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सप्तविंशति पुतली वसुमती: भूमि में गड़ा स्वर्ण-कलश, दो निष्कपट किसानों का अनूठा विवाद और सम्राट का धर्म-न्याय

सिंहासन बत्तीसी (३२ पुतलियों की अमर गाथा)• katha

सप्तविंशति पुतली वसुमती: भूमि में गड़ा स्वर्ण-कलश, दो निष्कपट किसानों का अनूठा विवाद और सम्राट का धर्म-न्याय

The Twenty-Seventh Statue: Vasumati & The Buried Golden Cauldron

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दृश्य 1

सत्ताईसवाँ सूर्योदय और वसुमती का प्रबोधन

The Twenty-Seventh Dawn & Vasumati
Morning sunlight streams across the sandstone colonnade onto the 32-step golden throne

सत्ताईसवें प्रभात की स्वर्णिम किरणों ने धारानगरी के राजप्रासाद को आलोकित किया, जहाँ राजा भोज ने पूर्ण निष्ठा से अपनी साधना पूर्ण की।

Panel 1
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King Bhoja in sacred saffron silks approaches the twenty-seventh step of the throne

केसरिया परिधान धारण कर राजा भोज विनीत चरणों से सत्ताईसवीं सीढ़ी की ओर बढ़े।

Panel 2
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The marble dais erupts with brilliant earth-golden and emerald-green radiance

जैसे ही राजा का चरण सत्ताईसवीं सीढ़ी के निकट पहुँचा, मणिक वेदी वसुन्धरा-स्वर्णिम और मरकत-हरित दिव्य प्रकाश से प्रदीप्त हो उठी!

Panel 3
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The twenty-seventh carved statue Vasumati opens her glowing earth-golden eyes, laughing musically
पुतली वसुमती
ठहरो, राजा भोज! इस सत्ताईसवीं सीढ़ी पर कदम रखने का दुस्साहस मत करो!

सत्ताईसवीं कांस्य-पुतली—वसुमती—की स्वर्णिम-नयन खुले और वह सुवर्ण-कलश व प्रफुल्लित कमल-नाल हाथ में लिए दिव्य हँसी के साथ सजीव हो उठी!

पुतली वसुमती

ठहरो, राजा भोज! इस सत्ताईसवीं सीढ़ी पर कदम रखने का दुस्साहस मत करो!

Panel 4
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King Bhoja halts in deep reverence with folded hands, gazing at the living bronze maiden
राजा भोज
हे वसुमती देवि! विक्रमादित्य के किस धर्म-न्याय और अनासक्त राज-धर्म की पावन गाथा आज आप मुझे सुनाना चाहती हैं?

राजा भोज ने नतमस्तक होकर हाथ जोड़े और सुवर्ण-कलश धारण की हुई पुतली की ओर देखा।

राजा भोज

हे वसुमती देवि! विक्रमादित्य के किस धर्म-न्याय और अनासक्त राज-धर्म की पावन गाथा आज आप मुझे सुनाना चाहती हैं?

Panel 5
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Vasumati speaks: 'Do you possess the judicial purity of Vikramaditya?'
पुतली वसुमती
क्या तुममें विक्रमादित्य जैसा धर्म-न्याय और राजकोषीय अनासक्ति का तेज है, जब भूमि में गड़े दस लाख स्वर्ण-मुद्राओं के कलश को दो निष्कपट किसानों ने लेने से इनकार कर दिया, और सम्राट ने एक भी सिक्का राजकोष में डाले बिना दोनों परिवारों को वैवाहिक सम्बन्ध से जोड़कर धर्म की रक्षा की?

वसुमती ने सुवर्ण-कलश उठाकर गम्भीर वाणी में कहा:

पुतली वसुमती

क्या तुममें विक्रमादित्य जैसा धर्म-न्याय और राजकोषीय अनासक्ति का तेज है, जब भूमि में गड़े दस लाख स्वर्ण-मुद्राओं के कलश को दो निष्कपट किसानों ने लेने से इनकार कर दिया, और सम्राट ने एक भी सिक्का राजकोष में डाले बिना दोनों परिवारों को वैवाहिक सम्बन्ध से जोड़कर धर्म की रक्षा की?

