अष्टम पुतली सुखाविका: दो दैवज्ञ, राजा का मृत्यु-योग और व्याघ्र-शावक का पावन उद्धार
The Eighth Statue: Sukhavika & The Forest Leopard's Mercy
अष्टम सूर्योदय और सुखाविका का प्रबोधन (प्रथम ऋतु पूर्णाहुति)
The Eighth Dawn & Sukhavika
अष्टम प्रभात की स्वर्णिम किरणों ने धारानगरी के राजप्रासाद को आलोकित किया, जहाँ राजा भोज ने अपनी प्रथम ऋतु (सीज़न १) की अन्तिम साधना पूर्ण की।

केसरिया परिधान धारण कर राजा भोज विनीत चरणों से आठवीं सीढ़ी की ओर बढ़े।

जैसे ही राजा का चरण आठवीं सीढ़ी के निकट पहुँचा, मणिक वेदी हीरक-शुभ्र और स्वर्णिम दिव्य प्रकाश से प्रदीप्त हो उठी!

आठवीं कांस्य-पुतली—सुखाविका—की हीरक-समान आँखें खुलीं और वह ज्योतिर्विद यन्त्र हाथ में लिए दिव्य हँसी के साथ सजीव हो उठी!
ठहरो, राजा भोज! इस आठवीं सीढ़ी पर पग धरने का दुस्साहस मत करो!

राजा भोज ने नतमस्तक होकर हाथ जोड़े और हीरक-नेत्रा पुतली की ओर देखा।
हे सुखाविका देवि! विक्रमादित्य के किस काल-जयी पराक्रम की पावन गाथा आज आप मुझे सुनाना चाहती हैं?

सुखाविका ने नक्षत्र-पट्टिका उठाकर दिव्य वाणी में कहा:
क्या तुममें विक्रमादित्य जैसा काल-जयी निर्भय साहस है, जब ज्योतिषियों द्वारा अपनी मृत्यु की भविष्यवाणी सुनकर भी वे निहत्थे वन में चले गए, और एक हिंसक व्याघ्र के मरणासन्न शावक को बचाकर स्वयं विधाता के लिखे लेख को बदल दिया?
उज्जयिनी की वेधशाला और सम्राट का मृत्यु-योग
The Fatal Royal Horoscope of Ujjayini
प्राचीन उज्जयिनी की वेधशाला में तारों भरे आकाश के नीचे राज-ज्योतिषी वराहमित्र और विद्वानों ने सम्राट की जन्म-कुण्डली का सूक्ष्म गणित किया।

काँपते हाथों से उन्होंने देखा कि आगामी पूर्णमासी के ग्रहण की मध्यरात्रि को महावन में एक काल-शार्दूल (काला तेंदुआ) के हाथों सम्राट का निश्चित 'मृत्यु-योग' बन रहा था!

राजसभा में वराहमित्र ने अश्रु बहाते हुए यह मृत्यु-योग प्रस्तुत किया और सम्राट से सहस्रों धनुर्धरों के लौह-दुर्ग में छिप जाने की प्रार्थना की।
महाराज! उस रात महावन की ओर पग न धरें! ग्रहों का विधान अटल है!

विक्रमादित्य ने अचल योग-वैराग्य के साथ मन्द मुस्कान से कहा:
नश्वर देह का अन्त प्रकृति का अटल नियम है, दैवज्ञ! क्षत्रिय कभी कायरों की भाँति लौह-दीवारों के पीछे छिपकर काल से नहीं डरता!

विक्रमादित्य ने ज्योतिषियों को उनकी प्रामाणिक गणना के लिए स्वर्ण-मुद्राओं से पुरस्कृत किया और सभी अंगरक्षकों को लौटने की आज्ञा दी।
महाराज! कम से कम दस वूट्ज़ खड्गधारी सैनिक साथ ले जाएँ!
शस्त्र भय का प्रतीक हैं, मन्त्रीवर। जहाँ ईश्वर पर विश्वास हो, वहाँ केवल धर्म का कवच पर्याप्त है!

ग्रहण की सन्ध्या को सम्राट ने राजसी कवच और खड्ग उतारकर केवल सादे श्वेत रेशमी वस्त्र धारण किए।
महावन में एकाकी पदयात्रा और काल-शार्दूल का प्राकट्य
The Midnight Walk into Mahavana
चन्द्र-ग्रहण के मन्द रजत प्रकाश में विक्रमादित्य पूरी तरह निहत्थे होकर महावन के बीहड़ अरण्य में अकेले प्रविष्ट हुए।

घने वटवृक्षों और कुहासे से ढँकी पाषाण-कन्दराओं के मध्य वे शान्त मन से आगे बढ़ते रहे।

एक संकरी पथरीली घाटी में प्रवेश करते ही चट्टानों को कँपाने वाली भयानक हिंसक दहाड़ गूँज उठी!

ऊँचे पाषाण-कगार पर रक्त-नेत्रों वाला विशालकाय काला तेंदुआ (काल-शार्दूल) नुकीले दाँत निकाले झपटने को तैयार बैठा था!

विक्रमादित्य हाथ जोड़कर चाँदनी में शान्त खड़े रहे; उनके हृदय से हिंसक पशु के प्रति केवल असीम करुणा (मैत्री-भाव) का प्रवाह बह रहा था।
हे वन-राज! यदि विधाता ने मेरा शरीर तुम्हारी क्षुधा-शान्ति हेतु निश्चित किया है, तो मैं सहर्ष प्रस्तुत हूँ!

