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पञ्चम पुतली लीलावती: वन का चोर, राजा का सत्य-व्रत और पारसमणि का पावन त्याग

सिंहासन बत्तीसी (३२ पुतलियों की अमर गाथा)• katha

पञ्चम पुतली लीलावती: वन का चोर, राजा का सत्य-व्रत और पारसमणि का पावन त्याग

The Fifth Statue: Lilavati & The Miracle of Truth

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दृश्य 1

पञ्चम सूर्योदय और लीलावती का प्रबोधन

The Fifth Dawn & Lilavati
Golden morning rays illuminate the 32-step golden throne on the white lotus marble dais

पञ्चम प्रभात की स्वर्णिम रश्मियों ने धारानगरी के सभा-भवन को आलोकित किया, जहाँ राजा भोज ने पूर्ण निष्ठा से अपनी साधना पूर्ण की।

Panel 1
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King Bhoja in royal saffron silks approaches the fifth step of the throne with humble stride

केसरिया परिधान धारण कर राजा भोज विनीत चरणों से पाँचवीं सीढ़ी की ओर बढ़े।

Panel 2
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The marble floor vibrates with brilliant amethyst-violet and golden radiance

जैसे ही राजा का चरण पाँचवीं सीढ़ी के निकट पहुँचा, संगमरमर का फर्श जामुनी-नीलम और स्वर्णिम दिव्य प्रकाश से झंकृत हो उठा!

Panel 3
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The fifth carved statue Lilavati opens her glowing amethyst-violet eyes, laughing musically
पुतली लीलावती
ठहरो, राजा भोज! इस पाँचवीं सीढ़ी पर कदम रखने का दुस्साहस मत करो!

पाँचवीं कांस्य-पुतली—लीलावती—की जामुनी आँखें खुलीं और वह दिव्य मणिक दर्पण हाथ में लिए मधुर हास्य के साथ सजीव हो उठी!

पुतली लीलावती

ठहरो, राजा भोज! इस पाँचवीं सीढ़ी पर कदम रखने का दुस्साहस मत करो!

Panel 4
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King Bhoja halts in awe with folded hands, gazing at the living celestial bronze maiden
राजा भोज
हे लीलावती देवि! विक्रमादित्य के किस सत्य-व्रत और निष्काम न्याय की पावन गाथा आज आप मुझे सुनाना चाहती हैं?

राजा भोज ने नतमस्तक होकर हाथ जोड़े और दिव्य दर्पण धारण की हुई पुतली की ओर देखा।

राजा भोज

हे लीलावती देवि! विक्रमादित्य के किस सत्य-व्रत और निष्काम न्याय की पावन गाथा आज आप मुझे सुनाना चाहती हैं?

Panel 5
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Lilavati speaks: 'Do you possess the forensic mercy, truth-vow, and detachment of Vikramaditya?'
पुतली लीलावती
क्या तुममें विक्रमादित्य जैसा दया-भाव, सत्य-निष्ठा और विरक्ति है, जब उन्होंने अपने अश्व-चोर को क्षमा कर दिया, सत्य की कसौटी पर उसका धर्म सिद्ध किया और पारसमणि को तृण-समान त्याग दिया?

लीलावती ने दिव्य दर्पण उठाकर गम्भीर वाणी में कहा:

पुतली लीलावती

क्या तुममें विक्रमादित्य जैसा दया-भाव, सत्य-निष्ठा और विरक्ति है, जब उन्होंने अपने अश्व-चोर को क्षमा कर दिया, सत्य की कसौटी पर उसका धर्म सिद्ध किया और पारसमणि को तृण-समान त्याग दिया?

Panel 6
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दृश्य 2

उज्जयिनी की अश्व-शाला और विवश चोर की पुकार

The Midnight Theft in Ujjayini
In the royal stables of ancient Ujjayini under moonlight, Dhanadatta sneaks inside to untie the horse

प्राचीन उज्जयिनी में आधी रात को चन्द्रमा के मन्द प्रकाश में एक निर्धन युवक धनदत्त राजसी अश्व-शाला में चुपके से घुसा और सम्राट के सबसे तीव्रगामी अश्व 'पवनवेग' की रस्सी खोल ली।

Panel 7
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The frightened young man leads the magnificent black stallion into the dark Mahavana forest

काँपते हाथों से वह उस दिव्य श्याम-कर्ण अश्व को लेकर घने महावन की ओर भाग निकला।

Panel 8
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Vikramaditya in simple hunter's cloak discovers the empty stall, tracking hoofprints alone

रात्रि-भ्रमण के समय सम्राट विक्रमादित्य ने रिक्त अश्व-शाला देखी और सेनापति को भेजने के बजाय स्वयं व्याध का वेश धरकर खुरों के पद-चिह्नों का पीछा किया।

Panel 9
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In a moonlit clearing, Vikramaditya approaches Dhanadatta struggling with the horse
विक्रमादित्य (व्याध रूप में)
शान्त हो जाओ, मित्र। राजसी अश्व चुराने का दण्ड मृत्यु है; तुम ऐसा प्राणघातक दुस्साहस क्यों कर रहे हो?