Panel 6
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दृश्य 2

बंजर खेत का क्रय-विक्रय, हल का आघात और स्वर्ण-कलश का प्राकट्य

The Sale of the Barren Field & The Unearthed Cauldron
In a sunlit village of Avanti, Haridatta sells a rocky barren field to neighbor Somadatta

अवन्ति के एक कृषक-ग्राम में निर्धन किसान हरिदत्त ने अपनी पथरीली बंजर भूमि पचास चाँदी के सिक्कों में अपने पड़ोसी सोमदत्त को बेच दी।

Panel 7
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Somadatta guides a pair of white bullocks with a wooden plow across the dark fertile soil

प्रथम वर्षा के आगमन पर सोमदत्त अपने श्वेत बैलों की जोड़ी के साथ खेत की गहरी जुताई कर रहा था।

Panel 8
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The iron plowshare strikes a hard object beneath a furrow with a sharp metallic clatter

अचानक हल का फाल धरती के भीतर एक भारी धातु-पात्र से टकराया और खनकती ध्वनि के साथ बैल ठिठक कर खड़े हो गए।

Panel 9
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Somadatta digs into the black loam with his bare hands, pulling out a massive ancient cauldron
कृषक सोमदत्त
अरे! यह तो बहुत भारी कलश है!

सोमदत्त ने मिट्टी हटाई; नीचे ताँबे के पट्टों से बँधा एक विशाल प्राचीन मृत्तिका-कलश निकला!

कृषक सोमदत्त

अरे! यह तो बहुत भारी कलश है!

Panel 10
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The cauldron is filled to the brim with one million sparkling ancient gold coins
कृषक सोमदत्त
हे नारायण! यह धन मेरा नहीं है; यह तो भूमि बेचने वाले भाई हरिदत्त के पूर्वजों की धरोहर है!

कलश का ढक्कन खोलते ही धूप में जगमगाती हुई **दस लाख प्राचीन स्वर्ण-मुद्राएँ** (सुवर्ण-मुद्रा) बाहर छलकने लगीं!

कृषक सोमदत्त

हे नारायण! यह धन मेरा नहीं है; यह तो भूमि बेचने वाले भाई हरिदत्त के पूर्वजों की धरोहर है!

Panel 11
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Somadatta carries the heavy cauldron directly to Haridatta's cottage
कृषक सोमदत्त
भाई हरिदत्त! मैंने केवल अन्न उगाने हेतु ऊपरी मिट्टी खरीदी थी; यह गड़ा हुआ सुवर्ण तुम्हारा है, इसे संभालो!

सोमदत्त ने रत्ती-भर भी लोभ किए बिना वह भारी स्वर्ण-कलश सिर पर उठाया और सीधे हरिदत्त के द्वार पर ले जाकर रख दिया।

कृषक सोमदत्त

भाई हरिदत्त! मैंने केवल अन्न उगाने हेतु ऊपरी मिट्टी खरीदी थी; यह गड़ा हुआ सुवर्ण तुम्हारा है, इसे संभालो!

Panel 12
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दृश्य 3

उज्जयिनी की राजसभा और त्याग का अनोखा मुकदमा

The Extraordinary Dispute Before the Imperial Throne
Haridatta waves his hands in refusal: 'I sold the entire field from grass to bedrock!'
कृषक हरिदत्त
बेची हुई भूमि से सोना लेना अधर्म है, सोमदत्त!

हरिदत्त ने हाथ जोड़कर लेने से इनकार कर दिया: 'मैंने वह भूमि घास से लेकर पाताल तक पूर्ण रूप से बेच दी है! अब इसमें जो भी निकला, वह तुम्हारे भाग्य का है; इसे छूना मेरे लिए पाप है!'

