पञ्चदश पुतली कमलिनी: चारण कवि का गीत, समुद्र-तट का गोताखोर और अनन्त मुक्ता-दान का रहस्य
The Fifteenth Statue: Kamalini & The Ocean Pearl Diver
पञ्चदश सूर्योदय और कमलिनी का प्रबोधन
The Fifteenth Dawn & Kamalini
पंद्रहवें प्रभात की स्वर्णिम किरणों ने धारानगरी के राजप्रासाद को आलोकित किया, जहाँ राजा भोज ने पूर्ण निष्ठा से अपनी साधना पूर्ण की।

केसरिया परिधान धारण कर राजा भोज विनीत चरणों से पंद्रहवीं सीढ़ी की ओर बढ़े।

जैसे ही राजा का चरण पंद्रहवीं सीढ़ी के निकट पहुँचा, मणिक वेदी पद्म-नील और मुक्ता-शुभ्र दिव्य प्रकाश से प्रदीप्त हो उठी!

पंद्रहवीं कांस्य-पुतली—कमलिनी—की नील-कमल आँखें खुलीं और वह स्वर्ण-कमल-नाल व मुक्ता-माला हाथ में लिए दिव्य हँसी के साथ सजीव हो उठी!
ठहरो, राजा भोज! इस पंद्रहवीं सीढ़ी पर कदम रखने का दुस्साहस मत करो!

राजा भोज ने नतमस्तक होकर हाथ जोड़े और मुक्ता-माला धारण की हुई पुतली की ओर देखा।
हे कमलिनी देवि! विक्रमादित्य के किस दान-वैभव और समुद्र-साहस की पावन गाथा आज आप मुझे सुनाना चाहती हैं?

कमलिनी ने मुक्ता-माला उठाकर गम्भीर वाणी में कहा:
क्या तुममें विक्रमादित्य जैसा असीम दान-वैभव और समुद्री साहस है, जब एक निर्धन चारण कवि के सत्य-गीत से मुग्ध होकर उन्होंने गोताखोरों की प्राण-रक्षा हेतु तूफानी सागर में छलांग लगाई और चालीस जहाजों का पूरा बेड़ा निर्धन मछुआरों को दान कर दिया?
सौराष्ट्र के चारण कवि का सत्य-गान और राजसभा का विस्मय
The Wandering Minstrel of Saurashtra
उज्जयिनी के वसंतोत्सव के भव्य राज-दरबार में सम्राट विक्रमादित्य रत्न-सिंहासन पर विराजमान थे, जहाँ दूर-दूर के कवि राजा की प्रशंसा में गीत गा रहे थे।

तभी फटे वस्त्र पहने सौराष्ट्र के साठ वर्षीय वृद्ध चारण कवि गुणाकर अपनी पुरानी काष्ठ-तम्बूरा लिए दरबार में प्रविष्ट हुए।

गुणाकर ने तम्बूरे के तार छेड़े और चाटुकारिता के स्थान पर सांसारिक नश्वरता और निष्काम दान का गूढ़ सत्य-गीत गाया।
राज-प्रासाद धूल बन जाते हैं, हे राजन! केवल वही हाथ युगों-युगों तक जीवित रहता है जो बिना अहंकार के दीनों को सर्वस्व सौंप देता है!

कवि की आँखों में वैराग्य का तेज था; उन्होंने राजा की सेना या खजाने की नहीं, अपितु आत्मा के अमर धर्म की गाथा गाई।

दरबारी मन्त्री कवि की निडर सत्य-वाणी पर कुपित हो उठे, परन्तु विक्रमादित्य के नयनों से आनन्द के अश्रु बह निकले!
यह भिक्षुक राजसभा में वैराग्य का गीत गाकर उत्सव का अपमान कर रहा है!

विक्रमादित्य सिंहासन से उठ खड़े हुए: 'चाटुकारिता सस्ती है, परन्तु सत्य का मूल्य हीरों से भी बढ़कर है!'
इस सच्चे कवि को राजकोष से एक लाख स्वर्ण-दीनार और रेशमी वस्त्र अर्पित किए जाएँ!
कवि का त्याग और प्रभास के गोताखोरों का संताप
The King
जब थालों में भरकर स्वर्ण-मुद्राएँ कवि के सम्मुख रखी गईं, तो वृद्ध चारण ने हाथ जोड़कर मन्द मुस्कान से मना कर दिया।
यह सुवर्ण आपके अद्वितीय काव्य का आदर है, कविराज!

गुणाकर ने कहा: 'मैं प्रकृति के आश्रय में जीता हूँ, राजन! परन्तु सौराष्ट्र के प्रभास पाटन में तीन हज़ार मुक्ता-गोताखोर लोभी व्यापारियों के चंगुल में तड़प रहे हैं!'
वे गहरे समुद्र में बिना सुरक्षा के जान जोखिम में डालते हैं और बदले में उन्हें सूखी रोटियाँ भी नहीं मिलतीं!

विक्रमादित्य का हृदय करुणा से भर गया; उन्होंने समुद्र-तट के श्रमजीवियों की मुक्ति का संकल्प लिया।

सम्राट ने राजसभा में घोषणा की: 'भारत का दक्षिणी समुद्र शोषण का नहीं, समृद्धि और स्वतंत्रता का धाम बनेगा!'
कविराज! मैं स्वयं आपके साथ प्रभास पाटन चलूँगा!

