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पञ्चविंशति पुतली प्रेमवती: समुद्र-मन्थन का रहस्य, वरुण देव का रत्न-पात्र और निष्काम प्रेम-समर्पण

सिंहासन बत्तीसी (३२ पुतलियों की अमर गाथा)• katha

पञ्चविंशति पुतली प्रेमवती: समुद्र-मन्थन का रहस्य, वरुण देव का रत्न-पात्र और निष्काम प्रेम-समर्पण

The Twenty-Fifth Statue: Premavati & The Sunken Fleet of Sopara

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दृश्य 1

पच्चीसवाँ सूर्योदय और प्रेमवती का प्रबोधन

The Twenty-Fifth Dawn & Premavati
Morning sunlight streams across the sandstone colonnade onto the 32-step golden throne, launching Season 4

पच्चीसवें प्रभात की स्वर्णिम किरणों ने धारानगरी के राजप्रासाद को आलोकित किया, जहाँ राजा भोज ने अन्तिम खण्ड (सीज़न ४: परम-सोपान शिखर) के आरम्भ हेतु अपनी साधना पूर्ण की।

Panel 1
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King Bhoja in sacred saffron silks approaches the twenty-fifth step of the throne

केसरिया परिधान धारण कर राजा भोज विनीत चरणों से पच्चीसवीं सीढ़ी की ओर बढ़े।

Panel 2
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The marble dais erupts with brilliant ocean-sapphire and rose-golden radiance

जैसे ही राजा का चरण पच्चीसवीं सीढ़ी के निकट पहुँचा, मणिक वेदी सिन्धु-नीलम और पाटल-स्वर्णिम दिव्य प्रकाश से प्रदीप्त हो उठी!

Panel 3
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The twenty-fifth carved statue Premavati opens her glowing ocean-sapphire eyes, laughing musically
पुतली प्रेमवती
ठहरो, राजा भोज! इस पच्चीसवीं सीढ़ी पर कदम रखने का दुस्साहस मत करो!

पच्चीसवीं कांस्य-पुतली—प्रेमवती—की नीलम-नयन खुले और वह सुवर्ण-शंख व अमृत-पात्र हाथ में लिए दिव्य हँसी के साथ सजीव हो उठी!

पुतली प्रेमवती

ठहरो, राजा भोज! इस पच्चीसवीं सीढ़ी पर कदम रखने का दुस्साहस मत करो!

Panel 4
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King Bhoja halts in deep reverence with folded hands, gazing at the living bronze maiden
राजा भोज
हे प्रेमवती देवि! विक्रमादित्य के किस निष्काम प्रेम-समर्पण और सागर-विजय की पावन गाथा आज आप मुझे सुनाना चाहती हैं?

राजा भोज ने नतमस्तक होकर हाथ जोड़े और शंख धारण की हुई पुतली की ओर देखा।

राजा भोज

हे प्रेमवती देवि! विक्रमादित्य के किस निष्काम प्रेम-समर्पण और सागर-विजय की पावन गाथा आज आप मुझे सुनाना चाहती हैं?

Panel 5
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Premavati speaks: 'Do you possess the selfless love of Vikramaditya?'
पुतली प्रेमवती
क्या तुममें विक्रमादित्य जैसा निष्काम प्रेम-समर्पण और अगाध सागर का साहस है, जब शूर्पारक (सोपारा) के तीन सौ जहाजों को भँवर ने निगल लिया, और सम्राट ने वरुण देव के सम्मुख अपने प्राणों की बाजी लगाकर चिन्तामणि रत्न एक रोती हुई विधवा को दान कर दिया?

प्रेमवती ने सुवर्ण-शंख उठाकर गम्भीर वाणी में कहा:

पुतली प्रेमवती

क्या तुममें विक्रमादित्य जैसा निष्काम प्रेम-समर्पण और अगाध सागर का साहस है, जब शूर्पारक (सोपारा) के तीन सौ जहाजों को भँवर ने निगल लिया, और सम्राट ने वरुण देव के सम्मुख अपने प्राणों की बाजी लगाकर चिन्तामणि रत्न एक रोती हुई विधवा को दान कर दिया?

