त्रयोविंशति पुतली धर्मवती: मृग-शिशु की करुणा, व्याध का बाण और सम्राट का अभय-दान
The Twenty-Third Statue: Dharmavati & The Starving Doe
तेईसवाँ सूर्योदय और धर्मवती का प्रबोधन
The Twenty-Third Dawn & Dharmavati
तेईसवें प्रभात की स्वर्णिम किरणों ने धारानगरी के राजप्रासाद को आलोकित किया, जहाँ राजा भोज ने पूर्ण निष्ठा से अपनी साधना पूर्ण की।

केसरिया परिधान धारण कर राजा भोज विनीत चरणों से तेईसवीं सीढ़ी की ओर बढ़े।

जैसे ही राजा का चरण तेईसवीं सीढ़ी के निकट पहुँचा, मणिक वेदी मरकत-हरित और प्रखर स्वर्णिम दिव्य प्रकाश से प्रदीप्त हो उठी!

तेईसवीं कांस्य-पुतली—धर्मवती—की हरित-नयन खुले और वह सुवर्ण-मृग-शिशु व धर्म-ढाल हाथ में लिए दिव्य हँसी के साथ सजीव हो उठी!
ठहरो, राजा भोज! इस तेईसवीं सीढ़ी पर कदम रखने का दुस्साहस मत करो!

राजा भोज ने नतमस्तक होकर हाथ जोड़े और मृग-शिशु धारण की हुई पुतली की ओर देखा।
हे धर्मवती देवि! विक्रमादित्य के किस प्राणि-दया और अभय-दान की पावन गाथा आज आप मुझे सुनाना चाहती हैं?

धर्मवती ने सुवर्ण-मृग-शिशु उठाकर गम्भीर वाणी में कहा:
क्या तुममें विक्रमादित्य जैसी सर्वभूत-दया और अहिंसा का तेज है, जब एक गर्भवती मृगी की प्राण-रक्षा हेतु उन्होंने व्याध के विषैले बाण के सम्मुख अपना सीना अड़ा दिया और भूखे शिकारी को सुवर्ण-दान देकर अभयारण्य का निर्माण किया?
विन्ध्याचल का सघन अरण्य, गर्भवती मृगी और व्याध का बाण
The Forest Hunt & The Desperate Hunter
विन्ध्याचल के सघन, धूप-छाँव वाले शाल-वनों में सम्राट विक्रमादित्य सीमा-निरीक्षण हेतु शान्त भाव से अश्व पर विचरण कर रहे थे।

निर्मल वन-निर्झर के तट पर एक रूपवती गर्भवती मृगी वन-पुष्पों के बीच शान्ति से जल पी रही थी।

घनी झाड़ियों में दुबला-पतला, भूखा व्याध लुब्धक अपने धनुष पर विष-बुझा तीक्ष्ण बाण साधे खड़ा था; उसके घर में चार दिनों से अन्न का एक दाना न था।
यदि आज यह शिकार न मिला, तो मेरी पत्नी और तीनों नन्हे बच्चे भूख से दम तोड़ देंगे!

मृगी ने धनुष की टंकार भाँप ली; उसने बड़ी-बड़ी आर्त, अश्रुपूर्ण आँखों से शिकारी की ओर देखा, मानो अपने गर्भ के शिशु हेतु दया की भीख माँग रही हो!
रुक जाओ, व्याध!

व्याध ने प्रत्यञ्चा छोड़ दी; विषैला बाण सनसनाती गति से हरी पत्तियों को चीरता हुआ मृगी की ओर लपका!

तभी एक दिव्य कौंध के समान विक्रमादित्य ने अपने अश्व से छलाँग लगाई और अपना कवच-युक्त सीना उस उड़ते हुए बाण के ठीक सामने अड़ा दिया!
सम्राट का आत्म-बलिदान, बाण का प्रतिघात और व्याध का पश्चाताप
The King Shields the Doe with His Own Chest
विषैला बाण सम्राट के स्वर्ण-पदक पर टकराया और चिंगारियाँ बिखेरते हुए धरती पर गिरकर टूट गया!

गर्भवती मृगी फुर्ती से घने वन में सुरक्षित भाग गई और मुड़कर असीम कृतज्ञता से अपने रक्षक सम्राट को निहारा।

व्याध लुब्धक ने जब देखा कि उसका बाण आर्यावर्त के चक्रवर्ती सम्राट पर लगा था, तो वह भय से थर-थर काँपते हुए धरती पर गिर पड़ा!
त्राहि माम्, देव! मैंने अनजाने में पृथ्वीपति पर बाण चला दिया! मुझे मृत्युदण्ड दीजिए!

विक्रमादित्य ने कृपाण खींचने के बजाय स्नेहपूर्वक अपना हाथ बढ़ाया और धूल में लोटते हुए शिकारी को उठाया।

सम्राट ने करुणा-भरे स्वर में पूछा: 'हे व्याध! इस तपोवन में गर्भ से भारी निरीह जननी पर विषैला बाण चलाने की ऐसी क्या विवशता थी?'
मूक प्राणियों की भी अपनी सन्तान और परिवार होता है; उनकी पीड़ा को समझो।

लुब्धक ने रोते हुए कहा: 'सूखे के कारण वन उजड़ गया है; मेरी झोंपड़ी में तीन बच्चे और पत्नी भूख से तड़प रहे हैं!'
पहाड़ी झोंपड़ी की दुर्दशा और सम्राट की करुणामयी आँखें
The Hunter
विक्रमादित्य ने सत्य जानने हेतु व्याध के साथ उसकी दुर्गम पहाड़ी झोंपड़ी की ओर पैदल यात्रा की।

चट्टान की ढलान पर एक टूटी-फूटी घास-फूस की कुटिया खड़ी थी, जहाँ चारों ओर सूखा पसरा था।

कुटिया के भीतर मिट्टी के फर्श पर तीन कंकाल-समान नन्हे बच्चे भूख की पीड़ा से बिलख रहे थे।
माँ! भूख से जान निकल रही है... कुछ खाने को दो...