कृषक हरिदत्त

बेची हुई भूमि से सोना लेना अधर्म है, सोमदत्त!

Panel 13
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In the grand audience hall of Ujjayini, the two peasants present the heavy golden cauldron

जब दोनों में कोई भी सोना लेने को तैयार न हुआ, तो वे दोनों मिलकर स्वर्ण-कलश को सम्राट विक्रमादित्य के सभागार में ले आए।

Panel 14
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Both peasants kneel before the throne, each pleading with the Emperor to award gold to the other
दोनों किसान
महाराज! न्याय कीजिए और यह सोना इसे दिला दीजिए!

दोनों किसान सम्राट के चरणों में गिर पड़े; प्रत्येक किसान हाथ जोड़कर विनती कर रहा था कि यह सारा सोना दूसरे को दिलवा दिया जाए!

दोनों किसान

महाराज! न्याय कीजिए और यह सोना इसे दिला दीजिए!

Panel 15
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Ministers and nobles look on in utter amazement at two poor peasants fighting to surrender gold

दरबारी और मन्त्री स्तब्ध रह गए; संसार की अदालतों में लोग धन छीनने हेतु लड़ते हैं, परन्तु यहाँ दो निर्धन किसान धन त्यागने हेतु विवाद कर रहे थे!

Panel 16
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The royal treasurer whispers to Vikramaditya: 'Treasure without an heir belongs to the crown!'
राज-कोषाध्यक्ष
यह दस लाख मुद्राएँ राजकोष की शोभा बढ़ाएँगी, महाराज!

राज-कोषाध्यक्ष ने विक्रमादित्य के कान में फुसफुसाया: 'महाराज! लावारिस गड़ा खजाना राजकोष की सम्पत्ति होता है; इसे राज-भण्डार में जमा कर लीजिए!'

राज-कोषाध्यक्ष

यह दस लाख मुद्राएँ राजकोष की शोभा बढ़ाएँगी, महाराज!

Panel 17
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Vikramaditya proclaims: 'A king who steals gold born of his peasants' honesty commits a sin!'
सम्राट विक्रमादित्य
प्रजा की निष्कपटता ही राज्य का सच्चा मुकुट है!

विक्रमादित्य ने कोषाध्यक्ष को फटकारते हुए कहा: 'जो राजा अपनी प्रजा के पावन सत्य और त्याग से उत्पन्न धन को हड़प ले, वह पापी है! यह धन धर्म के कार्य में लगेगा!'

सम्राट विक्रमादित्य

प्रजा की निष्कपटता ही राज्य का सच्चा मुकुट है!

Panel 18
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दृश्य 4

सम्राट की पारिवारिक पूछताछ और विवाह का दिव्य निर्णय

The Royal Investigation & Matrimonial Solution
Vikramaditya gently inquires about their households and children

विक्रमादित्य ने स्नेहपूर्वक दोनों किसानों से उनके परिवार और सन्तानों के विषय में पूछा।

Panel 19
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Haridatta reveals he has a virtuous, educated 18yo daughter named Padmavati

हरिदत्त ने बताया कि उसकी अठारह वर्षीय सुशील, धर्मपरायण और गुणवती कन्या 'पद्मावती' है।

Panel 20
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Somadatta reveals he has an industrious, noble 20yo farmer son named Vasudeva
कृषक सोमदत्त
महाराज! मेरा पुत्र वासुदेव दिन-रात धरती की सेवा करता है!

सोमदत्त ने बताया कि उसका बीस वर्षीय कर्मठ, सदाचारी और परिश्रमी कृषक पुत्र 'वासुदेव' है।

कृषक सोमदत्त

महाराज! मेरा पुत्र वासुदेव दिन-रात धरती की सेवा करता है!

Panel 21
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Vikramaditya smiles with brilliant wisdom: 'Let the gold unite these two honest families in marriage!'
सम्राट विक्रमादित्य
सत्य का फल सदैव प्रेम और सम्बन्धों में खिलता है!