राजसी वस्त्र उतारकर विक्रमादित्य ने साधारण योद्धा के चर्म-वस्त्र धारण किए और अपने तीव्रगामी अश्व पर सवार हुए।

सम्राट और कवि सौराष्ट्र की पथरीली पहाड़ियों को पार करते हुए अरब सागर के तट की ओर अग्रसर हुए।
प्रभास का तूफानी सागर और अगाध जल में छलांग
The Coastal Reefs & The Heroic Ocean Rescue
प्रभास पाटन के पथरीले तट पर पहुँचते ही विशाल समुद्री लहरें चट्टानों से टकराकर गरज रही थीं।

सैकड़ों दीन गोताखोर बिना किसी सुरक्षा-रस्सी के शार्क-भरे गहरे जल में डुबकी लगा रहे थे, जबकि तट पर बैठे धनी व्यापारी कोड़ों से उन पर पहरा दे रहे थे।

अचानक भयानक समुद्री तूफान आया; आकाश में काले मेघ घिर आए और विशाल लहरों ने गोताखोरों को प्रवाल-चट्टानों के नीचे फँसा दिया!

नाविकों की प्रतीक्षा किए बिना विक्रमादित्य ने दाँतों में वूट्ज़ खंजर दबाया और ऊँची चट्टान से उफनते समुद्र में छलांग लगा दी!
सम्राट ने स्वयं समुद्र में छलांग लगा दी! हे ईश्वर, इनकी रक्षा करो!

अगाध गहरे जल में उतरकर विक्रमादित्य ने जल-लताओं और टूटी रस्सियों को काटकर दम तोड़ते दो गोताखोरों को मुक्त कराया!

सम्राट दोनों जीवित युवकों को अपने कन्धों पर उठाकर झागदार लहरों को चीरते हुए सुरक्षित तट पर लौट आए!
आपने हमें यमराज के मुख से खींच लिया, हे महापुरुष!
चालीस मुक्ता-जहाजों का बेड़ा और मछुआरों का उद्धार
The Gift of the Pearl Fleet & Royal Charter
तट पर हज़ारों मछुआरे और गोताखोर उस भीगे हुए शूरवीर के चरणों में श्रद्धा से झुक गए।

विक्रमादित्य ने लोभी साहूकारों को तलब कर राजकोष के स्वर्ण से उनके सभी चालीस मुक्ता-जहाज तत्काल खरीद लिए।

विक्रमादित्य ने ताम्र-पत्र का राज-शासनादेश जारी किया: 'आज से ये चालीस जहाज और समुद्र की समस्त मुक्ता-सम्पदा इन तीन हज़ार गोताखोरों की सामूहिक सम्पत्ति होगी!'
समुद्र की सम्पत्ति पर पसीना बहाने वाले श्रमिकों का प्रथम अधिकार है!

कृतज्ञ गोताखोरों ने समुद्र की अतल गहराइयों से निकाला गया सबसे बड़ा, अलौकिक 'महा-शंख मुक्ता' सम्राट को भेंट किया।

विक्रमादित्य ने वह अमूल्य मोती अपने खजाने में रखने के बजाय चारण कवि गुणाकर के काष्ठ-पात्र में रख दिया: 'यह उस सत्य-वाणी का सम्मान है जिसने तीन हज़ार कुलों का उद्धार कराया!'
आप नश्वर राजा नहीं, साक्षात् दीनानाथ हैं, महाराज!

स्वर्णिम प्रभात में चालीस मुक्ता-जहाजों ने केसरिया पाल फहराए और कवि गुणाकर के मंगलगान के साथ प्रभास का समुद्र उत्सव में डूब गया।
कमलिनी का निर्णय और राजा भोज का संकोच
Kamalini
धारानगरी के सभा-भवन में सजीव पुतली कमलिनी ने राजा भोज को गम्भीर नील-नयनों से देखा।

कमलिनी ने पंद्रहवीं सीढ़ी की चुनौती दी:
अब कहो, राजा भोज—क्या तुमने कभी किसी कवि की कटु सत्य-वाणी का आदर कर तूफानी समुद्र में गोताखोरों की जान बचाई है, और चालीस जहाजों का पूरा बेड़ा निर्धन श्रमिकों को दान दिया है? यदि ऐसा अगाध दान-वीर भाव तुममें है, तो कदम बढ़ाओ! अन्यथा लौट जाओ!

राजा भोज ने लज्जा और श्रद्धा से सिर झुका लिया:
मुझमें विक्रमादित्य जैसा असीम समुद्री साहस, सत्य को सुनने का धैर्य और संपूर्ण मुक्ता-बेड़ा त्यागने की उदारता नहीं है, देवि। मैं इस पंद्रहवीं सीढ़ी के भी योग्य नहीं हूँ।

राजा भोज पंद्रहवीं सीढ़ी से नीचे उतरे और धारानगरी तथा पूरे मालवा के सभी मछुआरों व नदी-नाविकों हेतु कर-मुक्ति और समुद्री राहत कोष स्थापित करने की आज्ञा दी।

राज्य-भर के जल-मार्गों पर श्रमिकों के कल्याण हेतु सुरक्षा-निधियों का गठन हुआ।

संध्याकाल के शंख गूँज उठे और कमलिनी मन्द मुस्कान के साथ पुनः मौन कांस्य-प्रतिमा बन गई। **सिंहासन बत्तीसी का पंद्रहवाँ दिन सम्पन्न हुआ!**

शेष सत्रह कांस्य-पुतलियाँ सन्ध्या की मशालों में जगमगाती रहीं, सोलहवीं पुतली (सीज़न २ के समापन) की अमर गाथा की प्रतीक्षा करते हुए।

राजा भोज त्याग और असीम करुणा के अमर आदर्शों से प्रेरित होकर मौन भाव से राजसभा से प्रस्थान कर गए।
कल प्रातःकाल हम सोलहवीं सीढ़ी पर कदम रखेंगे और सोलहवीं पुतली—मनमोहिनी—की अमर गाथा सुनेंगे!