शिकारी की पत्नी मिट्टी की ठंडी हांडी में कड़वी जंगली छालें उबाल रही थी ताकि बच्चों को झाँसा देकर सुला सके।
सो जाओ, मेरे लाल... अभी भोजन पक रहा है...

यह हृदय-विदारक दृश्य देखकर सम्राट विक्रमादित्य के नयनों से अश्रु बह निकले; उन्होंने समझ लिया कि अपराध क्रूरता से नहीं, भूख की विवशता से जन्मा था!

सम्राट ने आगे बढ़कर उन भूखे बालकों के सिर पर हाथ रखा और अपने वस्त्र से उनके आँसू पोंछे।
जब तक विक्रमादित्य जीवित है, इस धरा पर कोई सन्तान भूख से नहीं रोएगी!
सुवर्ण-दान, अभयारण्य की घोषणा और धनुष-भंग का संकल्प
The Gift of Gold & The First Wildlife Sanctuary
विक्रमादित्य ने अपनी कमर से दो सौ स्वर्ण-दीनारों से भरी भारी चमड़े की थैली खोली और स्तब्ध शिकारी की हथेलियों में रख दी!
यह सुवर्ण लो! घाटी में उपजाऊ खेत, बैल और उत्तम बीज खरीदो; अब से तुम हत्यारा नहीं, अन्नदाता बनोगे!

सम्राट ने घोषणा की कि पूरे वन-प्रान्त के सभी भील व निषाद परिवारों को कृषि-भूमि और राजकोष से सहायता दी जाएगी।
सम्राट का आदेश शिरोधार्य है; सभी व्याधों को हल और भूमि प्रदान की जाएगी!

विक्रमादित्य ने ताम्र-पत्र पर ऐतिहासिक राज-आज्ञा जारी की: पाँच सौ योजन के विन्ध्याचल वन को आर्यावर्त का प्रथम **'अभयारण्य' (पवित्र वन्यजीव संरक्षण क्षेत्र)** घोषित किया गया!

आत्मिक जागरण के अश्रुओं से भीगे लुब्धक ने अपने दोनों हाथों से अपना शिकार-धनुष दो टुकड़ों में तोड़ दिया और जीवन-भर वन्यजीवों की रक्षा की शपथ ली!
महाराज! आज आपने मुझे और मेरे कुल को पाप और मृत्यु दोनों से तार दिया!

सन्ध्या के समय वही गर्भवती मृगी अपने पूरे मृग-झुण्ड के साथ निर्भय होकर लौट आई और सम्राट के चरणों के समीप आकर घास चरने लगी!

स्वर्णिम गोधूलि वेला में मनुष्य और मूक पशु एक साथ धर्म के पावन सूत्र में बँध गए; सर्वभूत-हित की जय हुई!
धर्मवती का निर्णय और राजा भोज का संकोच
Dharmavati
धारानगरी के सभा-भवन में सजीव पुतली धर्मवती ने राजा भोज को गम्भीर हरित नयनों से देखा।

धर्मवती ने तेईसवीं सीढ़ी की चुनौती दी:
अब कहो, राजा भोज—क्या तुमने कभी किसी मूक मृग के प्राणों हेतु बाण के आगे अपना सीना अड़ाया है? क्या भूखे शिकारी को अन्नदाता बनाकर सम्पूर्ण वन को अभयारण्य बनाया है? यदि ऐसी सर्वभूत-दया और अहिंसा तुममें है, तो कदम बढ़ाओ! अन्यथा लौट जाओ!

राजा भोज ने लज्जा और श्रद्धा से सिर झुका लिया:
मुझमें विक्रमादित्य जैसी असीम सर्वभूत-दया, मूक पशुओं के लिए प्राण हथेली पर रखने का साहस और भूखों का उद्धार करने की व्यापक दृष्टि नहीं है, देवि। मैं इस तेईसवीं सीढ़ी के भी योग्य नहीं हूँ।

राजा भोज तेईसवीं सीढ़ी से नीचे उतरे और धारानगरी तथा पूरे मालवा में वन्यजीव अभयारण्य, गर्भवती पशुओं के आखेट पर पूर्ण प्रतिबन्ध और वनवासी पुनर्वास योजना लागू करने की आज्ञा दी।

राज्य-भर के वनों को संरक्षित क्षेत्र घोषित कर निर्धन वनवासियों को खेती की भूमि और हल-बैल प्रदान किए गए।

संध्याकाल के शंख गूँज उठे और धर्मवती मन्द मुस्कान के साथ पुनः मौन कांस्य-प्रतिमा बन गई। **सिंहासन बत्तीसी का तेईसवाँ दिन सम्पन्न हुआ!**

शेष नौ कांस्य-पुतलियाँ सन्ध्या की मशालों में जगमगाती रहीं, चौबीसवीं पुतली (करुणावती — Season 3 Finale) की अमर गाथा की प्रतीक्षा करते हुए।

राजा भोज सर्वभूत-दया और अहिंसा के पावन सत्यों को हृदय में संजोकर मौन भाव से राजसभा से प्रस्थान कर गए।
"कल प्रातःकाल हम चौबीसवीं सीढ़ी पर कदम रखेंगे और चौबीसवीं पुतली—करुणावती—की अमर गाथा सुनेंगे!"