अष्टाविंशति पुतली वैदेही: निशीथ प्रच्छन्न-भ्रमण, स्वाभिमानी ब्राह्मण की क्षुधा और गुप्त अन्न-सत्कार
The Twenty-Eighth Statue: Vaidehi & The Secret Feast of Dignity
अट्ठाईसवाँ सूर्योदय और वैदेही का प्रबोधन
The Twenty-Eighth Dawn & Vaidehi
अट्ठाईसवें प्रभात की स्वर्णिम किरणों ने धारानगरी के राजप्रासाद को आलोकित किया, जहाँ राजा भोज ने पूर्ण निष्ठा से अपनी साधना पूर्ण की।

केसरिया परिधान धारण कर राजा भोज विनीत चरणों से अट्ठाईसवीं सीढ़ी की ओर बढ़े।

जैसे ही राजा का चरण अट्ठाईसवीं सीढ़ी के निकट पहुँचा, मणिक वेदी स्फटिक-हीरक और सूर्य-लोहित दिव्य प्रकाश से प्रदीप्त हो उठी!

अट्ठाईसवीं कांस्य-पुतली—वैदेही—की हीरक-नयन खुले और वह सुवर्ण-दीप व फल-पात्र हाथ में लिए दिव्य हँसी के साथ सजीव हो उठी!
ठहरो, राजा भोज! इस अट्ठाईसवीं सीढ़ी पर कदम रखने का दुस्साहस मत करो!

राजा भोज ने नतमस्तक होकर हाथ जोड़े और सुवर्ण-दीप धारण की हुई पुतली की ओर देखा।
हे वैदेही देवि! विक्रमादित्य के किस गुप्त-दान और प्रजा-रक्षण की अमर गाथा आज आप मुझे सुनाना चाहती हैं?

वैदेही ने सुवर्ण-दीप उठाकर गम्भीर वाणी में कहा:
क्या तुममें विक्रमादित्य जैसा गुप्त-दान, निशीथ-भ्रमण की सजगता और स्वाभिमानी निर्धनों के सम्मान की रक्षा करने की नम्रता है, जब उन्होंने तूफानी आधी रात में अपने कन्धों पर अन्न की बोरियाँ ढोकर एक भूखे विद्वान के घर बिना नाम बताए गुप्त सत्कार पहुँचाया?
उज्जयिनी की तूफानी आधी रात और सम्राट का प्रच्छन्न-भ्रमण
The Stormy Midnight Patrol of Ujjayini
मध्यरात्रि में मूसलाधार वर्षा और गर्जना के साथ उज्जयिनी की गलियों में तूफानी अन्धकार छा गया।

जब सारे दरबारी सुख से सो रहे थे, सम्राट विक्रमादित्य ने नीले मोटे वस्त्र धारण किए और प्रच्छन्न यात्री बनकर गुप्त द्वार से नगर-निरीक्षण हेतु निकले।
राजा वही है जो प्रजा के गुप्त दुःख को अपनी आँखों से देखे!

घुटनों तक भरे जल और कीचड़ में चलते हुए सम्राट विद्वानों की बस्ती की संकरी गलियों में पहुँचे।

एक टूटी-फूटी टपकती हुई फूस की कुटिया के झरोखे से मिट्टी के दीये का क्षीण प्रकाश बाहर आ रहा था।

सम्राट ने झरोखे से देखा; साठ वर्षीय दुर्बल संस्कृत वैयाकरण पण्डित देवदत्त फटे वस्त्रों में शान्त भाव से ताड़पत्रों पर पावन ग्रन्थ लिख रहे थे।

पास ही उनकी धर्मपत्नी अरुन्धती ठण्डे चूल्हे के पास बैठी सूखी आँखों से आँसू बहा रही थीं; घर में तीन दिनों से अन्न का एक दाना न था।
स्वाभिमानी पण्डित का धर्म-संवाद और सम्राट की आँखें
The Scholar
अरुन्धती ने कातर स्वर में कहा: 'स्वामी! तीन दिन से पेट में अन्न नहीं है; कल प्रातःकाल सम्राट विक्रमादित्य के राज-दरबार में जाकर भिक्षा माँग लीजिए!'
महाराज विक्रमादित्य महादानी हैं; वे विद्वानों को कभी भूखा नहीं रहने देते!

पण्डित देवदत्त ने गरिमा से सिर उठाया: 'विद्या बेची नहीं जाती, प्रिये! जो विद्वान राजाओं के आगे हाथ फैलाए, वह अपनी आत्मा का सौदा करता है! जो ईश्वर चिड़ियों को दाना देता है, वह हमारी रक्षा अवश्य करेगा!'
देह की क्षुधा मिटाने हेतु मैं सरस्वती का मान नहीं घटा सकता!

बाहर तूफानी वर्षा में खड़े सम्राट विक्रमादित्य की आँखों से श्रद्धा के अश्रु बह निकले।

सम्राट ने मन ही मन नमन किया: 'यह है आर्यावर्त का सच्चा प्राण—जो भूखा रहकर भी अपनी आत्मा का स्वाभिमान नहीं त्यागता!'
इस तपस्वी के स्वाभिमान की रक्षा करना मेरा परम धर्म है!

विक्रमादित्य ने संकल्प लिया: 'मैं इन्हें अन्न अवश्य दूँगा, परन्तु इस प्रकार कि इनके स्वाभिमान पर कोई आँच न आए!'

