सप्तविंशति पुतली वसुमती: भूमि में गड़ा स्वर्ण-कलश, दो निष्कपट किसानों का अनूठा विवाद और सम्राट का धर्म-न्याय
The Twenty-Seventh Statue: Vasumati & The Buried Golden Cauldron
सत्ताईसवाँ सूर्योदय और वसुमती का प्रबोधन
The Twenty-Seventh Dawn & Vasumati
सत्ताईसवें प्रभात की स्वर्णिम किरणों ने धारानगरी के राजप्रासाद को आलोकित किया, जहाँ राजा भोज ने पूर्ण निष्ठा से अपनी साधना पूर्ण की।

केसरिया परिधान धारण कर राजा भोज विनीत चरणों से सत्ताईसवीं सीढ़ी की ओर बढ़े।

जैसे ही राजा का चरण सत्ताईसवीं सीढ़ी के निकट पहुँचा, मणिक वेदी वसुन्धरा-स्वर्णिम और मरकत-हरित दिव्य प्रकाश से प्रदीप्त हो उठी!

सत्ताईसवीं कांस्य-पुतली—वसुमती—की स्वर्णिम-नयन खुले और वह सुवर्ण-कलश व प्रफुल्लित कमल-नाल हाथ में लिए दिव्य हँसी के साथ सजीव हो उठी!
ठहरो, राजा भोज! इस सत्ताईसवीं सीढ़ी पर कदम रखने का दुस्साहस मत करो!

राजा भोज ने नतमस्तक होकर हाथ जोड़े और सुवर्ण-कलश धारण की हुई पुतली की ओर देखा।
हे वसुमती देवि! विक्रमादित्य के किस धर्म-न्याय और अनासक्त राज-धर्म की पावन गाथा आज आप मुझे सुनाना चाहती हैं?

वसुमती ने सुवर्ण-कलश उठाकर गम्भीर वाणी में कहा:
क्या तुममें विक्रमादित्य जैसा धर्म-न्याय और राजकोषीय अनासक्ति का तेज है, जब भूमि में गड़े दस लाख स्वर्ण-मुद्राओं के कलश को दो निष्कपट किसानों ने लेने से इनकार कर दिया, और सम्राट ने एक भी सिक्का राजकोष में डाले बिना दोनों परिवारों को वैवाहिक सम्बन्ध से जोड़कर धर्म की रक्षा की?
बंजर खेत का क्रय-विक्रय, हल का आघात और स्वर्ण-कलश का प्राकट्य
The Sale of the Barren Field & The Unearthed Cauldron
अवन्ति के एक कृषक-ग्राम में निर्धन किसान हरिदत्त ने अपनी पथरीली बंजर भूमि पचास चाँदी के सिक्कों में अपने पड़ोसी सोमदत्त को बेच दी।

प्रथम वर्षा के आगमन पर सोमदत्त अपने श्वेत बैलों की जोड़ी के साथ खेत की गहरी जुताई कर रहा था।

अचानक हल का फाल धरती के भीतर एक भारी धातु-पात्र से टकराया और खनकती ध्वनि के साथ बैल ठिठक कर खड़े हो गए।

सोमदत्त ने मिट्टी हटाई; नीचे ताँबे के पट्टों से बँधा एक विशाल प्राचीन मृत्तिका-कलश निकला!
अरे! यह तो बहुत भारी कलश है!

कलश का ढक्कन खोलते ही धूप में जगमगाती हुई **दस लाख प्राचीन स्वर्ण-मुद्राएँ** (सुवर्ण-मुद्रा) बाहर छलकने लगीं!
हे नारायण! यह धन मेरा नहीं है; यह तो भूमि बेचने वाले भाई हरिदत्त के पूर्वजों की धरोहर है!