चाँदनी से धुले वन-मार्ग पर विक्रमादित्य वटवृक्ष के पीछे से निकले और विवश युवक के समीप पहुँचे जो हिनहिनाते अश्व को शान्त करने का प्रयास कर रहा था।

विक्रमादित्य (व्याध रूप में)

शान्त हो जाओ, मित्र। राजसी अश्व चुराने का दण्ड मृत्यु है; तुम ऐसा प्राणघातक दुस्साहस क्यों कर रहे हो?

Panel 10
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Dhanadatta collapses in tears: 'I stole this horse only to buy herbs for my dying mother!'
धनदत्त
मुझे दण्ड दीजिए, परन्तु मेरी माता तक औषधि पहुँचा दीजिए!

धनदत्त अश्रुओं से भूमि पर गिर पड़ा: 'मैं जन्मजात चोर नहीं हूँ, हे भ्राता! मेरी वृद्ध माता गम्भीर ज्वर से मृत्यु-शय्या पर हैं, जिसके उपचार हेतु दुर्लभ संजीवनी बूटी का मूल्य चुकाने के लिए मैंने यह पाप किया!'

धनदत्त

मुझे दण्ड दीजिए, परन्तु मेरी माता तक औषधि पहुँचा दीजिए!

Panel 11
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Instead of drawing his sword, Vikramaditya hands the youth his own emerald-hilted dagger
विक्रमादित्य
यह पन्ना बेचकर माता के लिए औषधि खरीदो, पुत्र! जब माता स्वस्थ हो जाएँ, तब अश्व लौटा जाना!

विक्रमादित्य ने खड्ग खींचने के बजाय अपनी पन्ना-जटित कटार निकालकर युवक के हाथों में रख दी:

विक्रमादित्य

यह पन्ना बेचकर माता के लिए औषधि खरीदो, पुत्र! जब माता स्वस्थ हो जाएँ, तब अश्व लौटा जाना!

Panel 12
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दृश्य 3

महर्षि दीर्घतपा का आश्रम और पारसमणि की प्राप्ति

The Sage
Days later, Dhanadatta returns to the forest with the healthy horse, his mother cured

कुछ दिनों पश्चात् माता के पूर्ण स्वस्थ होते ही सत्यवादी धनदत्त अश्व लेकर महावन लौटा ताकि अपने अज्ञात उपकारी को अश्व सौंप सके।

Panel 13
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Near the forest hermitage of Sage Dirghatapas, a wealthy merchant drops a glowing Parasmani stone

महर्षि दीर्घतपा के आश्रम के समीप एक धनी यात्री की झोली से लोहे को सोना बनाने वाली देदीप्यमान 'पारसमणि' कँटीली झाड़ियों में गिर गई।

Panel 14
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Dhanadatta spots the miraculous glowing Philosopher's Stone in the thorns, picking it up in awe
धनदत्त
यह तो साक्षात् पारसमणि है! परन्तु पराई सम्पत्ति पर धर्म का अधिकार नहीं!

धनदत्त ने झाड़ियों में चमकती उस अद्भुत पारसमणि को देखा और विस्मय से उठा लिया।

धनदत्त

यह तो साक्षात् पारसमणि है! परन्तु पराई सम्पत्ति पर धर्म का अधिकार नहीं!

Panel 15
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Dhanadatta refuses to keep unearned wealth, placing the glowing gem on the sage's altar
महर्षि दीर्घतपा
साधु, वत्स! लोभ पर विजय पाना ही सच्ची तपस्या है!

उस अज्ञात व्याध के उपकार और धर्म-निष्ठा का स्मरण कर धनदत्त ने पराई सम्पत्ति न रखने का संकल्प लिया और मणि को महर्षि के पाषाण-मंच पर रख दिया।

महर्षि दीर्घतपा

साधु, वत्स! लोभ पर विजय पाना ही सच्ची तपस्या है!

Panel 16
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Corrupt royal officers barge into the ashram, falsely accusing the youth of stealing the stone
भ्रष्ट अधिकारी
इस चोर ने हमारी पारसमणि चुराई है! इसे लोहे की साँकलों में जकड़ो!

