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अष्टाविंशति पुतली वैदेही: निशीथ प्रच्छन्न-भ्रमण, स्वाभिमानी ब्राह्मण की क्षुधा और गुप्त अन्न-सत्कार

सिंहासन बत्तीसी (३२ पुतलियों की अमर गाथा)• katha

अष्टाविंशति पुतली वैदेही: निशीथ प्रच्छन्न-भ्रमण, स्वाभिमानी ब्राह्मण की क्षुधा और गुप्त अन्न-सत्कार

The Twenty-Eighth Statue: Vaidehi & The Secret Feast of Dignity

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दृश्य 1

अट्ठाईसवाँ सूर्योदय और वैदेही का प्रबोधन

The Twenty-Eighth Dawn & Vaidehi
Morning sunlight streams across the sandstone colonnade onto the 32-step golden throne

अट्ठाईसवें प्रभात की स्वर्णिम किरणों ने धारानगरी के राजप्रासाद को आलोकित किया, जहाँ राजा भोज ने पूर्ण निष्ठा से अपनी साधना पूर्ण की।

Panel 1
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King Bhoja in sacred saffron silks approaches the twenty-eighth step of the throne

केसरिया परिधान धारण कर राजा भोज विनीत चरणों से अट्ठाईसवीं सीढ़ी की ओर बढ़े।

Panel 2
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The marble dais erupts with brilliant crystal-diamond and solar-crimson radiance

जैसे ही राजा का चरण अट्ठाईसवीं सीढ़ी के निकट पहुँचा, मणिक वेदी स्फटिक-हीरक और सूर्य-लोहित दिव्य प्रकाश से प्रदीप्त हो उठी!

Panel 3
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The twenty-eighth carved statue Vaidehi opens her glowing crystal-diamond eyes, laughing musically
पुतली वैदेही
ठहरो, राजा भोज! इस अट्ठाईसवीं सीढ़ी पर कदम रखने का दुस्साहस मत करो!

अट्ठाईसवीं कांस्य-पुतली—वैदेही—की हीरक-नयन खुले और वह सुवर्ण-दीप व फल-पात्र हाथ में लिए दिव्य हँसी के साथ सजीव हो उठी!

पुतली वैदेही

ठहरो, राजा भोज! इस अट्ठाईसवीं सीढ़ी पर कदम रखने का दुस्साहस मत करो!

Panel 4
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King Bhoja halts in deep reverence with folded hands, gazing at the living bronze maiden
राजा भोज
हे वैदेही देवि! विक्रमादित्य के किस गुप्त-दान और प्रजा-रक्षण की अमर गाथा आज आप मुझे सुनाना चाहती हैं?

राजा भोज ने नतमस्तक होकर हाथ जोड़े और सुवर्ण-दीप धारण की हुई पुतली की ओर देखा।

राजा भोज

हे वैदेही देवि! विक्रमादित्य के किस गुप्त-दान और प्रजा-रक्षण की अमर गाथा आज आप मुझे सुनाना चाहती हैं?

Panel 5
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Vaidehi speaks: 'Do you possess the nocturnal vigilance and selfless humility of Vikramaditya?'
पुतली वैदेही
क्या तुममें विक्रमादित्य जैसा गुप्त-दान, निशीथ-भ्रमण की सजगता और स्वाभिमानी निर्धनों के सम्मान की रक्षा करने की नम्रता है, जब उन्होंने तूफानी आधी रात में अपने कन्धों पर अन्न की बोरियाँ ढोकर एक भूखे विद्वान के घर बिना नाम बताए गुप्त सत्कार पहुँचाया?

वैदेही ने सुवर्ण-दीप उठाकर गम्भीर वाणी में कहा:

पुतली वैदेही

क्या तुममें विक्रमादित्य जैसा गुप्त-दान, निशीथ-भ्रमण की सजगता और स्वाभिमानी निर्धनों के सम्मान की रक्षा करने की नम्रता है, जब उन्होंने तूफानी आधी रात में अपने कन्धों पर अन्न की बोरियाँ ढोकर एक भूखे विद्वान के घर बिना नाम बताए गुप्त सत्कार पहुँचाया?