विक्रमादित्य के मुख पर दिव्य मुस्कान खिल उठी: 'यदि दोनों पुण्यात्मा पिता इस धन को स्वीकार नहीं करते, तो यह स्वर्ण-कलश वासुदेव और पद्मावती के पावन विवाह का उपहार बनेगा, जिससे आर्यावर्त के दो निष्कपट कुल समधी बन जाएँ!'

सम्राट विक्रमादित्य

सत्य का फल सदैव प्रेम और सम्बन्धों में खिलता है!

Panel 22
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Both peasants fall to their knees in tears of joy, embracing each other as future kinsmen
कृषक हरिदत्त
महाराज के न्याय ने हमारे विवाद को अमृत-सम्बन्ध में बदल दिया!

दोनों किसान आनन्द के अश्रुओं से सम्राट के चरणों में झुक गए और एक-दूसरे को गले लगाकर समधी बनने का सहर्ष स्वीकार किया!

कृषक हरिदत्त

महाराज के न्याय ने हमारे विवाद को अमृत-सम्बन्ध में बदल दिया!

Panel 23
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The ministers and assembled citizens cheer in admiration at the Emperor's verdict

सभागार जयकारों से गूँज उठा; सम्राट के इस धर्म-न्याय ने न्यायशास्त्र के इतिहास में एक स्वर्णिम अध्याय जोड़ दिया!

Panel 24
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दृश्य 5

राजसी विवाह, जल-बावड़ियों का निर्माण और लोक-कल्याण

The Grand Wedding & Public Welfare Stepwells
In the festive palace courtyard, the young couple Vasudeva and Padmavati are married in royal presence

उज्जयिनी के राजप्रासाद में सम्राट के सान्निध्य में वासुदेव और पद्मावती का भव्य और पावन विवाह वैदिक मन्त्रोच्चार के साथ सम्पन्न हुआ।

Panel 25
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Vikramaditya personally showers gold coins and rose petals upon the bride and groom

विक्रमादित्य ने स्वयं वर-वधू पर पुष्प-वर्षा कर पिता के समान अपना आशीर्वाद प्रदान किया।

Panel 26
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Half the gold is given to the newlyweds; the other half is dedicated to public welfare

दस लाख स्वर्ण-मुद्राओं का न्यायपूर्ण विभाजन हुआ—पाँच लाख मुद्राएँ नव-दम्पति को कृषि-सम्पत्ति निर्माण हेतु दी गईं, और शेष पाँच लाख लोक-कल्याण में समर्पित हुईं।

Panel 27
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Masons and villagers construct large stone irrigation stepwells funded by the gold

उस पवित्र धन से पूरे प्रान्त में विशाल पाषाण-बावड़ियाँ, सिंचाई की नहरें और पशुओं हेतु जल-कुण्ड बनवाए गए।

Panel 28
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New public Dharmashalas and community granaries open across the district for travelers

राजमार्गों पर यात्रियों हेतु निःशुल्क धर्मशालाएँ और किसानों हेतु सार्वजनिक अन्न-भण्डार खोले गए।

Panel 29
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Sunlit village fields thrive with green crops and flowing water, celebrating honesty over greed

अवन्ति के खेत लहलहा उठे और गाँव-गाँव में सत्य व त्याग का उत्सव मनाया गया; प्रजा के धर्म ने समूचे राष्ट्र को आलोकित कर दिया!

Panel 30
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दृश्य 6

वसुमती का निर्णय और राजा भोज का संकोच

Vasumati
Back in Dharanagari palace, Vasumati looks directly at King Bhoja with earth-golden eyes

धारानगरी के सभा-भवन में सजीव पुतली वसुमती ने राजा भोज को गम्भीर वसुन्धरा-नयनों से देखा।

Panel 31
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Vasumati challenges: 'Have you ever refused to seize unclaimed buried treasure for your crown?'
पुतली वसुमती
अब कहो, राजा भोज—क्या तुमने कभी लावारिस गड़े खजाने को राजकोष में भरने के लोभ को त्यागकर दो निष्कपट किसानों के सन्तानों का विवाह कराया है? यदि ऐसा धर्म-न्याय और अनासक्ति तुममें है, तो कदम बढ़ाओ! अन्यथा लौट जाओ!