तभी पड़ोसी राज्य के भ्रष्ट राज-कर्मचारी आश्रम में आ धमके और धनदत्त पर राजकोष की पारसमणि चुराने का झूठा आरोप मढ़ दिया!

भ्रष्ट अधिकारी

इस चोर ने हमारी पारसमणि चुराई है! इसे लोहे की साँकलों में जकड़ो!

Panel 17
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The corrupt officers bind Dhanadatta's hands with chains, preparing to blind him

अधिकारियों ने निर्दोष युवक को बाँधकर लाल तपे लोहे की सलाखों से उसकी आँखें फोड़ने का दुश्चक्र रचा।

Panel 18
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दृश्य 4

सत्य-तुला की परीक्षा और लोहे का सुवर्ण-रूपान्तरण

The Scale of Truth & The Miracle
Vikramaditya arrives at the hermitage on horseback, ordering the guards to cease their cruelty
सम्राट विक्रमादित्य
रुक जाओ, दुराचारियो! धर्म-भूमि पर असत्य और बल का प्रयोग अक्षम्य है!

उसी क्षण अश्व पर आरूढ़ होकर सम्राट विक्रमादित्य आश्रम में पहुँचे और कड़कड़ाती वाणी में अत्याचार रोकने की आज्ञा दी!

सम्राट विक्रमादित्य

रुक जाओ, दुराचारियो! धर्म-भूमि पर असत्य और बल का प्रयोग अक्षम्य है!

Panel 19
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Vikramaditya proclaims: 'We shall perform the Vedic Trial of Truth (Dharma-Tula)!'

विक्रमादित्य ने कहा: 'हम वैदिक सत्य-तुला की परीक्षा करेंगे! जिसका हृदय पवित्र होगा, उसके स्पर्श से साधारण लोहा भी कुन्दन बन जाएगा!'

Panel 20
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Vikramaditya places a rough black iron bar on the stone altar next to the Parasmani

विक्रमादित्य ने एक खुरदुरी काली लोहे की छड़ पाषाण-मंच पर पारसमणि के पास रख दी।

Panel 21
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The corrupt chief officer touches the iron; his deceitful aura turns it into crumbling black ash

लोभी प्रधान अधिकारी ने जैसे ही अहंकार में लोहे को छुआ, उसके असत्य और कपट के प्रभाव से लोहा जलकर काली राख और गन्धक के धुएँ में बिखर गया!

Panel 22
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Vikramaditya gently beckons Dhanadatta forward: 'Place your honest hands upon the metal!'
सम्राट विक्रमादित्य
जिसके मन में छल न हो, उसका स्पर्श साक्षात् अमृत है!

विक्रमादित्य ने मन्द मुस्कान से धनदत्त को आगे बुलाया: 'सत्यवादी पुत्र! अपने निष्कलंक हाथों से इस धातु का स्पर्श करो!'

सम्राट विक्रमादित्य

जिसके मन में छल न हो, उसका स्पर्श साक्षात् अमृत है!

Panel 23
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As Dhanadatta touches the iron, it instantly erupts into a blinding ingot of pure solid gold

धनदत्त ने जैसे ही पवित्र भाव से लोहे को छुआ, वह धातु दिव्य प्रकाश के साथ चौबीस कैरेट के चमचमाते ठोस स्वर्ण-पिण्ड में रूपान्तरित हो गई!

Panel 24
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दृश्य 5

पारसमणि का पावन त्याग और धनदत्त का उद्धार

The Supreme Renunciation of the Parasmani
The corrupt officers flee the sacred forest in terror and humiliation

भ्रष्ट अधिकारी भय और लज्जा से काँपते हुए घने वन में भाग खड़े हुए, जबकि आश्रमवासी जयघोष करने लगे।

Panel 25
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Sage Dirghatapas offers the miraculous Parasmani stone to Emperor Vikramaditya

महर्षि दीर्घतपा ने वह अनमोल पारसमणि सम्राट विक्रमादित्य को भेंट करते हुए कहा: 'महाराज! यह दिव्य मणि आपके राजकोष की शोभा बने!'

Panel 26
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Vikramaditya politely shakes his head: 'A righteous king builds an empire through honest toil!'
सम्राट विक्रमादित्य
धर्मात्मा राजा अपनी प्रजा के पसीने और पुरुषार्थ से राज्य का पोषण करता है, चमत्कारी मणियों से नहीं जो मनुष्य को आलसी और लोभी बनाती हैं!

विक्रमादित्य ने हाथ जोड़कर नम्रता से अस्वीकार कर दिया:

सम्राट विक्रमादित्य

धर्मात्मा राजा अपनी प्रजा के पसीने और पुरुषार्थ से राज्य का पोषण करता है, चमत्कारी मणियों से नहीं जो मनुष्य को आलसी और लोभी बनाती हैं!