Panel 6
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दृश्य 2

उज्जयिनी की तूफानी आधी रात और सम्राट का प्रच्छन्न-भ्रमण

The Stormy Midnight Patrol of Ujjayini
Torrential monsoon rains lash the darkened cobblestone alleys and sandstone arches of Ujjayini

मध्यरात्रि में मूसलाधार वर्षा और गर्जना के साथ उज्जयिनी की गलियों में तूफानी अन्धकार छा गया।

Panel 7
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Dressed in a coarse indigo wanderer's cloak, Vikramaditya slips through a secret palace sally port
सम्राट विक्रमादित्य
राजा वही है जो प्रजा के गुप्त दुःख को अपनी आँखों से देखे!

जब सारे दरबारी सुख से सो रहे थे, सम्राट विक्रमादित्य ने नीले मोटे वस्त्र धारण किए और प्रच्छन्न यात्री बनकर गुप्त द्वार से नगर-निरीक्षण हेतु निकले।

सम्राट विक्रमादित्य

राजा वही है जो प्रजा के गुप्त दुःख को अपनी आँखों से देखे!

Panel 8
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Vikramaditya walks through flooded lanes, observing the darkened homes of sleeping citizens

घुटनों तक भरे जल और कीचड़ में चलते हुए सम्राट विद्वानों की बस्ती की संकरी गलियों में पहुँचे।

Panel 9
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In a narrow lane, a faint warm light flickers through the cracked window of a leaking thatch hut

एक टूटी-फूटी टपकती हुई फूस की कुटिया के झरोखे से मिट्टी के दीये का क्षीण प्रकाश बाहर आ रहा था।

Panel 10
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Vikramaditya looks through the shutter, seeing Pandit Devadatta writing Sanskrit manuscripts

सम्राट ने झरोखे से देखा; साठ वर्षीय दुर्बल संस्कृत वैयाकरण पण्डित देवदत्त फटे वस्त्रों में शान्त भाव से ताड़पत्रों पर पावन ग्रन्थ लिख रहे थे।

Panel 11
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Beside the scholar, his wife Arundhati weeps quietly over an empty cold hearth

पास ही उनकी धर्मपत्नी अरुन्धती ठण्डे चूल्हे के पास बैठी सूखी आँखों से आँसू बहा रही थीं; घर में तीन दिनों से अन्न का एक दाना न था।

Panel 12
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दृश्य 3

स्वाभिमानी पण्डित का धर्म-संवाद और सम्राट की आँखें

The Scholar
Arundhati pleads: 'Husband, we have had no food for three days; go to Vikramaditya's court!'
अरुन्धती
महाराज विक्रमादित्य महादानी हैं; वे विद्वानों को कभी भूखा नहीं रहने देते!

अरुन्धती ने कातर स्वर में कहा: 'स्वामी! तीन दिन से पेट में अन्न नहीं है; कल प्रातःकाल सम्राट विक्रमादित्य के राज-दरबार में जाकर भिक्षा माँग लीजिए!'

अरुन्धती

महाराज विक्रमादित्य महादानी हैं; वे विद्वानों को कभी भूखा नहीं रहने देते!

Panel 13
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Pandit Devadatta smiles with dignity: 'A true scholar never sells his learning or begs before kings!'
पण्डित देवदत्त
देह की क्षुधा मिटाने हेतु मैं सरस्वती का मान नहीं घटा सकता!

पण्डित देवदत्त ने गरिमा से सिर उठाया: 'विद्या बेची नहीं जाती, प्रिये! जो विद्वान राजाओं के आगे हाथ फैलाए, वह अपनी आत्मा का सौदा करता है! जो ईश्वर चिड़ियों को दाना देता है, वह हमारी रक्षा अवश्य करेगा!'

