सप्तम पुतली कौशल्या: दो दिव्य उपहार, दरिद्र ब्राह्मण और अक्षय-पात्र का पावन दान
The Seventh Statue: Kaushalya & The Inexhaustible Urn
सप्तम सूर्योदय और कौशल्या का प्रबोधन
The Seventh Dawn & Kaushalya
सप्तम प्रभात की स्वर्णिम रश्मियों ने धारानगरी के राजप्रासाद को आलोकित किया, जहाँ राजा भोज ने पूर्ण निष्ठा से अपनी साधना पूर्ण की।

केसरिया परिधान धारण कर राजा भोज विनीत चरणों से सातवीं सीढ़ी की ओर बढ़े।

जैसे ही राजा का चरण सातवीं सीढ़ी के निकट पहुँचा, संगमरमर का फर्श पुखराज-पीत और स्वर्णिम दिव्य प्रकाश से धधक उठा!

सातवीं कांस्य-पुतली—कौशल्या—की पुखराज आँखें खुलीं और वह स्वर्ण-अक्षय-पात्र हाथ में लिए दिव्य हँसी के साथ सजीव हो उठी!
ठहरो, राजा भोज! इस सातवीं सीढ़ी पर पैर धरने का दुस्साहस मत करो!

राजा भोज ने नतमस्तक होकर हाथ जोड़े और दिव्य अक्षय-कुम्भ धारण की हुई पुतली की ओर देखा।
हे कौशल्या देवि! विक्रमादित्य के किस दान-वीर चरित्र की पावन गाथा आज आप मुझे सुनाना चाहती हैं?

कौशल्या ने स्वर्ण-कलश उठाकर गम्भीर वाणी में कहा:
क्या तुममें विक्रमादित्य जैसा असीम दान-भाव है, जब देवराज इन्द्र से प्राप्त कामधेनु-समान अक्षय-पात्र और सुवर्ण-शंख दोनों दिव्य उपहार उन्होंने एक दरिद्र ईर्ष्यालु ब्राह्मण को बिना संकोच सौंप दिए थे?
शिप्रा तट पर विश्व-कल्याण यज्ञ और देवराज इन्द्र का वरदान
The Vishwa-Kalyana Yajna & Indra
प्राचीन उज्जयिनी में पवित्र शिप्रा नदी के तट पर सम्राट विक्रमादित्य ने समस्त आर्यावर्त के दुर्भिक्ष-निवारण हेतु महा-यज्ञ सम्पन्न किया।

यज्ञ की पूर्णाहुति पर आकाश से पारिजात पुष्पों की वर्षा हुई और देवराज इन्द्र ऐरावत-सहित स्वर्णिम मेघ पर प्रकट हुए!

इन्द्रदेव ने दो दिव्य रत्न-उपहार विक्रमादित्य को सौंपे: अनन्त मिष्टान्न देने वाला 'अक्षय-कुम्भ' और अपार स्वर्ण बरसाने वाला 'सुवर्ण-शंख'।
हे चक्रवर्ती सम्राट! इन दिव्य उपहारों से तुम्हारा राज्य सहस्रों वर्षों तक अकाल और निर्धनता से मुक्त रहेगा!

दोनों दिव्य उपहार पवित्र चन्दन-वेदी पर स्थापित हुए, जिनसे अनन्त सौर-तेज और समृद्धि की किरणें फूट रही थीं।

विक्रमादित्य ने हाथ जोड़कर नमन किया: 'यह देव-कृपा समस्त प्रजा के कल्याण के लिए समर्पित है।'
यह ईश्वरीय धरोहर समस्त आर्यावर्त के क्षुधातुर जनों की सेवा में रहेगी!

उज्जयिनी के सभा-भवन में दोनों दिव्य निधियाँ स्थापित की गईं और समस्त प्रजा में उत्सव मनाया गया।
महाराज! इन निधियों से हमारा साम्राज्य अनन्त काल तक समृद्ध रहेगा!
दरिद्र पण्डित देवस्वामी और ईर्ष्या का संताप
The Destitute Brahmin & The Test of Envy
अवन्ती के एक सुदूर ग्राम में दरिद्र विद्वान् देवस्वामी अपनी भूखी पत्नी और बच्चों को फटे बिछौने पर तड़पते देख दुःखी हो रहे थे।

इन्द्र के दिव्य उपहारों का समाचार सुनकर देवस्वामी लाठी टेकते हुए उज्जयिनी की ओर चले, मन में राजाओं के प्रति कड़वाहट थी।
राजा स्वर्ण-महलों में चमत्कारिक कुम्भ रखते हैं, जबकि धर्मात्मा पण्डित सूखी घास पर भूख से मरते हैं!