Panel 27
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Vikramaditya gives the solid gold ingot to Dhanadatta, appointing him royal forest warden

विक्रमादित्य ने वह स्वर्ण-पिण्ड धनदत्त को सौंप दिया और उसे महावन का आधिकारिक राज-संरक्षक नियुक्त किया।

Panel 28
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Dhanadatta spots the royal Garuda signet, falling to his knees in tears of devotion
धनदत्त
हे चक्रवर्ती सम्राट! आपने एक अश्व-चोर को धर्म का रक्षक बना दिया!

योद्धा के हाथ में राजसी गरुड़ मुहर देखकर धनदत्त अश्रु-विगलित होकर चरणों में गिर पड़ा: 'आप उज्जयिनी के चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य हैं!'

धनदत्त

हे चक्रवर्ती सम्राट! आपने एक अश्व-चोर को धर्म का रक्षक बना दिया!

Panel 29
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Emperor Vikramaditya rides back to Ujjayini at golden sunset, leaving the forest in peace

गोधूलि वेला में सम्राट विक्रमादित्य मौन भाव से उज्जयिनी लौटे; वन में सत्य, शान्ति और धर्म की विजय का शंखनाद हो रहा था।

Panel 30
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दृश्य 6

लीलावती का निर्णय और राजा भोज का संकोच

Lilavati
Back in Dharanagari palace, Lilavati looks directly at King Bhoja with glowing amethyst eyes

धारानगरी के सभा-भवन में सजीव पुतली लीलावती ने राजा भोज को गम्भीर जामुनी नयनों से देखा।

Panel 31
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Lilavati challenges: 'Have you ever pardoned a thief who stole your warhorse, and rejected the Parasmani?'
पुतली लीलावती
अब कहो, राजा भोज—क्या तुमने कभी अपने अश्व-चोर को क्षमा कर पन्ना दान दिया है, सत्य-तुला से न्याय किया है और पारसमणि को तृण-समान ठुकराया है? यदि ऐसी विरक्ति है, तो कदम बढ़ाओ!

लीलावती ने अन्तिम चुनौती प्रस्तुत की:

पुतली लीलावती

अब कहो, राजा भोज—क्या तुमने कभी अपने अश्व-चोर को क्षमा कर पन्ना दान दिया है, सत्य-तुला से न्याय किया है और पारसमणि को तृण-समान ठुकराया है? यदि ऐसी विरक्ति है, तो कदम बढ़ाओ!

Panel 32
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King Bhoja lowers his head in deep humility and introspection, acknowledging Vikramaditya's detachment
राजा भोज
मुझमें विक्रमादित्य जैसी असीम सत्य-निष्ठा और पारसमणि को ठुकराने वाली विरक्ति नहीं है, देवि। मैं इस पाँचवीं सीढ़ी के भी योग्य नहीं हूँ।

राजा भोज ने लज्जा और श्रद्धा से सिर झुका लिया:

राजा भोज

मुझमें विक्रमादित्य जैसी असीम सत्य-निष्ठा और पारसमणि को ठुकराने वाली विरक्ति नहीं है, देवि। मैं इस पाँचवीं सीढ़ी के भी योग्य नहीं हूँ।

Panel 33
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King Bhoja steps down from the fifth step, ordering pardons for impoverished prisoners

राजा भोज पाँचवीं सीढ़ी से नीचे उतरे और धारानगरी के सभी निर्धन और विवश बन्दियों को मुक्त कर उनके पुनर्वास का आदेश दिया।

Panel 34
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King Bhoja issues royal proclamations releasing debt-ridden prisoners and building vocational academies

धारानगरी में शिल्प-शालाओं और कृषि-सहायता केन्द्रों की स्थापना की गई।

Panel 35
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Twilight conches sound across Dharanagari as Lilavati smiles and freezes back into silent bronze
राजा भोज
कल प्रातःकाल मैं छठी सीढ़ी पर चरण रखूँगा और छठी पुतली—प्रभावती—की अमर गाथा सुनूँगा!

संध्याकाल के शंख गूँज उठे और लीलावती मन्द मुस्कान के साथ पुनः मौन कांस्य-प्रतिमा बन गई। **सिंहासन बत्तीसी का पाँचवाँ दिन सम्पन्न हुआ!**

राजा भोज

कल प्रातःकाल मैं छठी सीढ़ी पर चरण रखूँगा और छठी पुतली—प्रभावती—की अमर गाथा सुनूँगा!

Panel 36
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