पञ्चविंशति पुतली प्रेमवती: समुद्र-मन्थन का रहस्य, वरुण देव का रत्न-पात्र और निष्काम प्रेम-समर्पण
The Twenty-Fifth Statue: Premavati & The Sunken Fleet of Sopara
पच्चीसवाँ सूर्योदय और प्रेमवती का प्रबोधन
The Twenty-Fifth Dawn & Premavati
पच्चीसवें प्रभात की स्वर्णिम किरणों ने धारानगरी के राजप्रासाद को आलोकित किया, जहाँ राजा भोज ने अन्तिम खण्ड (सीज़न ४: परम-सोपान शिखर) के आरम्भ हेतु अपनी साधना पूर्ण की।

केसरिया परिधान धारण कर राजा भोज विनीत चरणों से पच्चीसवीं सीढ़ी की ओर बढ़े।

जैसे ही राजा का चरण पच्चीसवीं सीढ़ी के निकट पहुँचा, मणिक वेदी सिन्धु-नीलम और पाटल-स्वर्णिम दिव्य प्रकाश से प्रदीप्त हो उठी!

पच्चीसवीं कांस्य-पुतली—प्रेमवती—की नीलम-नयन खुले और वह सुवर्ण-शंख व अमृत-पात्र हाथ में लिए दिव्य हँसी के साथ सजीव हो उठी!
ठहरो, राजा भोज! इस पच्चीसवीं सीढ़ी पर कदम रखने का दुस्साहस मत करो!

राजा भोज ने नतमस्तक होकर हाथ जोड़े और शंख धारण की हुई पुतली की ओर देखा।
हे प्रेमवती देवि! विक्रमादित्य के किस निष्काम प्रेम-समर्पण और सागर-विजय की पावन गाथा आज आप मुझे सुनाना चाहती हैं?

प्रेमवती ने सुवर्ण-शंख उठाकर गम्भीर वाणी में कहा:
क्या तुममें विक्रमादित्य जैसा निष्काम प्रेम-समर्पण और अगाध सागर का साहस है, जब शूर्पारक (सोपारा) के तीन सौ जहाजों को भँवर ने निगल लिया, और सम्राट ने वरुण देव के सम्मुख अपने प्राणों की बाजी लगाकर चिन्तामणि रत्न एक रोती हुई विधवा को दान कर दिया?
शूर्पारक का समुद्री चक्रवात, डूबा हुआ पोत-दल और विधवा की पुकार
The Sunken Fleet of Sopara & The Lamenting Port
प्राचीन पश्चिमी समुद्री बन्दरगाह शूर्पारक (सोपारा) के तट पर विशाल तूफानी लहरें काले पत्थरों से टकरा रही थीं।

अचानक समुद्र में एक भयानक 'वडवानल-भँवर' उठा, जिसने तीन सौ मालवाहक जहाजों और सैकड़ों नाविकों को पाताल के गर्त में खींच लिया!
भँवर हमें पाताल में खींच रहा है! बचाओ!

तट पर हज़ारों स्त्रियाँ, माताएँ और अनाथ बच्चे अपने परिजनों के खो जाने पर विलाप कर रहे थे; पूरा बन्दरगाह शोक में डूब गया था।
हाय रे समुद्र! हमारे बच्चों को लौटा दे! हम अनाथ हो गए!

तट की गीली रेत पर पचास वर्षीय निर्धन विधवा श्रीमती बालू के शिवलिंग के सम्मुख बैठकर अपने सोलह वर्षीय नाविक पुत्र देवदास हेतु प्रार्थना कर रही थी।
हे शङ्कर! मेरे बुढ़ापे की लाठी, मेरे देवदास के बिना मैं जीवित नहीं रह सकती!

निरीक्षण हेतु पधारे सम्राट विक्रमादित्य ने जब उस असहाय माता का करुण क्रन्दन सुना, तो उनका हृदय विदीर्ण हो गया!

