द्वितीय पुतली चित्रलेखा: निर्धन ब्राह्मण, महाकाली की वेदी और सम्राट का शीश-बलिदान
The Second Statue: Chitralekha & The Selfless Sacrifice
द्वितीय प्रभात और पुतली चित्रलेखा का आह्वान
The Second Dawn & Chitralekha
धारानगरी के भव्य राज-प्रासाद में राज्यारोहण का द्वितीय पावन प्रभात उदित हो चुका था; धवल संगमरमर के स्तम्भों के मध्य सहस्त्रों वेदमन्त्रों और शंखों के निनाद के बीच राजा भोज दूसरी स्वर्ण-सीढ़ी की ओर बढ़े।

जैसे ही राजा भोज ने अपना दाहिना चरण दूसरी सीढ़ी पर स्थापित करने हेतु उठाया, सम्पूर्ण सभा-मण्डप में पन्ने जैसी तीव्र हरित और सुवर्ण आभा का अलौकिक प्रकाश प्रस्फुटित हो उठा!

दूसरी सीढ़ी पर प्रतिष्ठित कांस्य-पुतली चित्रलेखा के मणिक नेत्रों में सहसा दिव्य चेतना कौंध गई; उसके अधरों पर मन्दिर-घण्टियों जैसी झंकार के साथ तीक्ष्ण हास्य गूँज उठा!
ठहरो, मालव-नरेश भोज! इस दूसरी सीढ़ी पर पाँव धरने का दुस्साहस मत करो! यह सिंहासन केवल उस सम्राट के योग्य है जिसका हृदय समुद्र के समान गम्भीर और कामधेनु जैसा निःस्वार्थ त्यागी हो!

उस अलौकिक हास्य से सभा स्तब्ध रह गई; राजा भोज ने हाथ जोड़कर विनीत भाव से मस्तक झुकाया।
हे कल्याणी चित्रलेखा! मुझे सम्राट विक्रमादित्य के उस अलौकिक शीश-बलिदान की गाथा सुनाओ!

पुतली चित्रलेखा ने अपने हाथ का सुवर्ण-कमल उठाकर ओजस्वी वाणी में अतीत की अमर गाथा आरम्भ की।
क्या तुममें सम्राट विक्रमादित्य जैसा निर्भय आत्म-बलिदान और परदुःखभंजन औदार्य है? सुनो उस भयानक अमावस की गाथा!

शताब्दियों पूर्व, चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य की राजधानी उज्जयिनी में घनघोर अमावस्या की मूसलाधार वर्षा और आँधी छाई थी।
मध्यरात्रि उज्जयिनी और विप्रवर का विलाप
Midnight Ujjayini & The Starving Family
सम्राट विक्रमादित्य साधारण पथिक का काला कम्बल ओढ़कर, कटि में वूट्ज़ खड्ग छिपाकर प्रजा के सुख-दुःख की थाह लेने गुप्त गश्त पर निकले थे।

महाकाल मन्दिर की परिधि पार कर, नगर के निर्जन छोर पर एक टूटी मिट्टी की झोपड़ी के समीप उनके चरण सहसा ठिठक गए।

टिमटिमाते दीपक के प्रकाश में, प्रकाण्ड वेदज्ञ किंतु नितान्त दरिद्र पण्डित हरिदत्त अपनी अश्रुमुखी भार्या और भूख से तड़पते तीन अबोध शिशुओं को देखकर रो रहे थे।
हे विधाता! इस भीषण अकाल में मेरे कुल का अन्त निश्चित है! मेरी असहाय सन्तानें मेरी आँखों के सम्मुख भूखी मर जाएँगी!

पण्डित अपनी पत्नी से कह रहे थे: 'महाश्मशान के गुप्त तान्त्रिक मन्दिर में यदि कोई निष्काम साधक अग्नि-वेदी पर सर्वोच्च बलिदान दे, तो माँ महाकाली अकाल मिटा देती हैं!'
किंतु मुझ दुर्बल ब्राह्मण में उस भयंकर तन्त्र-परीक्षा का सामर्थ्य कहाँ? हमारे भाग्य में केवल भूख से मरना लिखा है!