पण्डित देवदत्त

देह की क्षुधा मिटाने हेतु मैं सरस्वती का मान नहीं घटा सकता!

Panel 14
•
Outside in the cold pouring rain, Vikramaditya listens with tears of profound reverence

बाहर तूफानी वर्षा में खड़े सम्राट विक्रमादित्य की आँखों से श्रद्धा के अश्रु बह निकले।

Panel 15
•
Vikramaditya whispers: 'Here lives the true soul of Bharat!'
सम्राट विक्रमादित्य
इस तपस्वी के स्वाभिमान की रक्षा करना मेरा परम धर्म है!

सम्राट ने मन ही मन नमन किया: 'यह है आर्यावर्त का सच्चा प्राण—जो भूखा रहकर भी अपनी आत्मा का स्वाभिमान नहीं त्यागता!'

सम्राट विक्रमादित्य

इस तपस्वी के स्वाभिमान की रक्षा करना मेरा परम धर्म है!

Panel 16
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Vikramaditya resolves: 'I must feed this noble soul in secret so his dignity is never wounded!'

विक्रमादित्य ने संकल्प लिया: 'मैं इन्हें अन्न अवश्य दूँगा, परन्तु इस प्रकार कि इनके स्वाभिमान पर कोई आँच न आए!'

Panel 17
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Vikramaditya turns, sprinting through the flooded midnight streets toward the imperial storehouses

सम्राट बिना क्षण गँवाए तूफानी अँधेरे में राज-भण्डार की ओर दौड़ पड़े।

Panel 18
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दृश्य 4

राज-भण्डार का त्याग, कन्धों पर अन्न का भार और तूफानी यात्रा

The Sovereign Porter Through the Storm
In the palace stores, Vikramaditya personally fills two heavy sacks with wheat, rice, ghee, and honey
सम्राट विक्रमादित्य
यह अन्न किसी राजा का नहीं, साक्षात् अन्नपूर्णा माँ का प्रसाद है!

राज-अन्नागार में पहुँचकर सम्राट ने स्वयं दो भारी बोरियों में उत्तम शरबती गेहूँ, बासमती चावल, शुद्ध गो-घृत के घड़े और शहद भरा।

सम्राट विक्रमादित्य

यह अन्न किसी राजा का नहीं, साक्षात् अन्नपूर्णा माँ का प्रसाद है!

Panel 19
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The Emperor tucks a velvet pouch of five hundred unmarked gold coins inside the sack

अन्न की बोरी के भीतर सम्राट ने पाँच सौ निष्कलंक स्वर्ण-मुद्राओं की मखमली थैली गुप्त रूप से रख दी।

Panel 20
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Refusing guards or carts, Vikramaditya heaves both heavy grain sacks onto his own shoulders
सम्राट विक्रमादित्य
प्रजा का अन्न-भार राजा के कन्धों पर ही शोभित होता है!

किसी सेवक या राजसी बैलगाड़ी को लिए बिना, सम्राट विक्रमादित्य ने दोनों भारी बोरियाँ स्वयं अपने राजसी कन्धों पर उठा लीं!

सम्राट विक्रमादित्य

प्रजा का अन्न-भार राजा के कन्धों पर ही शोभित होता है!

Panel 21
•
The Emperor trudges through knee-deep mud and howling wind, lightning illuminating his face

बिजली की कौंध में आर्यावर्त के चक्रवर्ती सम्राट कीचड़ और मूसलाधार पानी में एक साधारण भारवाहक की भाँति कदम बढ़ाते रहे!