विशाल तेंदुए ने कगार से छलांग लगाई और तीखे पंजों के साथ निहत्थे सम्राट के सम्मुख आ गिरा!
दबे हुए शावक की रक्षा और पाषाण-उत्तोलन
The Trapped Cub & The Act of Fearless Mercy
आक्रमण से ठीक पहले विक्रमादित्य ने एक गिरे हुए विशाल ग्रेनाइट पाषाण के नीचे से अत्यन्त मन्द करुण क्रन्दन सुना।
ठहरो, माता! तुम्हारी दहाड़ में क्रोध नहीं, तुम्हारी सन्तान की प्राण-रक्षा की पुकार है!

शिला के नीचे तेंदुए का नवजात शावक दबा हुआ था, जिसकी हड्डियाँ कुचली जा रही थीं और वह प्यास से दम तोड़ रहा था!

घुर्राती माता की परवाह किए बिना विक्रमादित्य घुटनों के बल झुके और अपने असीम बाहुबल से उस भारी पाषाण को उठा दिया!
उठो, नन्हें जीव! धर्म के राज्य में कोई निरपराध अकाल मृत्यु नहीं मरेगा!

उन्होंने घायल शावक को गोद में उठाया, दिव्य जड़ी-बूटी का लेप लगाया और तुम्बे से शीतल जल उसके मुख में डाला।

क्षण-भर में शावक की पीड़ा दूर हो गई और वह आनन्द से गुर्राते हुए सम्राट की उँगलियों को चाटने लगा!

शावक को जीवित देख हिंसक तेंदुए का क्रोध पिघल गया; उसने दाँत भीतर कर मस्तक झुका दिया और कृतज्ञता के आँसुओं से सम्राट के चरणों को चूमने लगी!
दिव्य वन-देवताओं का वरदान और भाग्य का पुनर्लेखन
The Celestial Transfiguration & Rewritten Destiny
ग्रहण समाप्त होते ही आकाश से दिव्य स्वर्णिम प्रकाश उतरा और दोनों व्याघ्र पंखयुक्त तेजस्वी वन-देवताओं के रूप में रूपान्तरित हो गए!

वन-देवता ने विक्रमादitya को वरदान दिया: 'जिसके हृदय में हिंसक पशु के लिए भी निष्काम प्रेम हो, काल भी उसका दास बन जाता है!'
हे धर्म-अवतार विक्रमादित्य! आपकी कीर्ति से समस्त अरण्य सदा अभय रहेंगे!

पीछे से छिपकर आए राज-ज्योतिषी वराहमित्र और मन्त्रियों ने मशालें फेंक दीं और विस्मय से भूमि पर साष्टांग नमन किया।
त्राहि माम्, महाराज! आपकी निस्वार्थ करुणा ने काल के चक्र को मोड़ दिया!

विक्रमादित्य ने विद्वानों को सम्बोधित किया:
तुम्हारा गणित सत्य था, दैवज्ञ! परन्तु निःस्वार्थ करुणा और धर्म में ग्रहों के लिखे लेख को भी बदल देने की सामर्थ्य है!

सूर्योदय की स्वर्णिम किरणों में सम्राट विक्रमादित्य समस्त मन्त्रियों के साथ उज्जयिनी के सुवर्ण-द्वारों की ओर लौटे।

उज्जयिनी के नगरवासियों ने शंख-ध्वनि और पुष्प-वर्षा के साथ भय पर धर्म की विजय का महा-उत्सव मनाया।
सुखाविका का निर्णय और प्रथम ऋतु (सीज़न १) का भव्य समापन
Sukhavika
धारानगरी के सभा-भवन में सजीव पुतली सुखाविका ने राजा भोज को गम्भीर हीरक-नयनों से देखा।

सुखाविका ने प्रथम ऋतु (सीज़न १) की अन्तिम चुनौती दी:
अब कहो, राजा भोज—क्या तुम कभी ज्योतिषी द्वारा बताई गई मृत्यु का सामना करने निहत्थे वन में गए हो, और एक हिंसक पशु के बच्चे को बचाकर भाग्य को बदला है? यदि ऐसा काल-जयी साहस है, तो कदम बढ़ाओ!

राजा भोज ने लज्जा और श्रद्धा से सिर झुका लिया:
मुझमें विक्रमादित्य जैसा काल-जयी निर्भय साहस और पशुओं के प्रति ऐसा असीम प्रेम नहीं है, देवि। मैं इस आठवीं सीढ़ी के भी योग्य नहीं हूँ।

राजा भोज आठवीं सीढ़ी से नीचे उतरे और धारानगरी तथा पूरे मालवा में वन्य जीवों के शिकार पर प्रतिबन्ध लगाकर अभयारण्य स्थापित करने की आज्ञा दी।

समस्त अरण्य-प्रदेशों में पशु-रक्षा और जल-कुण्डों की व्यवस्था की गई।

संध्याकाल के शंख गूँज उठे और सुखाविका मन्द मुस्कान के साथ पुनः मौन कांस्य-प्रतिमा बन गई। **सिंहासन बत्तीसी की प्रथम ऋतु (पुतली १ से ८ / अध्याय ० से ८) का गौरवशाली समापन हुआ!**
कल प्रातःकाल हम द्वितीय ऋतु (सीज़न २) में प्रवेश करेंगे और नौवीं पुतली—अनुराधा—की अमर गाथा सुनेंगे!