विक्रमादित्य ने अपना राजसी दुपट्टा उतारा और कटार कसते हुए गर्जना की: 'जो राजा सूखी धरती पर बैठकर अपनी प्रजा को डूबते देखे, वह मुकुट के योग्य नहीं! मैं स्वयं पाताल में उतरकर इन सन्तानों को लौटा लाऊँगा!'
धैर्य रखो, माता! तुम्हारा विक्रमादित्य तुम्हारे पुत्र को समुद्र के मुँह से छीन कर लाएगा!
अगाध सिन्धु-प्रवेश, जल-स्तम्भन प्राणायाम और वरुण-पुरी का मन्दिर
The Descent into the Ocean Abyss & Varuna-Puri
विक्रमादित्य ने सर्वोच्च चट्टान से गगनभेदी छलाँग लगाई और गरजते हुए काले भँवर के मध्य में निर्भय होकर कूद पड़े!

प्राचीन 'जल-स्तम्भन' योग-विद्या के बल पर सम्राट ने श्वास को स्थिर किया और गहरे नीले जल में बिना किसी भय के तैरने लगे।

समुद्र के अगाध तल में दिव्य प्रकाशमान मूँगे की चट्टानें, तैरते हुए जल-दैत्य और प्राचीन डूबे हुए मन्दिरों के स्तम्भ दिखाई दिए।

एक विशाल ड्रैगन-समान जल-मकर सम्राट की ओर झपटा, परन्तु विक्रमादित्य के शान्त क्षत्रिय-तेज को देखकर नतमस्तक हो गया।

सामने अतल गहराई में नीलम और स्फटिक से निर्मित 'वरुण-पुरी' का भव्य राज-प्रासाद जगमगा रहा था।

विक्रमादित्य ने जल-कपाट को पार किया और वरुण देव के शुष्क, मोतियों से जड़े सभागार में प्रवेश किया।
वरुण देव की परीक्षा और सम्राट का आत्म-बलिदान संकल्प
Lord Varuna
लहरों के जीवन्त सिंहासन पर समुद्र के अधिपति वरुण देव अपने सुवर्ण-पाश और मुकुट के साथ विराजमान थे।

वरुण देव ने सागर-गर्जना के समान स्वर में ललकारा: 'हे मिट्टी के मनुष्य! कोई नश्वर मेरी इस पाताल-पुरी में जीवित नहीं लौटता! तू यहाँ क्यों आया है?'
क्या तू मेरी लहरों से युद्ध करने आया है, विक्रमादित्य?

विक्रमादित्य ने हाथ जोड़कर शान्ति से कहा: 'मैं युद्ध या धन हेतु नहीं आया, देव! मैं केवल तट पर रोती हुई एक असहाय विधवा के पुत्र को लौटाने आया हूँ!'
एक माता का आँसू तीनों लोकों के मुकुटों से भारी होता है!

प्रथम परीक्षा: वरुण ने अपना सागर-त्रिशूल भेंट किया जिससे शत्रु-राजाओं को डुबोया जा सके; विक्रमादित्य ने कहा: 'धर्म प्रेम से जीतता है, संहार से नहीं!'
मुझे शस्त्र नहीं, केवल अपने नागरिकों के प्राण चाहिए!

द्वितीय परीक्षा: वरुण ने मोतियों के पर्वत देने चाहे; सम्राट ने अस्वीकार करते हुए कहा: 'करुणा-रहित धन मिट्टी के समान है!'

तृतीय परीक्षा: वरुण ने कहा: 'यदि उन नाविकों को जीवित चाहते हो, तो अपनी आयु का आधा भाग मुझे समर्पित करो!' विक्रमादित्य ने हँसते हुए अपना जीवन समर्पित कर दिया!
मेरा जीवन ले लीजिए, परन्तु उन बेटों को उनकी माताओं की गोद में लौटा दीजिए!
चिन्तामणि रत्न का वरदान, पोतों का पुनरागमन और विधवा का सत्कार
The Gift of the Chintamani Gem & The Joyful Reunion
एक नश्वर सम्राट के इस अद्वितीय निष्काम प्रेम को देखकर वरुण देव गद्गद हो उठे और उन्होंने वरद-मुद्रा में हाथ उठा दिया!
धन्य हो, विक्रमादित्य! तुम्हारे प्रेम ने समुद्र के हृदय को भी पिघला दिया!