Panel 22
•
Vikramaditya reaches the dark hut, quietly setting down the heavy grain sacks under the thatch eaves
सम्राट विक्रमादित्य
हे प्रभु! यह पावन भेंट इस विद्वान के स्वाभिमान की ढाल बने।

पण्डित की कुटिया पर पहुँचकर सम्राट ने बिना कोई पदचाप किए सारा अन्न, घृत और सुवर्ण छप्पर के नीचे सूखे स्थान पर रख दिया।

सम्राट विक्रमादित्य

हे प्रभु! यह पावन भेंट इस विद्वान के स्वाभिमान की ढाल बने।

Panel 23
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Vikramaditya knocks firmly three times on the wooden door, whispering a sacred blessing
सम्राट विक्रमादित्य
हे धर्मपरायण आचार्य! जगदीश्वर ने आपकी निष्ठा को स्वीकार किया है; यह देव-प्रसाद ग्रहण करें!

सम्राट ने काष्ठ-कपाट पर तीन बार दृढ़ता से खटखटाया और मधुर स्वर में पुकारा:

सम्राट विक्रमादित्य

हे धर्मपरायण आचार्य! जगदीश्वर ने आपकी निष्ठा को स्वीकार किया है; यह देव-प्रसाद ग्रहण करें!

Panel 24
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दृश्य 5

गुप्त-दान का चमत्कार, प्रभात का उल्लास और मौन कृतज्ञता

The Anonymous Blessing & Morning Wonder
Vikramaditya calls through the door, offering the divine prasada

कपाट खुलने की आहट होते ही सम्राट जल-मिश्रित अन्धकार में अदृश्य हो गए, जैसे कोई दिव्य दूत आया और चला गया हो।

Panel 25
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Before the latch turns, Vikramaditya vanishes like a phantom into the dark rainy alleyways

अन्धकार और वर्षा ने सम्राट के पदचिह्नों को उसी क्षण धो दिया।

Panel 26
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Devadatta and Arundhati open the door, gasping in astonishment at the provisions and gold
पण्डित देवदत्त
अरुन्धती! देखो! प्रभु ने हमारे स्वाभिमान को झुकने नहीं दिया!

पण्डित देवदत्त और अरुन्धती ने द्वार खोला; द्वार पर अन्न का भण्डार, घृत और स्वर्ण-मुद्राएँ देखकर वे स्तम्भित रह गए!

पण्डित देवदत्त

अरुन्धती! देखो! प्रभु ने हमारे स्वाभिमान को झुकने नहीं दिया!

Panel 27
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The scholar and his wife kneel in the rain, weeping tears of overwhelmed gratitude

दम्पति ने वर्षा में घुटने टेककर हाथ जोड़े और उस अज्ञात दानी व जगदीश्वर के प्रति अश्रुपूरित कृतज्ञता प्रकट की।

Panel 28
•
Next morning, brilliant golden sunlight dries the streets of Ujjayini as the royal court convenes

अगले प्रभात उज्जयिनी के राजसभा में सूर्य की उज्ज्वल किरणें खिलीं और विद्वानों की मण्डली दरबार में एकत्रित हुई।

Panel 29
•
In the assembly hall, Vikramaditya sees the scholar standing with radiant dignity, sharing a smile
सम्राट विक्रमादित्य
विद्वान का तेज ही साम्राज्य का सच्चा प्रकाश है।

दरबार में सम्राट ने पण्डित देवदत्त को तृप्त और तेजस्वी मुखमण्डल के साथ देखा; दोनों के नेत्र मिले और एक मौन, आत्मिक मुस्कान का आदान-प्रदान हुआ!

सम्राट विक्रमादित्य

विद्वान का तेज ही साम्राज्य का सच्चा प्रकाश है।

Panel 30
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दृश्य 6

वैदेही का निर्णय और राजा भोज का संकोच

Vaidehi
Back in Dharanagari palace, Vaidehi looks directly at King Bhoja with glowing diamond eyes

धारानगरी के सभा-भवन में सजीव पुतली वैदेही ने राजा भोज को गम्भीर हीरक-नयनों से देखा।

Panel 31
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Vaidehi challenges: 'Have you ever carried heavy sacks of grain on your own shoulders?'
पुतली वैदेही
अब कहो, राजा भोज—क्या तुमने कभी तूफानी आधी रात में अपने कन्धों पर अन्न ढोकर किसी स्वाभिमानी भूखे विद्वान के घर बिना नाम बताए गुप्त सत्कार पहुँचाया है? यदि ऐसा निष्काम गुप्त-दान और नम्रता तुममें है, तो कदम बढ़ाओ! अन्यथा लौट जाओ!