वसुमती ने सत्ताईसवीं सीढ़ी की चुनौती दी:

पुतली वसुमती

अब कहो, राजा भोज—क्या तुमने कभी लावारिस गड़े खजाने को राजकोष में भरने के लोभ को त्यागकर दो निष्कपट किसानों के सन्तानों का विवाह कराया है? यदि ऐसा धर्म-न्याय और अनासक्ति तुममें है, तो कदम बढ़ाओ! अन्यथा लौट जाओ!

Panel 32
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King Bhoja lowers his head in deep humility and introspection, acknowledging Vikramaditya's purity
राजा भोज
मुझमें विक्रमादित्य जैसा अचल धर्म-न्याय, भूमि में गड़े सुवर्ण के लोभ से पूर्णतः मुक्त रहने का विवेक और प्रजा के त्याग को पूजने का शील नहीं है, देवि। मैं इस सत्ताईसवीं सीढ़ी के भी योग्य नहीं हूँ।

राजा भोज ने लज्जा और श्रद्धा से सिर झुका लिया:

राजा भोज

मुझमें विक्रमादित्य जैसा अचल धर्म-न्याय, भूमि में गड़े सुवर्ण के लोभ से पूर्णतः मुक्त रहने का विवेक और प्रजा के त्याग को पूजने का शील नहीं है, देवि। मैं इस सत्ताईसवीं सीढ़ी के भी योग्य नहीं हूँ।

Panel 33
•
King Bhoja steps down from the twenty-seventh step, ordering treasure-trove reforms established

राजा भोज सत्ताईसवीं सीढ़ी से नीचे उतरे और धारानगरी तथा पूरे मालवा में किसान-भूमि स्वामित्व संरक्षण, गड़े खजाने पर किसानों के अधिकार और ग्रामीण सिंचाई कोष स्थापित करने की आज्ञा दी।

Panel 34
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King Bhoja issues royal proclamations establishing peasant land-title protections

राज्य-भर में किसानों के भूमि-अधिकारों की रक्षा और जल-स्रोतों के निर्माण हेतु विशेष न्यासों का गठन हुआ।

Panel 35
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Twilight conches echo across Dharanagari as Vasumati smiles and freezes back into silent bronze

संध्याकाल के शंख गूँज उठे और वसुमती मन्द मुस्कान के साथ पुनः मौन कांस्य-प्रतिमा बन गई। **सिंहासन बत्तीसी का सत्ताईसवाँ दिन सम्पन्न हुआ!**

Panel 36
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The remaining five celestial statues gleam in the evening torchlight, awaiting the twenty-eighth test

शेष पाँच कांस्य-पुतलियाँ सन्ध्या की मशालों में जगमगाती रहीं, अट्ठाईसवीं पुतली (वैदेही) की अमर गाथा की प्रतीक्षा करते हुए।

Panel 37
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King Bhoja departs the throne hall in quiet contemplation, inspired by Vikramaditya's judicial purity
राजा भोज
"कल प्रातःकाल हम अट्ठाईसवीं सीढ़ी पर कदम रखेंगे और अट्ठाईसवीं पुतली—वैदेही—की अमर गाथा सुनेंगे!"

राजा भोज धर्म-न्याय और प्रजा-सत्कार के पावन सत्यों को हृदय में संजोकर मौन भाव से राजसभा से प्रस्थान कर गए।

राजा भोज

"कल प्रातःकाल हम अट्ठाईसवीं सीढ़ी पर कदम रखेंगे और अट्ठाईसवीं पुतली—वैदेही—की अमर गाथा सुनेंगे!"

Panel 38
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