एकादश पुतली कीर्तिमती: सहस्र दीपों का नगर, निष्ठावान् प्रहरी वीरवर और राज-लक्ष्मी का पावन उद्धार
The Eleventh Statue: Kirtimati & The Night Watchman's Sacrifice
एकादश सूर्योदय और कीर्तिमती का प्रबोधन
The Eleventh Dawn & Kirtimati
ग्यारहवें प्रभात की स्वर्णिम किरणों ने धारानगरी के राजप्रासाद को आलोकित किया, जहाँ राजा भोज ने पूर्ण निष्ठा से अपनी साधना पूर्ण की।

केसरिया परिधान धारण कर राजा भोज विनीत चरणों से ग्यारहवीं सीढ़ी की ओर बढ़े।

जैसे ही राजा का चरण ग्यारहवीं सीढ़ी के निकट पहुँचा, संगमरमर का फर्श ज्वाला-स्वर्ण और हीरक-शुभ्र दिव्य प्रकाश से प्रदीप्त हो उठा!

ग्यारहवीं कांस्य-पुतली—कीर्तिमती—की हीरक आँखें खुलीं और वह अखण्ड दीप-पात्र हाथ में लिए दिव्य हँसी के साथ सजीव हो उठी!
ठहरो, राजा भोज! इस ग्यारहवीं सीढ़ी पर कदम रखने का दुस्साहस मत करो!

राजा भोज ने नतमस्तक होकर हाथ जोड़े और अखण्ड ज्योति धारण की हुई पुतली की ओर देखा।
हे कीर्तिमती देवि! विक्रमादित्य के किस कृतज्ञता और आत्म-बलिदान की अमर गाथा आज आप मुझे सुनाना चाहती हैं?

कीर्तिमती ने अखण्ड दीप उठाकर गम्भीर वाणी में कहा:
क्या तुममें विक्रमादित्य जैसा असीम कृतज्ञता-भाव और आत्म-त्याग है, जब एक निष्ठावान् प्रहरी ने राजा के प्राण बचाने हेतु अपने पूरे परिवार का शीश काट दिया, और विक्रमादित्य ने उस सेवक को जीवित करने के लिए वेदी पर अपना शीश धर दिया?
शूरवीर वीरवर का आगमन और पाँच सौ दीनारों का दान
The Arrival of Loyal Warrior Viravara
प्राचीन उज्जयिनी के राज-सभागार में एक तेजपुंज राजपूत योद्धा अपने परिवार सहित सम्राट विक्रमादित्य के सम्मुख उपस्थित हुआ।

वीरवर ने अपने सोलह वर्षीय तेजस्वी पुत्र शक्तिधर और पत्नी के साथ घुटने टेककर प्रतिदिन पाँच सौ स्वर्ण-दीनार वेतन की प्रार्थना की।
महाराज! यदि आप मुझे पाँच सौ दीनार दैनिक वेतन दें, तो मेरा खड्ग आपकी रक्षा में दिन-रात तत्पर रहेगा!

दरबारी मन्त्री इतने भारी वेतन पर चौंक उठे, परन्तु विक्रमादित्य ने वीरवर के नयनों में निष्ठा का अगाध सागर देखकर तुरन्त स्वीकार कर लिया।
स्वीकार है, वीरवर! आज से तुम उज्जयिनी राजप्रासाद के मुख्य प्रहरी नियुक्त होते हो!

छद्मवेश में विक्रमादित्य ने रात्रि में वीरवर का पीछा किया कि वह इतनी बड़ी धनराशि का क्या करता है।

वीरवर दो सौ दीनार मन्दिरों में, दो सौ दीनार अनाथ-दीनों को और पचास दीनार विधवाओं को बाँट देता था, केवल पचास दीनार में अपना परिवार पालता था!