सोमदत्त ने रत्ती-भर भी लोभ किए बिना वह भारी स्वर्ण-कलश सिर पर उठाया और सीधे हरिदत्त के द्वार पर ले जाकर रख दिया।
भाई हरिदत्त! मैंने केवल अन्न उगाने हेतु ऊपरी मिट्टी खरीदी थी; यह गड़ा हुआ सुवर्ण तुम्हारा है, इसे संभालो!
उज्जयिनी की राजसभा और त्याग का अनोखा मुकदमा
The Extraordinary Dispute Before the Imperial Throne
हरिदत्त ने हाथ जोड़कर लेने से इनकार कर दिया: 'मैंने वह भूमि घास से लेकर पाताल तक पूर्ण रूप से बेच दी है! अब इसमें जो भी निकला, वह तुम्हारे भाग्य का है; इसे छूना मेरे लिए पाप है!'
बेची हुई भूमि से सोना लेना अधर्म है, सोमदत्त!

जब दोनों में कोई भी सोना लेने को तैयार न हुआ, तो वे दोनों मिलकर स्वर्ण-कलश को सम्राट विक्रमादित्य के सभागार में ले आए।

दोनों किसान सम्राट के चरणों में गिर पड़े; प्रत्येक किसान हाथ जोड़कर विनती कर रहा था कि यह सारा सोना दूसरे को दिलवा दिया जाए!
महाराज! न्याय कीजिए और यह सोना इसे दिला दीजिए!

दरबारी और मन्त्री स्तब्ध रह गए; संसार की अदालतों में लोग धन छीनने हेतु लड़ते हैं, परन्तु यहाँ दो निर्धन किसान धन त्यागने हेतु विवाद कर रहे थे!

राज-कोषाध्यक्ष ने विक्रमादित्य के कान में फुसफुसाया: 'महाराज! लावारिस गड़ा खजाना राजकोष की सम्पत्ति होता है; इसे राज-भण्डार में जमा कर लीजिए!'
यह दस लाख मुद्राएँ राजकोष की शोभा बढ़ाएँगी, महाराज!

विक्रमादित्य ने कोषाध्यक्ष को फटकारते हुए कहा: 'जो राजा अपनी प्रजा के पावन सत्य और त्याग से उत्पन्न धन को हड़प ले, वह पापी है! यह धन धर्म के कार्य में लगेगा!'
प्रजा की निष्कपटता ही राज्य का सच्चा मुकुट है!
सम्राट की पारिवारिक पूछताछ और विवाह का दिव्य निर्णय
The Royal Investigation & Matrimonial Solution
विक्रमादित्य ने स्नेहपूर्वक दोनों किसानों से उनके परिवार और सन्तानों के विषय में पूछा।

हरिदत्त ने बताया कि उसकी अठारह वर्षीय सुशील, धर्मपरायण और गुणवती कन्या 'पद्मावती' है।

सोमदत्त ने बताया कि उसका बीस वर्षीय कर्मठ, सदाचारी और परिश्रमी कृषक पुत्र 'वासुदेव' है।
महाराज! मेरा पुत्र वासुदेव दिन-रात धरती की सेवा करता है!

विक्रमादित्य के मुख पर दिव्य मुस्कान खिल उठी: 'यदि दोनों पुण्यात्मा पिता इस धन को स्वीकार नहीं करते, तो यह स्वर्ण-कलश वासुदेव और पद्मावती के पावन विवाह का उपहार बनेगा, जिससे आर्यावर्त के दो निष्कपट कुल समधी बन जाएँ!'
सत्य का फल सदैव प्रेम और सम्बन्धों में खिलता है!

दोनों किसान आनन्द के अश्रुओं से सम्राट के चरणों में झुक गए और एक-दूसरे को गले लगाकर समधी बनने का सहर्ष स्वीकार किया!
महाराज के न्याय ने हमारे विवाद को अमृत-सम्बन्ध में बदल दिया!