वैदेही ने अट्ठाईसवीं सीढ़ी की चुनौती दी:

पुतली वैदेही

अब कहो, राजा भोज—क्या तुमने कभी तूफानी आधी रात में अपने कन्धों पर अन्न ढोकर किसी स्वाभिमानी भूखे विद्वान के घर बिना नाम बताए गुप्त सत्कार पहुँचाया है? यदि ऐसा निष्काम गुप्त-दान और नम्रता तुममें है, तो कदम बढ़ाओ! अन्यथा लौट जाओ!

Panel 32
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King Bhoja lowers his head in deep humility and introspection, acknowledging Vikramaditya's humility
राजा भोज
मुझमें विक्रमादित्य जैसी निशीथ-सेवा, स्वयं अपने कन्धों पर भार ढोने की अगाध नम्रता और गुप्त-दान के द्वारा स्वाभिमान की रक्षा करने का शील नहीं है, देवि। मैं इस अट्ठाईसवीं सीढ़ी के भी योग्य नहीं हूँ।

राजा भोज ने लज्जा और श्रद्धा से सिर झुका लिया:

राजा भोज

मुझमें विक्रमादित्य जैसी निशीथ-सेवा, स्वयं अपने कन्धों पर भार ढोने की अगाध नम्रता और गुप्त-दान के द्वारा स्वाभिमान की रक्षा करने का शील नहीं है, देवि। मैं इस अट्ठाईसवीं सीढ़ी के भी योग्य नहीं हूँ।

Panel 33
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King Bhoja steps down from the twenty-eighth step, ordering anonymous scholar welfare stipends

राजा भोज अट्ठाईसवीं सीढ़ी से नीचे उतरे और धारानगरी तथा पूरे मालवा में विद्वानों हेतु गुप्त-वृत्तियाँ, रात्रि-कालीन संकट-निरीक्षण दल और सम्मान-युक्त अन्न-कोष स्थापित करने की आज्ञा दी।

Panel 34
•
King Bhoja issues royal proclamations establishing anonymous scholar welfare stipends

राज्य-भर में स्वाभिमानी निर्धन परिवारों की पहचान कर उन्हें बिना लज्जित किए गुप्त सहायता देने के विशेष आदेश जारी हुए।

Panel 35
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Twilight conches echo across Dharanagari as Vaidehi smiles and freezes back into silent bronze

संध्याकाल के शंख गूँज उठे और वैदेही मन्द मुस्कान के साथ पुनः मौन कांस्य-प्रतिमा बन गई। **सिंहासन बत्तीसी का अट्ठाईसवाँ दिन सम्पन्न हुआ!**

Panel 36
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The remaining four celestial statues gleam in the evening torchlight, awaiting the twenty-ninth test

शेष चार कांस्य-पुतलियाँ सन्ध्या की मशालों में जगमगाती रहीं, उनतीसवीं पुतली (मानवती) की अमर गाथा की प्रतीक्षा करते हुए।

Panel 37
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King Bhoja departs the throne hall in quiet contemplation, inspired by Vikramaditya's humility
राजा भोज
"कल प्रातःकाल हम उनतीसवीं सीढ़ी पर कदम रखेंगे और उनतीसवीं पुतली—मानवती—की अमर गाथा सुनेंगे!"

राजा भोज गुप्त-दान और सेवा की पावन भावना को हृदय में संजोकर मौन भाव से राजसभा से प्रस्थान कर गए।

राजा भोज

"कल प्रातःकाल हम उनतीसवीं सीढ़ी पर कदम रखेंगे और उनतीसवीं पुतली—मानवती—की अमर गाथा सुनेंगे!"

Panel 38
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