Panel 6
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दृश्य 2

शूर्पारक का समुद्री चक्रवात, डूबा हुआ पोत-दल और विधवा की पुकार

The Sunken Fleet of Sopara & The Lamenting Port
At the bustling ancient western seaport of Sopara, towering ocean waves crash violently

प्राचीन पश्चिमी समुद्री बन्दरगाह शूर्पारक (सोपारा) के तट पर विशाल तूफानी लहरें काले पत्थरों से टकरा रही थीं।

Panel 7
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A colossal black whirlpool swallows the merchant fleet of three hundred ships into the abyss
डूबता नाविक
भँवर हमें पाताल में खींच रहा है! बचाओ!

अचानक समुद्र में एक भयानक 'वडवानल-भँवर' उठा, जिसने तीन सौ मालवाहक जहाजों और सैकड़ों नाविकों को पाताल के गर्त में खींच लिया!

डूबता नाविक

भँवर हमें पाताल में खींच रहा है! बचाओ!

Panel 8
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Hundreds of distraught coastal families and widows crowd the rocky shoreline
मछुआरिन
हाय रे समुद्र! हमारे बच्चों को लौटा दे! हम अनाथ हो गए!

तट पर हज़ारों स्त्रियाँ, माताएँ और अनाथ बच्चे अपने परिजनों के खो जाने पर विलाप कर रहे थे; पूरा बन्दरगाह शोक में डूब गया था।

मछुआरिन

हाय रे समुद्र! हमारे बच्चों को लौटा दे! हम अनाथ हो गए!

Panel 9
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Widow Srimati kneels in the wet sea-sand before a Shiva sand-lingam, weeping for her son
विधवा श्रीमती
हे शङ्कर! मेरे बुढ़ापे की लाठी, मेरे देवदास के बिना मैं जीवित नहीं रह सकती!

तट की गीली रेत पर पचास वर्षीय निर्धन विधवा श्रीमती बालू के शिवलिंग के सम्मुख बैठकर अपने सोलह वर्षीय नाविक पुत्र देवदास हेतु प्रार्थना कर रही थी।

विधवा श्रीमती

हे शङ्कर! मेरे बुढ़ापे की लाठी, मेरे देवदास के बिना मैं जीवित नहीं रह सकती!

Panel 10
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Vikramaditya arrives on horseback, deeply moved by the mother's heart-wrenching tears

निरीक्षण हेतु पधारे सम्राट विक्रमादित्य ने जब उस असहाय माता का करुण क्रन्दन सुना, तो उनका हृदय विदीर्ण हो गया!

Panel 11
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Vikramaditya draws his Wootz steel dagger: 'I shall dive into the ocean abyss to bring back our sons!'
सम्राट विक्रमादित्य
धैर्य रखो, माता! तुम्हारा विक्रमादित्य तुम्हारे पुत्र को समुद्र के मुँह से छीन कर लाएगा!

विक्रमादित्य ने अपना राजसी दुपट्टा उतारा और कटार कसते हुए गर्जना की: 'जो राजा सूखी धरती पर बैठकर अपनी प्रजा को डूबते देखे, वह मुकुट के योग्य नहीं! मैं स्वयं पाताल में उतरकर इन सन्तानों को लौटा लाऊँगा!'

सम्राट विक्रमादित्य

धैर्य रखो, माता! तुम्हारा विक्रमादित्य तुम्हारे पुत्र को समुद्र के मुँह से छीन कर लाएगा!

Panel 12
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दृश्य 3

अगाध सिन्धु-प्रवेश, जल-स्तम्भन प्राणायाम और वरुण-पुरी का मन्दिर

The Descent into the Ocean Abyss & Varuna-Puri
Vikramaditya leaps fearlessly from the highest ocean cliff, diving straight into the black vortex

विक्रमादित्य ने सर्वोच्च चट्टान से गगनभेदी छलाँग लगाई और गरजते हुए काले भँवर के मध्य में निर्भय होकर कूद पड़े!