वरुण की आज्ञा से तीनों सौ डूबे हुए जहाज और नाविक बालक देवदास फेनिल लहरों पर सकुशल समुद्र के ऊपर तैर आए!

वरुण देव ने समुद्र का परम खजाना—दिव्य 'चिन्तामणि रत्न'—विक्रमादित्य को भेंट किया, जो समस्त दुःख मिटाकर मनोकामना पूर्ण करता था।

तूफान थम गया और स्वर्णिम धूप में विक्रमादित्य समुद्र की लहरों से निकलकर सोपारा के तट पर प्रकट हुए।

विधवा श्रीमती अपने जीवित लौटे पुत्र देवदास को गले लगाकर आनन्द के अश्रुओं से भीग गई; पूरा बन्दरगाह जयघोष से गूँज उठा!
माँ! सम्राट विक्रमादित्य ने पाताल से मुझे तुम्हारे लिए लौटाया है!

विक्रमादित्य ने वह अमूल्य चिन्तामणि रत्न अपने पास रखने के बजाय उस निर्धन माता की मिट्टी की थाली में रख दिया: 'इसे अपने तटीय देवालय में रखो, ताकि इस तट पर कभी कोई दरिद्र न रहे!'
प्रेमवती का निर्णय और सीज़न ४ का शुभारम्भ
Premavati
धारानगरी के सभा-भवन में सजीव पुतली प्रेमवती ने राजा भोज को गम्भीर सिन्धु-नीलम नयनों से देखा।

प्रेमवती ने पच्चीसवीं सीढ़ी और सीज़न ४ के आरम्भ की चुनौती दी:
अब कहो, राजा भोज—क्या तुमने कभी किसी रोती हुई माता के प्रेम में अगाध समुद्र के पाताल में छलाँग लगाई है? क्या समुद्र-देव के आगे अपने प्राण अर्पित कर चिन्तामणि रत्न किसी गाँव को दान किया है? यदि ऐसा निष्काम प्रेम तुममें है, तो कदम बढ़ाओ! अन्यथा लौट जाओ!

राजा भोज ने लज्जा और श्रद्धा से सिर झुका लिया:
मुझमें विक्रमादित्य जैसा अगाध निष्काम प्रेम, समुद्र के गर्भ में प्राण न्योछावर करने का साहस और चिन्तामणि जैसे वरदान को अनासक्त भाव से त्यागने का शील नहीं है, देवि। मैं इस पच्चीसवीं सीढ़ी के भी योग्य नहीं हूँ।

राजा भोज पच्चीसवीं सीढ़ी से नीचे उतरे और धारानगरी तथा पूरे मालवा में समुद्री जीवन-बीमा, नाविक रक्षा-दल और विधवा पेंशन योजना लागू करने की आज्ञा दी।

राज्य-भर के तटीय क्षेत्रों में नाविकों की सुरक्षा हेतु विशेष नौका-रक्षक दलों का गठन हुआ।

संध्याकाल के शंख गूँज उठे और प्रेमवती मन्द मुस्कान के साथ पुनः मौन कांस्य-प्रतिमा बन गई। **सिंहासन बत्तीसी का पच्चीसवाँ दिन सम्पन्न हुआ!**

शेष सात कांस्य-पुतलियाँ सन्ध्या की मशालों में जगमगाती रहीं, छब्बीसवीं पुतली (ध्वनिमती) की अमर गाथा की प्रतीक्षा करते हुए।

राजा भोज निष्काम प्रेम और समुद्र-समर्पण के पावन सत्यों को हृदय में संजोकर मौन भाव से राजसभा से प्रस्थान कर गए।
"कल प्रातःकाल हम छब्बीसवीं सीढ़ी पर कदम रखेंगे और छब्बीसवीं पुतली—ध्वनिमती—की अमर गाथा सुनेंगे!"