पञ्चम पुतली लीलावती: वन का चोर, राजा का सत्य-व्रत और पारसमणि का पावन त्याग
The Fifth Statue: Lilavati & The Miracle of Truth
पञ्चम सूर्योदय और लीलावती का प्रबोधन
The Fifth Dawn & Lilavati
पञ्चम प्रभात की स्वर्णिम रश्मियों ने धारानगरी के सभा-भवन को आलोकित किया, जहाँ राजा भोज ने पूर्ण निष्ठा से अपनी साधना पूर्ण की।

केसरिया परिधान धारण कर राजा भोज विनीत चरणों से पाँचवीं सीढ़ी की ओर बढ़े।

जैसे ही राजा का चरण पाँचवीं सीढ़ी के निकट पहुँचा, संगमरमर का फर्श जामुनी-नीलम और स्वर्णिम दिव्य प्रकाश से झंकृत हो उठा!

पाँचवीं कांस्य-पुतली—लीलावती—की जामुनी आँखें खुलीं और वह दिव्य मणिक दर्पण हाथ में लिए मधुर हास्य के साथ सजीव हो उठी!
ठहरो, राजा भोज! इस पाँचवीं सीढ़ी पर कदम रखने का दुस्साहस मत करो!

राजा भोज ने नतमस्तक होकर हाथ जोड़े और दिव्य दर्पण धारण की हुई पुतली की ओर देखा।
हे लीलावती देवि! विक्रमादित्य के किस सत्य-व्रत और निष्काम न्याय की पावन गाथा आज आप मुझे सुनाना चाहती हैं?

लीलावती ने दिव्य दर्पण उठाकर गम्भीर वाणी में कहा:
क्या तुममें विक्रमादित्य जैसा दया-भाव, सत्य-निष्ठा और विरक्ति है, जब उन्होंने अपने अश्व-चोर को क्षमा कर दिया, सत्य की कसौटी पर उसका धर्म सिद्ध किया और पारसमणि को तृण-समान त्याग दिया?
उज्जयिनी की अश्व-शाला और विवश चोर की पुकार
The Midnight Theft in Ujjayini
प्राचीन उज्जयिनी में आधी रात को चन्द्रमा के मन्द प्रकाश में एक निर्धन युवक धनदत्त राजसी अश्व-शाला में चुपके से घुसा और सम्राट के सबसे तीव्रगामी अश्व 'पवनवेग' की रस्सी खोल ली।

काँपते हाथों से वह उस दिव्य श्याम-कर्ण अश्व को लेकर घने महावन की ओर भाग निकला।

रात्रि-भ्रमण के समय सम्राट विक्रमादित्य ने रिक्त अश्व-शाला देखी और सेनापति को भेजने के बजाय स्वयं व्याध का वेश धरकर खुरों के पद-चिह्नों का पीछा किया।

चाँदनी से धुले वन-मार्ग पर विक्रमादित्य वटवृक्ष के पीछे से निकले और विवश युवक के समीप पहुँचे जो हिनहिनाते अश्व को शान्त करने का प्रयास कर रहा था।
शान्त हो जाओ, मित्र। राजसी अश्व चुराने का दण्ड मृत्यु है; तुम ऐसा प्राणघातक दुस्साहस क्यों कर रहे हो?

धनदत्त अश्रुओं से भूमि पर गिर पड़ा: 'मैं जन्मजात चोर नहीं हूँ, हे भ्राता! मेरी वृद्ध माता गम्भीर ज्वर से मृत्यु-शय्या पर हैं, जिसके उपचार हेतु दुर्लभ संजीवनी बूटी का मूल्य चुकाने के लिए मैंने यह पाप किया!'
मुझे दण्ड दीजिए, परन्तु मेरी माता तक औषधि पहुँचा दीजिए!

विक्रमादित्य ने खड्ग खींचने के बजाय अपनी पन्ना-जटित कटार निकालकर युवक के हाथों में रख दी:
यह पन्ना बेचकर माता के लिए औषधि खरीदो, पुत्र! जब माता स्वस्थ हो जाएँ, तब अश्व लौटा जाना!
महर्षि दीर्घतपा का आश्रम और पारसमणि की प्राप्ति
The Sage
कुछ दिनों पश्चात् माता के पूर्ण स्वस्थ होते ही सत्यवादी धनदत्त अश्व लेकर महावन लौटा ताकि अपने अज्ञात उपकारी को अश्व सौंप सके।

महर्षि दीर्घतपा के आश्रम के समीप एक धनी यात्री की झोली से लोहे को सोना बनाने वाली देदीप्यमान 'पारसमणि' कँटीली झाड़ियों में गिर गई।

धनदत्त ने झाड़ियों में चमकती उस अद्भुत पारसमणि को देखा और विस्मय से उठा लिया।
यह तो साक्षात् पारसमणि है! परन्तु पराई सम्पत्ति पर धर्म का अधिकार नहीं!

उस अज्ञात व्याध के उपकार और धर्म-निष्ठा का स्मरण कर धनदत्त ने पराई सम्पत्ति न रखने का संकल्प लिया और मणि को महर्षि के पाषाण-मंच पर रख दिया।
साधु, वत्स! लोभ पर विजय पाना ही सच्ची तपस्या है!