सम्राट बिना क्षण गँवाए तूफानी अँधेरे में राज-भण्डार की ओर दौड़ पड़े।
राज-भण्डार का त्याग, कन्धों पर अन्न का भार और तूफानी यात्रा
The Sovereign Porter Through the Storm
राज-अन्नागार में पहुँचकर सम्राट ने स्वयं दो भारी बोरियों में उत्तम शरबती गेहूँ, बासमती चावल, शुद्ध गो-घृत के घड़े और शहद भरा।
यह अन्न किसी राजा का नहीं, साक्षात् अन्नपूर्णा माँ का प्रसाद है!

अन्न की बोरी के भीतर सम्राट ने पाँच सौ निष्कलंक स्वर्ण-मुद्राओं की मखमली थैली गुप्त रूप से रख दी।

किसी सेवक या राजसी बैलगाड़ी को लिए बिना, सम्राट विक्रमादित्य ने दोनों भारी बोरियाँ स्वयं अपने राजसी कन्धों पर उठा लीं!
प्रजा का अन्न-भार राजा के कन्धों पर ही शोभित होता है!

बिजली की कौंध में आर्यावर्त के चक्रवर्ती सम्राट कीचड़ और मूसलाधार पानी में एक साधारण भारवाहक की भाँति कदम बढ़ाते रहे!

पण्डित की कुटिया पर पहुँचकर सम्राट ने बिना कोई पदचाप किए सारा अन्न, घृत और सुवर्ण छप्पर के नीचे सूखे स्थान पर रख दिया।
हे प्रभु! यह पावन भेंट इस विद्वान के स्वाभिमान की ढाल बने।

सम्राट ने काष्ठ-कपाट पर तीन बार दृढ़ता से खटखटाया और मधुर स्वर में पुकारा:
हे धर्मपरायण आचार्य! जगदीश्वर ने आपकी निष्ठा को स्वीकार किया है; यह देव-प्रसाद ग्रहण करें!
गुप्त-दान का चमत्कार, प्रभात का उल्लास और मौन कृतज्ञता
The Anonymous Blessing & Morning Wonder
कपाट खुलने की आहट होते ही सम्राट जल-मिश्रित अन्धकार में अदृश्य हो गए, जैसे कोई दिव्य दूत आया और चला गया हो।

अन्धकार और वर्षा ने सम्राट के पदचिह्नों को उसी क्षण धो दिया।

पण्डित देवदत्त और अरुन्धती ने द्वार खोला; द्वार पर अन्न का भण्डार, घृत और स्वर्ण-मुद्राएँ देखकर वे स्तम्भित रह गए!
अरुन्धती! देखो! प्रभु ने हमारे स्वाभिमान को झुकने नहीं दिया!

दम्पति ने वर्षा में घुटने टेककर हाथ जोड़े और उस अज्ञात दानी व जगदीश्वर के प्रति अश्रुपूरित कृतज्ञता प्रकट की।

अगले प्रभात उज्जयिनी के राजसभा में सूर्य की उज्ज्वल किरणें खिलीं और विद्वानों की मण्डली दरबार में एकत्रित हुई।

दरबार में सम्राट ने पण्डित देवदत्त को तृप्त और तेजस्वी मुखमण्डल के साथ देखा; दोनों के नेत्र मिले और एक मौन, आत्मिक मुस्कान का आदान-प्रदान हुआ!
विद्वान का तेज ही साम्राज्य का सच्चा प्रकाश है।
वैदेही का निर्णय और राजा भोज का संकोच
Vaidehi
धारानगरी के सभा-भवन में सजीव पुतली वैदेही ने राजा भोज को गम्भीर हीरक-नयनों से देखा।

वैदेही ने अट्ठाईसवीं सीढ़ी की चुनौती दी:
अब कहो, राजा भोज—क्या तुमने कभी तूफानी आधी रात में अपने कन्धों पर अन्न ढोकर किसी स्वाभिमानी भूखे विद्वान के घर बिना नाम बताए गुप्त सत्कार पहुँचाया है? यदि ऐसा निष्काम गुप्त-दान और नम्रता तुममें है, तो कदम बढ़ाओ! अन्यथा लौट जाओ!

राजा भोज ने लज्जा और श्रद्धा से सिर झुका लिया:
मुझमें विक्रमादित्य जैसी निशीथ-सेवा, स्वयं अपने कन्धों पर भार ढोने की अगाध नम्रता और गुप्त-दान के द्वारा स्वाभिमान की रक्षा करने का शील नहीं है, देवि। मैं इस अट्ठाईसवीं सीढ़ी के भी योग्य नहीं हूँ।

राजा भोज अट्ठाईसवीं सीढ़ी से नीचे उतरे और धारानगरी तथा पूरे मालवा में विद्वानों हेतु गुप्त-वृत्तियाँ, रात्रि-कालीन संकट-निरीक्षण दल और सम्मान-युक्त अन्न-कोष स्थापित करने की आज्ञा दी।

राज्य-भर में स्वाभिमानी निर्धन परिवारों की पहचान कर उन्हें बिना लज्जित किए गुप्त सहायता देने के विशेष आदेश जारी हुए।

संध्याकाल के शंख गूँज उठे और वैदेही मन्द मुस्कान के साथ पुनः मौन कांस्य-प्रतिमा बन गई। **सिंहासन बत्तीसी का अट्ठाईसवाँ दिन सम्पन्न हुआ!**

शेष चार कांस्य-पुतलियाँ सन्ध्या की मशालों में जगमगाती रहीं, उनतीसवीं पुतली (मानवती) की अमर गाथा की प्रतीक्षा करते हुए।

राजा भोज गुप्त-दान और सेवा की पावन भावना को हृदय में संजोकर मौन भाव से राजसभा से प्रस्थान कर गए।
"कल प्रातःकाल हम उनतीसवीं सीढ़ी पर कदम रखेंगे और उनतीसवीं पुतली—मानवती—की अमर गाथा सुनेंगे!"