सभागार जयकारों से गूँज उठा; सम्राट के इस धर्म-न्याय ने न्यायशास्त्र के इतिहास में एक स्वर्णिम अध्याय जोड़ दिया!
राजसी विवाह, जल-बावड़ियों का निर्माण और लोक-कल्याण
The Grand Wedding & Public Welfare Stepwells
उज्जयिनी के राजप्रासाद में सम्राट के सान्निध्य में वासुदेव और पद्मावती का भव्य और पावन विवाह वैदिक मन्त्रोच्चार के साथ सम्पन्न हुआ।

विक्रमादित्य ने स्वयं वर-वधू पर पुष्प-वर्षा कर पिता के समान अपना आशीर्वाद प्रदान किया।

दस लाख स्वर्ण-मुद्राओं का न्यायपूर्ण विभाजन हुआ—पाँच लाख मुद्राएँ नव-दम्पति को कृषि-सम्पत्ति निर्माण हेतु दी गईं, और शेष पाँच लाख लोक-कल्याण में समर्पित हुईं।

उस पवित्र धन से पूरे प्रान्त में विशाल पाषाण-बावड़ियाँ, सिंचाई की नहरें और पशुओं हेतु जल-कुण्ड बनवाए गए।

राजमार्गों पर यात्रियों हेतु निःशुल्क धर्मशालाएँ और किसानों हेतु सार्वजनिक अन्न-भण्डार खोले गए।

अवन्ति के खेत लहलहा उठे और गाँव-गाँव में सत्य व त्याग का उत्सव मनाया गया; प्रजा के धर्म ने समूचे राष्ट्र को आलोकित कर दिया!
वसुमती का निर्णय और राजा भोज का संकोच
Vasumati
धारानगरी के सभा-भवन में सजीव पुतली वसुमती ने राजा भोज को गम्भीर वसुन्धरा-नयनों से देखा।

वसुमती ने सत्ताईसवीं सीढ़ी की चुनौती दी:
अब कहो, राजा भोज—क्या तुमने कभी लावारिस गड़े खजाने को राजकोष में भरने के लोभ को त्यागकर दो निष्कपट किसानों के सन्तानों का विवाह कराया है? यदि ऐसा धर्म-न्याय और अनासक्ति तुममें है, तो कदम बढ़ाओ! अन्यथा लौट जाओ!

राजा भोज ने लज्जा और श्रद्धा से सिर झुका लिया:
मुझमें विक्रमादित्य जैसा अचल धर्म-न्याय, भूमि में गड़े सुवर्ण के लोभ से पूर्णतः मुक्त रहने का विवेक और प्रजा के त्याग को पूजने का शील नहीं है, देवि। मैं इस सत्ताईसवीं सीढ़ी के भी योग्य नहीं हूँ।

राजा भोज सत्ताईसवीं सीढ़ी से नीचे उतरे और धारानगरी तथा पूरे मालवा में किसान-भूमि स्वामित्व संरक्षण, गड़े खजाने पर किसानों के अधिकार और ग्रामीण सिंचाई कोष स्थापित करने की आज्ञा दी।

राज्य-भर में किसानों के भूमि-अधिकारों की रक्षा और जल-स्रोतों के निर्माण हेतु विशेष न्यासों का गठन हुआ।

संध्याकाल के शंख गूँज उठे और वसुमती मन्द मुस्कान के साथ पुनः मौन कांस्य-प्रतिमा बन गई। **सिंहासन बत्तीसी का सत्ताईसवाँ दिन सम्पन्न हुआ!**

शेष पाँच कांस्य-पुतलियाँ सन्ध्या की मशालों में जगमगाती रहीं, अट्ठाईसवीं पुतली (वैदेही) की अमर गाथा की प्रतीक्षा करते हुए।

राजा भोज धर्म-न्याय और प्रजा-सत्कार के पावन सत्यों को हृदय में संजोकर मौन भाव से राजसभा से प्रस्थान कर गए।
"कल प्रातःकाल हम अट्ठाईसवीं सीढ़ी पर कदम रखेंगे और अट्ठाईसवीं पुतली—वैदेही—की अमर गाथा सुनेंगे!"