Panel 13
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Using yogic Jala-Stambhana water-suspension breath control, Vikramaditya swims gracefully

प्राचीन 'जल-स्तम्भन' योग-विद्या के बल पर सम्राट ने श्वास को स्थिर किया और गहरे नीले जल में बिना किसी भय के तैरने लगे।

Panel 14
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Deep underwater, glowing bioluminescent coral reefs and ancient submerged temple colonnades appear

समुद्र के अगाध तल में दिव्य प्रकाशमान मूँगे की चट्टानें, तैरते हुए जल-दैत्य और प्राचीन डूबे हुए मन्दिरों के स्तम्भ दिखाई दिए।

Panel 15
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A giant celestial Makara sea-beast circles the King, but bows to Vikramaditya's calm aura

एक विशाल ड्रैगन-समान जल-मकर सम्राट की ओर झपटा, परन्तु विक्रमादित्य के शान्त क्षत्रिय-तेज को देखकर नतमस्तक हो गया।

Panel 16
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Ahead in the glowing depths stands the towering crystalline gateway of Varuna-Puri

सामने अतल गहराई में नीलम और स्फटिक से निर्मित 'वरुण-पुरी' का भव्य राज-प्रासाद जगमगा रहा था।

Panel 17
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Vikramaditya breaches the glowing water barrier, stepping onto the pearl-paved floor

विक्रमादित्य ने जल-कपाट को पार किया और वरुण देव के शुष्क, मोतियों से जड़े सभागार में प्रवेश किया।

Panel 18
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दृश्य 4

वरुण देव की परीक्षा और सम्राट का आत्म-बलिदान संकल्प

Lord Varuna
Lord Varuna sits upon a magnificent throne of living water waves, holding his golden trident

लहरों के जीवन्त सिंहासन पर समुद्र के अधिपति वरुण देव अपने सुवर्ण-पाश और मुकुट के साथ विराजमान थे।

Panel 19
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The Sea Lord challenges: 'No creature of dust enters my abyss and leaves alive!'
वरुण देव
क्या तू मेरी लहरों से युद्ध करने आया है, विक्रमादित्य?

वरुण देव ने सागर-गर्जना के समान स्वर में ललकारा: 'हे मिट्टी के मनुष्य! कोई नश्वर मेरी इस पाताल-पुरी में जीवित नहीं लौटता! तू यहाँ क्यों आया है?'

वरुण देव

क्या तू मेरी लहरों से युद्ध करने आया है, विक्रमादित्य?

Panel 20
•
Vikramaditya folds his hands: 'I come solely out of love for a weeping mother on the shore!'
सम्राट विक्रमादित्य
एक माता का आँसू तीनों लोकों के मुकुटों से भारी होता है!

विक्रमादित्य ने हाथ जोड़कर शान्ति से कहा: 'मैं युद्ध या धन हेतु नहीं आया, देव! मैं केवल तट पर रोती हुई एक असहाय विधवा के पुत्र को लौटाने आया हूँ!'

सम्राट विक्रमादित्य

एक माता का आँसू तीनों लोकों के मुकुटों से भारी होता है!

Panel 21
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First Trial: Varuna offers the ocean trident to drown rivals; Vikramaditya declines
सम्राट विक्रमादित्य
मुझे शस्त्र नहीं, केवल अपने नागरिकों के प्राण चाहिए!

प्रथम परीक्षा: वरुण ने अपना सागर-त्रिशूल भेंट किया जिससे शत्रु-राजाओं को डुबोया जा सके; विक्रमादित्य ने कहा: 'धर्म प्रेम से जीतता है, संहार से नहीं!'

सम्राट विक्रमादित्य

मुझे शस्त्र नहीं, केवल अपने नागरिकों के प्राण चाहिए!

Panel 22
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Second Trial: Varuna offers mountains of ocean pearls; Vikramaditya declines

द्वितीय परीक्षा: वरुण ने मोतियों के पर्वत देने चाहे; सम्राट ने अस्वीकार करते हुए कहा: 'करुणा-रहित धन मिट्टी के समान है!'