दीन विप्र का दारुण क्रन्दन सुनकर सम्राट का क्षत्रिय हृदय द्रवित हो उठा; वे कुटिया में प्रविष्ट हुए और स्वर्ण-मुद्राओं की थैली चरणों में रख दी।
अश्रु पोंछिए, विप्रवर! अन्न ग्रहण कीजिए और शिशुओं के प्राण बचाइए!

विक्रमादित्य ने विप्र के कन्धों पर हाथ रखकर कहा: 'मैं उज्जयिनी का एक क्षत्रिय सेवक हूँ। आपके कुल के उद्धार और अकाल के विनाश हेतु, महाकाली की वेदी पर मैं स्वयं आहुति दूँगा!'
मध्यरात्रि महाश्मशान और तान्त्रिक मन्दिर
The Midnight Mahashmashan & The Tantric Portal
प्रलयंकारी मध्यरात्रि में, मूसलाधार वर्षा को चीरते हुए सम्राट विक्रमादित्य एकाकी महाश्मशान की ओर बढ़ चले, जहाँ चिताओं के लाल अंगारे अँधियारे में भयानक नृत्य कर रहे थे।

श्मशान के मध्य, गन्धक और रक्त-चन्दन के धूम्र से घिरा, सहस्रों वर्ष प्राचीन महाकाली का भयंकर मन्दिर पाषाण-पर्वत की भाँति खड़ा था।

मन्दिर के विशाल लौह कपाट चरमराते हुए खुले; गर्भगृह में त्रिशूल, खप्पर और मुण्ड-माला धारण किए संहारक रूपी महाकाली की विशाल कृष्ण-पाषाण प्रतिमा स्थापित थी।

प्रतिमा के सम्मुख एक विशाल अग्नि-कुण्ड प्रज्वलित था, जिसकी ज्वालाएँ आकाश चूम रही थीं और पार्श्व में उबलते तैल का ताम्र-कड़ाह खदबदा रहा था।
ॐ क्रीं कालिकायै नमः! सत्य और धर्म ही मेरा कवच हैं।

अग्नि-वेदी के निकट पहुँचते ही भयानक डाकिनी-शाकिनी और तामसिक शक्तियों की अट्टहास-युक्त ध्वनियाँ गूँजने लगीं; फुंकारते विषधर सम्राट की ओर झपटे!

योगेश्वर विक्रमादित्य अचल पर्वत की भाँति स्थिर रहे; चित्त को भगवती के चरणों में समर्पित कर, सम्राट ने गम्भीर वैदिक मन्त्रों से समस्त तामसिक मायावी विकारों को भस्म कर दिया!
महा-परीक्षा और सम्राट का शीश-बलिदान
The Cosmic Test & The Sovereign
तभी मन्दिर का समूचा पाषाण-मण्डप तीव्र भूकम्प के समान काँप उठा; गर्भगृह के अन्धकार से एक अमानवीय और प्रचण्ड आकाशवाणी गूँजी!
इस अग्नि-कुण्ड में स्वर्ण अथवा पशुओं की आहुति स्वीकार नहीं होगी!

आकाशवाणी ने ललकारा: 'यदि तू ब्राह्मण हरिदत्त के कुल की दरिद्रता सदा के लिए मिटाना चाहता है, तो एक निष्कलंक चक्रवर्ती राजा के कटे हुए शीश का रक्त ही माँ को तृप्त कर सकता है!'

सम्राट विक्रमादित्य के अधरों पर एक अलौकिक शान्ति की मुस्कान तैर गई; उन्होंने विचार किया कि यदि इस रक्त-मांस के शरीर की बलि से प्रजा का जीवन बचता है, तो यह क्षत्रिय धर्म की सर्वोच्च सिद्धि है!
शरीर तो नश्वर है, किंतु प्रजा की रक्षा का धर्म अमर है!

बिना एक क्षण का संकोच किए, विक्रमादित्य ने म्यान से तीक्ष्ण धार वाली वूट्ज़ खड्ग खींच ली और दोनों हाथ जोड़कर जगज्जननी को प्रणाम किया।

'हे जगज्जननी! यह शीश आपके चरणों में स्वीकार हो!' यह कहकर सम्राट ने प्रचण्ड वेग से अपनी ही नंगी गर्दन पर खड्ग चला दी!
जय माँ भवानी! मेरी प्रजा का कल्याण हो!

