-भर वन्यजीवों की रक्षा की शपथ ली!

व्याध लुब्धक

महाराज! आज आपने मुझे और मेरे कुल को पाप और मृत्यु दोनों से तार दिया!

Panel 28
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At twilight, the pregnant doe and a herd of gentle spotted deer return, fearlessly nuzzling

सन्ध्या के समय वही गर्भवती मृगी अपने पूरे मृग-झुण्ड के साथ निर्भय होकर लौट आई और सम्राट के चरणों के समीप आकर घास चरने लगी!

Panel 29
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Golden evening sunlight bathes the woodland in peace as humans and wildlife stand together in Dharma

स्वर्णिम गोधूलि वेला में मनुष्य और मूक पशु एक साथ धर्म के पावन सूत्र में बँध गए; सर्वभूत-हित की जय हुई!

Panel 30
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दृश्य 6

धर्मवती का निर्णय और राजा भोज का संकोच

Dharmavati
Back in Dharanagari palace, Dharmavati looks directly at King Bhoja with emerald-green eyes

धारानगरी के सभा-भवन में सजीव पुतली धर्मवती ने राजा भोज को गम्भीर हरित नयनों से देखा।

Panel 31
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Dharmavati challenges: 'Have you ever shielded a voiceless deer with your own body?'
पुतली धर्मवती
अब कहो, राजा भोज—क्या तुमने कभी किसी मूक मृग के प्राणों हेतु बाण के आगे अपना सीना अड़ाया है? क्या भूखे शिकारी को अन्नदाता बनाकर सम्पूर्ण वन को अभयारण्य बनाया है? यदि ऐसी सर्वभूत-दया और अहिंसा तुममें है, तो कदम बढ़ाओ! अन्यथा लौट जाओ!

धर्मवती ने तेईसवीं सीढ़ी की चुनौती दी:

पुतली धर्मवती

अब कहो, राजा भोज—क्या तुमने कभी किसी मूक मृग के प्राणों हेतु बाण के आगे अपना सीना अड़ाया है? क्या भूखे शिकारी को अन्नदाता बनाकर सम्पूर्ण वन को अभयारण्य बनाया है? यदि ऐसी सर्वभूत-दया और अहिंसा तुममें है, तो कदम बढ़ाओ! अन्यथा लौट जाओ!

Panel 32
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King Bhoja lowers his head in deep humility and introspection, acknowledging Vikramaditya's compassion
राजा भोज
मुझमें विक्रमादित्य जैसी असीम सर्वभूत-दया, मूक पशुओं के लिए प्राण हथेली पर रखने का साहस और भूखों का उद्धार करने की व्यापक दृष्टि नहीं है, देवि। मैं इस तेईसवीं सीढ़ी के भी योग्य नहीं हूँ।

राजा भोज ने लज्जा और श्रद्धा से सिर झुका लिया:

राजा भोज

मुझमें विक्रमादित्य जैसी असीम सर्वभूत-दया, मूक पशुओं के लिए प्राण हथेली पर रखने का साहस और भूखों का उद्धार करने की व्यापक दृष्टि नहीं है, देवि। मैं इस तेईसवीं सीढ़ी के भी योग्य नहीं हूँ।

Panel 33
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King Bhoja steps down from the twenty-third step, ordering wildlife sanctuaries established

राजा भोज तेईसवीं सीढ़ी से नीचे उतरे और धारानगरी तथा पूरे मालवा में वन्यजीव अभयारण्य, गर्भवती पशुओं के आखेट पर पूर्ण प्रतिबन्ध और वनवासी पुनर्वास योजना लागू करने की आज्ञा दी।

Panel 34
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King Bhoja issues royal proclamations establishing statewide wildlife sanctuaries

राज्य-भर के वनों को संरक्षित क्षेत्र घोषित कर निर्धन वनवासियों को खेती की भूमि और हल-बैल प्रदान किए गए।

Panel 35
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Twilight conches echo across Dharanagari as Dharmavati smiles and freezes back into silent bronze

संध्याकाल के शंख गूँज उठे और धर्मवती मन्द मुस्कान के साथ पुनः मौन कांस्य-प्रतिमा बन गई। **सिंहासन बत्तीसी का तेईसवाँ दिन सम्पन्न हुआ!**

Panel 36
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The remaining nine celestial statues gleam in the evening torchlight

शेष नौ कांस्य-पुतलियाँ सन्ध्या की मशालों में जगमगाती रहीं, चौबीसवीं पुतली (करुणावती — Season 3 Finale) की अमर गाथा की प्रतीक्षा करते हुए।

Panel 37
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King Bhoja departs the throne hall in quiet contemplation, inspired by Vikramaditya's compassion
राजा भोज
"कल प्रातःकाल हम चौबीसवीं सीढ़ी पर कदम रखेंगे और चौबीसवीं पुतली—करुणावती—की अमर गाथा सुनेंगे!"

राजा भोज सर्वभूत-दया और अहिंसा के पावन सत्यों को हृदय में संजोकर मौन भाव से राजसभा से प्रस्थान कर गए।

राजा भोज

"कल प्रातःकाल हम चौबीसवीं सीढ़ी पर कदम रखेंगे और चौबीसवीं पुतली—करुणावती—की अमर गाथा सुनेंगे!"

Panel 38
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