Panel 23
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Third Trial: Varuna demands Vikramaditya's mortal breath; the Emperor smiles, offering his life
सम्राट विक्रमादित्य
मेरा जीवन ले लीजिए, परन्तु उन बेटों को उनकी माताओं की गोद में लौटा दीजिए!

तृतीय परीक्षा: वरुण ने कहा: 'यदि उन नाविकों को जीवित चाहते हो, तो अपनी आयु का आधा भाग मुझे समर्पित करो!' विक्रमादित्य ने हँसते हुए अपना जीवन समर्पित कर दिया!

सम्राट विक्रमादित्य

मेरा जीवन ले लीजिए, परन्तु उन बेटों को उनकी माताओं की गोद में लौटा दीजिए!

Panel 24
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दृश्य 5

चिन्तामणि रत्न का वरदान, पोतों का पुनरागमन और विधवा का सत्कार

The Gift of the Chintamani Gem & The Joyful Reunion
Overwhelmed by such selfless love, Lord Varuna smiles with cosmic joy
वरुण देव
धन्य हो, विक्रमादित्य! तुम्हारे प्रेम ने समुद्र के हृदय को भी पिघला दिया!

एक नश्वर सम्राट के इस अद्वितीय निष्काम प्रेम को देखकर वरुण देव गद्गद हो उठे और उन्होंने वरद-मुद्रा में हाथ उठा दिया!

वरुण देव

धन्य हो, विक्रमादित्य! तुम्हारे प्रेम ने समुद्र के हृदय को भी पिघला दिया!

Panel 25
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All three hundred sunken ships and young Devadasa rise safely to the surface upon ocean foam

वरुण की आज्ञा से तीनों सौ डूबे हुए जहाज और नाविक बालक देवदास फेनिल लहरों पर सकुशल समुद्र के ऊपर तैर आए!

Panel 26
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Varuna presents Vikramaditya with the radiant wish-granting Chintamani-Ratna

वरुण देव ने समुद्र का परम खजाना—दिव्य 'चिन्तामणि रत्न'—विक्रमादित्य को भेंट किया, जो समस्त दुःख मिटाकर मनोकामना पूर्ण करता था।

Panel 27
•
Vikramaditya steps out of the surf onto the beach of Sopara as the sun breaks through

तूफान थम गया और स्वर्णिम धूप में विक्रमादित्य समुद्र की लहरों से निकलकर सोपारा के तट पर प्रकट हुए।

Panel 28
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Widow Srimati weeps in boundless joy, clutching her revived son Devadasa
नाविक देवदास
माँ! सम्राट विक्रमादित्य ने पाताल से मुझे तुम्हारे लिए लौटाया है!

विधवा श्रीमती अपने जीवित लौटे पुत्र देवदास को गले लगाकर आनन्द के अश्रुओं से भीग गई; पूरा बन्दरगाह जयघोष से गूँज उठा!

नाविक देवदास

माँ! सम्राट विक्रमादित्य ने पाताल से मुझे तुम्हारे लिए लौटाया है!

Panel 29
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Vikramaditya places the priceless Chintamani-Ratna directly into the widow's clay plate

विक्रमादित्य ने वह अमूल्य चिन्तामणि रत्न अपने पास रखने के बजाय उस निर्धन माता की मिट्टी की थाली में रख दिया: 'इसे अपने तटीय देवालय में रखो, ताकि इस तट पर कभी कोई दरिद्र न रहे!'

Panel 30
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दृश्य 6

प्रेमवती का निर्णय और सीज़न ४ का शुभारम्भ

Premavati
Back in Dharanagari palace, Premavati looks directly at King Bhoja with ocean-sapphire eyes

धारानगरी के सभा-भवन में सजीव पुतली प्रेमवती ने राजा भोज को गम्भीर सिन्धु-नीलम नयनों से देखा।

Panel 31
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Premavati challenges: 'Have you ever plunged into the ocean abyss out of selfless love?'
पुतली प्रेमवती
अब कहो, राजा भोज—क्या तुमने कभी किसी रोती हुई माता के प्रेम में अगाध समुद्र के पाताल में छलाँग लगाई है? क्या समुद्र-देव के आगे अपने प्राण अर्पित कर चिन्तामणि रत्न किसी गाँव को दान किया है? यदि ऐसा निष्काम प्रेम तुममें है, तो कदम बढ़ाओ! अन्यथा लौट जाओ!