जैसे ही खड्ग की तीखी धार सम्राट के कण्ठ को स्पर्श करने वाली थी, उसी क्षण गर्भगृह में सहस्र सूर्यों के समान एक अवर्णनीय दिव्य प्रकाश कौंध गया!
भगवती महाकाली का प्राकट्य और अक्षय वरदान
The Divine Manifestation & The Eternal Boons
स्वयं करुणामयी भगवती महाकाली ने साक्षात् प्रकट होकर अपनी कोमल दिव्य हथेली से सम्राट की खड्ग की धार को हवा में ही पकड़ लिया!

मन्दिर में रक्त-पिपासा के स्थान पर अमृत-तुल्य पारिजात पुष्पों की वर्षा होने लगी और देवी का वात्सल्यपूर्ण स्वर मन्दिर में गूँज उठा।
धन्य हो, चक्रवर्ती विक्रमादित्य! तुम्हारे जैसा निष्काम त्यागी और प्रजावत्सल नृपति सम्पूर्ण त्रिलोकी में दूसरा कोई नहीं है!

देवी ने वरदान दिया: 'एक अनजाने दरिद्र ब्राह्मण के दुःख निवारण हेतु तुमने अपना शीश सहर्ष अर्पित कर दिया। पण्डित हरिदत्त का कुल सात पीढ़ियों तक अक्षय धन-धान्य से परिपूर्ण रहेगा!'

विक्रमादित्य ने हाथ जोड़कर शीश झुकाया: 'माँ! मुझे केवल इतना वरदान दीजिए कि मेरा मन कभी धर्म और परोपकार के मार्ग से विचलित न हो!'
प्रजा का कल्याण ही मेरी मुक्ति है, हे जगदम्बा!

उज्जयिनी के आकाश में अमृतमयी बादलों ने मण्डराते हुए प्रचुर वर्षा की; सूखे खेत लहलहा उठे और नगर में अकाल का अंधकार सदा के लिए मिट गया।

पण्डित हरिदत्त की कुटिया में अन्न और स्वर्ण के भण्डार स्वतः भर गए; पूरा परिवार आँसुओं में डूबकर उस अज्ञात रक्षक सैनिक को नमन करने लगा।
चित्रलेखा का निर्णय और राजा भोज की विनम्रता
Chitralekha
कथा समाप्त कर, सजीव पुतली चित्रलेखा ने राजा भोज की आँखों में देखकर गम्भीर वाणी में ललकारा:
अब सत्य कहो, राजा भोज! क्या तुमने कभी किसी दीन याचक अथवा अश्रुमुखी प्रजा के लिए महाकाली की वेदी पर अपनी गर्दन पर स्वयं खड्ग चलाई है?

पुतली की वज्र-समान वाणी सुनकर राजा भोज का शीश लज्जा और श्रद्धा से नत हो गया; उनका समस्त गर्व क्षण भर में तिरोहित हो गया।
हे देवि! मुझमें ऐसा महान त्याग नहीं है। मैं इस सिंहासन की दूसरी सीढ़ी के भी योग्य नहीं हूँ।

राजा भोज नतमस्तक होकर पीछे हट गए और उन्होंने सम्पूर्ण राज्य में निःशुल्क अन्न-सत्र और औषधालय खोलने का राज्यादेश जारी किया!
मालवा के समस्त मण्डलों में अन्न-सत्र आरम्भ किए जाएँ! कोई नागरिक भूख से पीड़ित न रहे!

राजा भोज की विनम्रता देखकर पुतली चित्रलेखा मुस्कुराई और उसका सजीव तेज धीरे-धीरे पुनः शान्त कांस्य-मूर्ति में विलीन हो गया।

संध्याकालीन शंखनाद के मध्य चित्रलेखा मौन हो गई, और सिंहासन बत्तीसी का द्वितीय दिवस सम्पन्न हुआ।

राजा भोज उपवास और ईश्वर-प्रार्थना में लीन होकर अगले प्रभात की प्रतीक्षा करने लगे, जब तीसरी पुतली चन्द्रकला अपना आह्वान प्रस्तुत करेगी।