धूप हो या मूसलाधार वर्षा, वीरवर नंगी तलवार हाथ में लिए सिंहद्वार पर अडिग प्रहरी बना खड़ा रहता था।
तूफानी मध्यरात्रि और श्मशान में रुदन की ध्वनि
The Midnight Wailing in the Wilderness
भाद्रपद मास की घनघोर तूफानी मध्यरात्रि को मेघों की भयानक गर्जना और मूसलाधार वर्षा के मध्य विक्रमादित्य झरोखे में खड़े थे।

तूफान को चीरती हुई नदी पार श्मशान भूमि से किसी स्त्री के हृदय-विदारक करुण रुदन की ध्वनि गूँजी!

विक्रमादित्य ने अन्धकार में पुकारा: 'आज राजद्वार पर कौन प्रहरी उपस्थित है?'

मूसलाधार वर्षा में भीगते हुए वीरवर ने खड्ग उठाकर उत्तर दिया: 'आपका सेवक वीरवर उपस्थित है, महाराज!'
आज्ञा दें, देव! इस आधी रात को आपके सेवक की क्या सेवा है?

विक्रमादित्य ने वीरवर को श्मशान में जाकर रोती हुई स्त्री का कारण जानने की आज्ञा दी।
जाओ वीरवर! पता लगाओ कि इस भयानक रात में कौन दुखियारी विलाप कर रही है!

काली चादर ओढ़कर विक्रमादित्य चुपचाप उस तूफानी अन्धकार में वीरवर के पीछे-पीछे चल पड़े।
देवी राज-लक्ष्मी का प्राकट्य और महाचण्डी का आदेश
The Departing Goddess of Royal Fortune
श्मशान के एक विशाल वटवृक्ष के नीचे वीरवर ने एक अलौकिक, स्वर्ण-कान्ति से दमकती दिव्य देवी को फूट-फूट कर रोते देखा।

वीरवर ने हाथ जोड़कर पूछा: 'हे कल्याणी! आप कौन हैं और इस श्मशान में आधी रात को क्यों विलाप कर रही हैं?'
यदि कोई संकट है तो मुझ क्षत्रिय को आज्ञा दें!

देवी ने रोते हुए कहा: 'मैं उज्जयिनी की अधिष्ठात्री 'राज-लक्ष्मी' हूँ! सम्राट विक्रमादित्य की आयु का समय पूर्ण हो चुका है; तीन दिनों में उनकी मृत्यु निश्चित है, और मुझे यह नगर छोड़ना होगा!'
विक्रमादित्य जैसा धर्मपरायण राजा पुनः नहीं मिलेगा, इसी शोक में मैं रो रही हूँ!

वीरवर चरणों में गिर पड़ा: 'हे माता! क्या इस संसार में ऐसा कोई उपाय या बलिदान नहीं जिससे हमारे प्राण-प्रिय सम्राट की रक्षा हो सके?'

देवी ने उपाय बताया: 'यदि आज की रात कोई निष्पाप वीर अपने प्रथम पुत्र को भगवती महाचण्डी की वेदी पर बलि चढ़ा दे, तो विक्रमादित्य सौ वर्ष तक जीवित रहेंगे!'
यही एकमात्र मार्ग है, वीरवर!

वीरवर ने हाथ जोड़कर प्रणाम किया और दृढ़ संकल्प के साथ अपने घर की ओर दौड़ा; ओट में खड़े विक्रमादित्य का हृदय भय और विस्मय से काँप उठा!
चण्डी-मन्दिर में सर्वस्व बलिदान की पावन गाथा
The Supreme Family Sacrifice at Chandi Temple
घर पहुँचकर वीरवर ने अपनी पत्नी और सोलह वर्षीय पुत्र शक्तिधर को देवी राजलक्ष्मी का सारा वृत्तान्त सुनाया।

पुत्र शक्तिधर ने हर्ष से सिर उठाया: 'मेरा जीवन तो धूल-समान है, पिताजी! सम्राट का जीवन करोड़ों प्रजा की रक्षा करता है! मेरा शीश चण्डी-वेदी पर अर्पण कीजिए!'
सम्राट के लिए प्राण देना क्षत्रिय-धर्म का परम सौभाग्य है!