प्रेमवती ने पच्चीसवीं सीढ़ी और सीज़न ४ के आरम्भ की चुनौती दी:

पुतली प्रेमवती

अब कहो, राजा भोज—क्या तुमने कभी किसी रोती हुई माता के प्रेम में अगाध समुद्र के पाताल में छलाँग लगाई है? क्या समुद्र-देव के आगे अपने प्राण अर्पित कर चिन्तामणि रत्न किसी गाँव को दान किया है? यदि ऐसा निष्काम प्रेम तुममें है, तो कदम बढ़ाओ! अन्यथा लौट जाओ!

Panel 32
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King Bhoja lowers his head in deep humility and introspection, acknowledging Vikramaditya's love
राजा भोज
मुझमें विक्रमादित्य जैसा अगाध निष्काम प्रेम, समुद्र के गर्भ में प्राण न्योछावर करने का साहस और चिन्तामणि जैसे वरदान को अनासक्त भाव से त्यागने का शील नहीं है, देवि। मैं इस पच्चीसवीं सीढ़ी के भी योग्य नहीं हूँ।

राजा भोज ने लज्जा और श्रद्धा से सिर झुका लिया:

राजा भोज

मुझमें विक्रमादित्य जैसा अगाध निष्काम प्रेम, समुद्र के गर्भ में प्राण न्योछावर करने का साहस और चिन्तामणि जैसे वरदान को अनासक्त भाव से त्यागने का शील नहीं है, देवि। मैं इस पच्चीसवीं सीढ़ी के भी योग्य नहीं हूँ।

Panel 33
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King Bhoja steps down from the twenty-fifth step, ordering maritime rescue funds established

राजा भोज पच्चीसवीं सीढ़ी से नीचे उतरे और धारानगरी तथा पूरे मालवा में समुद्री जीवन-बीमा, नाविक रक्षा-दल और विधवा पेंशन योजना लागू करने की आज्ञा दी।

Panel 34
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King Bhoja issues royal proclamations establishing coastal rescue fleets

राज्य-भर के तटीय क्षेत्रों में नाविकों की सुरक्षा हेतु विशेष नौका-रक्षक दलों का गठन हुआ।

Panel 35
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Twilight conches echo across Dharanagari as Premavati smiles and freezes back into silent bronze

संध्याकाल के शंख गूँज उठे और प्रेमवती मन्द मुस्कान के साथ पुनः मौन कांस्य-प्रतिमा बन गई। **सिंहासन बत्तीसी का पच्चीसवाँ दिन सम्पन्न हुआ!**

Panel 36
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The remaining seven celestial statues gleam in the evening torchlight, awaiting Season 4 progress

शेष सात कांस्य-पुतलियाँ सन्ध्या की मशालों में जगमगाती रहीं, छब्बीसवीं पुतली (ध्वनिमती) की अमर गाथा की प्रतीक्षा करते हुए।

Panel 37
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King Bhoja departs the throne hall in quiet contemplation, inspired by Vikramaditya's love
राजा भोज
"कल प्रातःकाल हम छब्बीसवीं सीढ़ी पर कदम रखेंगे और छब्बीसवीं पुतली—ध्वनिमती—की अमर गाथा सुनेंगे!"

राजा भोज निष्काम प्रेम और समुद्र-समर्पण के पावन सत्यों को हृदय में संजोकर मौन भाव से राजसभा से प्रस्थान कर गए।

राजा भोज

"कल प्रातःकाल हम छब्बीसवीं सीढ़ी पर कदम रखेंगे और छब्बीसवीं पुतली—ध्वनिमती—की अमर गाथा सुनेंगे!"

Panel 38
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