तभी पड़ोसी राज्य के भ्रष्ट राज-कर्मचारी आश्रम में आ धमके और धनदत्त पर राजकोष की पारसमणि चुराने का झूठा आरोप मढ़ दिया!
इस चोर ने हमारी पारसमणि चुराई है! इसे लोहे की साँकलों में जकड़ो!

अधिकारियों ने निर्दोष युवक को बाँधकर लाल तपे लोहे की सलाखों से उसकी आँखें फोड़ने का दुश्चक्र रचा।
सत्य-तुला की परीक्षा और लोहे का सुवर्ण-रूपान्तरण
The Scale of Truth & The Miracle
उसी क्षण अश्व पर आरूढ़ होकर सम्राट विक्रमादित्य आश्रम में पहुँचे और कड़कड़ाती वाणी में अत्याचार रोकने की आज्ञा दी!
रुक जाओ, दुराचारियो! धर्म-भूमि पर असत्य और बल का प्रयोग अक्षम्य है!

विक्रमादित्य ने कहा: 'हम वैदिक सत्य-तुला की परीक्षा करेंगे! जिसका हृदय पवित्र होगा, उसके स्पर्श से साधारण लोहा भी कुन्दन बन जाएगा!'

विक्रमादित्य ने एक खुरदुरी काली लोहे की छड़ पाषाण-मंच पर पारसमणि के पास रख दी।

लोभी प्रधान अधिकारी ने जैसे ही अहंकार में लोहे को छुआ, उसके असत्य और कपट के प्रभाव से लोहा जलकर काली राख और गन्धक के धुएँ में बिखर गया!

विक्रमादित्य ने मन्द मुस्कान से धनदत्त को आगे बुलाया: 'सत्यवादी पुत्र! अपने निष्कलंक हाथों से इस धातु का स्पर्श करो!'
जिसके मन में छल न हो, उसका स्पर्श साक्षात् अमृत है!

धनदत्त ने जैसे ही पवित्र भाव से लोहे को छुआ, वह धातु दिव्य प्रकाश के साथ चौबीस कैरेट के चमचमाते ठोस स्वर्ण-पिण्ड में रूपान्तरित हो गई!
पारसमणि का पावन त्याग और धनदत्त का उद्धार
The Supreme Renunciation of the Parasmani
भ्रष्ट अधिकारी भय और लज्जा से काँपते हुए घने वन में भाग खड़े हुए, जबकि आश्रमवासी जयघोष करने लगे।

महर्षि दीर्घतपा ने वह अनमोल पारसमणि सम्राट विक्रमादित्य को भेंट करते हुए कहा: 'महाराज! यह दिव्य मणि आपके राजकोष की शोभा बने!'

विक्रमादित्य ने हाथ जोड़कर नम्रता से अस्वीकार कर दिया:
धर्मात्मा राजा अपनी प्रजा के पसीने और पुरुषार्थ से राज्य का पोषण करता है, चमत्कारी मणियों से नहीं जो मनुष्य को आलसी और लोभी बनाती हैं!

विक्रमादित्य ने वह स्वर्ण-पिण्ड धनदत्त को सौंप दिया और उसे महावन का आधिकारिक राज-संरक्षक नियुक्त किया।

योद्धा के हाथ में राजसी गरुड़ मुहर देखकर धनदत्त अश्रु-विगलित होकर चरणों में गिर पड़ा: 'आप उज्जयिनी के चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य हैं!'
हे चक्रवर्ती सम्राट! आपने एक अश्व-चोर को धर्म का रक्षक बना दिया!

गोधूलि वेला में सम्राट विक्रमादित्य मौन भाव से उज्जयिनी लौटे; वन में सत्य, शान्ति और धर्म की विजय का शंखनाद हो रहा था।
लीलावती का निर्णय और राजा भोज का संकोच
Lilavati
धारानगरी के सभा-भवन में सजीव पुतली लीलावती ने राजा भोज को गम्भीर जामुनी नयनों से देखा।

लीलावती ने अन्तिम चुनौती प्रस्तुत की:
अब कहो, राजा भोज—क्या तुमने कभी अपने अश्व-चोर को क्षमा कर पन्ना दान दिया है, सत्य-तुला से न्याय किया है और पारसमणि को तृण-समान ठुकराया है? यदि ऐसी विरक्ति है, तो कदम बढ़ाओ!

राजा भोज ने लज्जा और श्रद्धा से सिर झुका लिया:
मुझमें विक्रमादित्य जैसी असीम सत्य-निष्ठा और पारसमणि को ठुकराने वाली विरक्ति नहीं है, देवि। मैं इस पाँचवीं सीढ़ी के भी योग्य नहीं हूँ।

राजा भोज पाँचवीं सीढ़ी से नीचे उतरे और धारानगरी के सभी निर्धन और विवश बन्दियों को मुक्त कर उनके पुनर्वास का आदेश दिया।

धारानगरी में शिल्प-शालाओं और कृषि-सहायता केन्द्रों की स्थापना की गई।

संध्याकाल के शंख गूँज उठे और लीलावती मन्द मुस्कान के साथ पुनः मौन कांस्य-प्रतिमा बन गई। **सिंहासन बत्तीसी का पाँचवाँ दिन सम्पन्न हुआ!**
कल प्रातःकाल मैं छठी सीढ़ी पर चरण रखूँगा और छठी पुतली—प्रभावती—की अमर गाथा सुनूँगा!