मध्यरात्रि को पूरा परिवार महाचण्डी के मन्दिर पहुँचा, जहाँ स्तम्भ की ओट में विक्रमादित्य अश्रुपूरित नेत्रों से देख रहे थे।

वीरवर ने खड्ग उठाया और सम्राट की दीर्घायु हेतु मन्त्र पढ़कर अपने पुत्र का शीश वेदी पर समर्पित कर दिया!

पुत्र का बलिदान देख माता ने भी खड्ग से अपना शीश काट लिया, ताकि परलोक में पुत्र अकेला न रहे!

वीरवर ने कहा: 'जिसने परिवार का बलिदान कर दिया, उसे अकेले जीने का कोई अधिकार नहीं!'—और उसने स्वयं अपना शीश काटकर वेदी पर चढ़ा दिया!
सम्राट का शीश-दान और भगवती महाचण्डी का वरदान
Emperor Vikramaditya on the Altar & The Resurrection
स्तम्भ के पीछे से विक्रमादित्य बाहर निकले और तीनों रक्त-रंजित शरीरों को देखकर फूट-फूट कर रो पड़े!
हाय! मेरे जैसे नश्वर राजा के प्राणों के लिए इस निष्पाप कुल का सर्वनाश हो गया!

विक्रमादित्य ने संकल्प किया: 'जो राजा अपनी प्रजा के रक्त पर जीता है, वह राजा नहीं—पिशाच है! यह राज्य मुझे नहीं चाहिए!'

विक्रमादित्य ने अपनी वूट्ज़ खड्ग निकाली और बिना एक क्षण हिचकिचाए अपनी गर्दन पर रख दी!

प्रचण्ड दिव्य प्रकाश के साथ भगवती महाचण्डी प्रकट हुईं और उन्होंने विक्रमादित्य का हाथ पकड़ लिया!
रुक जा, विक्रमादित्य! तेरे इस असीम त्याग और धर्म-निष्ठा ने मुझे पराजित कर दिया! वर माँग!

विक्रमादित्य ने वीरवर के परिवार का जीवन माँगा; देवी ने अमृत छिड़ककर तीनों को तुरन्त सजीव और कान्तिमान बना दिया!

परिवार के होश में आने से पूर्व ही विक्रमादित्य चुपचाप वर्षा के मध्य राजमहल लौट आए।
प्रातःकाल का राज-सभागार और कीर्तिमती का निर्णय
The Sovereign
प्रातःकाल वीरवर ने दरबार में आकर सहज भाव से कहा: 'महाराज! वह रोने वाली स्त्री चली गई है; उज्जयिनी में सब कुशल-मंगल है!'
रात का संकट टल चुका है, देव!

विक्रमादित्य सिंहासन से उतरे, रोते हुए वीरवर को गले लगाया और पूरी सभा के सम्मुख रात के महा-बलिदान का रहस्य खोल दिया!
तुम केवल मेरे प्रहरी नहीं, मेरे प्राण-दाता हो! आज से तुम कर्नाटक प्रान्त के अधिपति हो!

पुतली कीर्तिमती ने राजा भोज को चुनौती दी: 'क्या तुमने कभी किसी साधारण सेवक के लिए वेदी पर अपना शीश रखा है? यदि ऐसा साहस है, तो आगे बढ़ो!'
यदि ऐसा त्याग नहीं, तो इस ग्यारहवीं सीढ़ी से पीछे हटो!

राजा भोज लज्जा और श्रद्धा से नतमस्तक होकर नीचे उतरे और राज्य के सभी सैनिकों के परिजनों हेतु आजीवन पेंशन की घोषणा की। **ग्यारहवाँ दिन सम्पन्न हुआ!**
कल प्रातःकाल हम बारहवीं सीढ़ी पर चरण रखेंगे और बारहवीं पुतली—आनन्दमयी—की अमर गाथा सुनेंगे!