राजप्रासाद के सिंहद्वार पर साधारण नागरिक के वेश में सम्राट विक्रमादित्य उस थके-हारे लँगड़ाते पण्डित से मिले।

देवस्वामी ने उस अपरिचित से व्यथा कही: 'कहाँ है उज्जयिनी का धर्म? राजा अपनी तिजोरियाँ भरते हैं और विद्वान् भीख माँगते हैं!'

क्रोधित होने के बजाय विक्रमादित्य ने परम आदर से पण्डित का हाथ थामा और उन्हें राज-सभागार में ले आए।
आइए, पण्डित जी! आपके संताप का निवारण आज ही होगा!

विक्रमादित्य ने उस फटेहाल ब्राह्मण को हाथीदांत के राजसी आसन पर बैठाया और चन्दन की माला पहनाकर शीतल जल अर्पित किया।
दिव्य उपहारों की परीक्षा और पण्डित का धर्म-संकट
The Royal Choice & The Overnight Test
विक्रमादित्य ने दोनों दिव्य निधियाँ देवस्वामी के सम्मुख रखीं—स्वर्णिम अक्षय-कुम्भ और जगमगाता सुवर्ण-शंख!
माँगिए, पण्डित जी! इन दोनों में से जो भी निधि आपका मन चाहे, वह इसी क्षण आपकी होगी!

देवस्वामी दोनों उपहारों को देखकर असमंजस में पड़ गए; अनन्त भोजन और अगाध स्वर्ण में से किसे चुनें?
एक ओर भुखमरी का समूल नाश है और दूसरी ओर जीवन-भर का स्वर्ण-ऐश्वर्य!

विक्रमादित्य ने उदारता से कहा: 'आप दोनों उपहार रात-भर के लिए अपनी कुटिया ले जाएँ; परखकर कल प्रातः निर्णय करें!'

कुटिया में अक्षय-कुम्भ को छूते ही षड्रस पकवानों और क्षीर-थालों का अनन्त प्रवाह फूट पड़ा, जिससे पूरे भूखे गाँव को तृप्त कर दिया गया!

जब उन्होंने सुवर्ण-शंख बजाया, तब मणिक, पन्ने और चमचमाती स्वर्ण-मुद्राओं का अम्बार कच्ची मिट्टी के फर्श पर लग गया!

प्रातःकाल देवस्वामी दोनों उपहार लेकर राजसभा लौटे, परन्तु उनका मुख गम्भीर धर्म-संकट और संकोच से झुका हुआ था।
महाराज का अकल्पनीय दान और पण्डित का पश्चाताप
The Double Gift & The Supreme Grant
देवस्वामी ने अश्रुपूरित नेत्रों से कहा: 'मेरी पत्नी भोजन का कुम्भ चाहती है और पुत्र स्वर्ण-शंख के लिए रो रहे हैं! मैं एक को चुनकर दूसरे का हृदय नहीं तोड़ सकता!'
मैं इन दोनों में से किसी एक को चुनने में असमर्थ हूँ, महाराज!

बिना एक पल सोचे विक्रमादित्य आगे बढ़े और दोनों दिव्य निधियाँ उस विस्मय-चकित पण्डित की झोली में रख दीं!

विक्रमादित्य ने गम्भीर वाणी में कहा:
तो दोनों उपहार सदैव के लिए आपके हुए, पण्डित जी! धर्मात्मा राजा किसी निर्धन परिवार को अन्न और ऐश्वर्य के मध्य चुनाव करने के लिए विवश नहीं करता!

देवस्वामी लज्जा और कृतज्ञता के आँसुओं से सम्राट के चरणों में गिर पड़े: 'आप साधारण राजा नहीं—इस पृथ्वी पर साक्षात् धर्म के अवतार हैं!'
मैंने आपके प्रति जो कटु विचार रखे थे, उसके लिए मुझे क्षमा करें, हे दानवीर सम्राट!

विक्रमादित्य ने पण्डित को गले लगाया: 'सच्चा ऐश्वर्य याचक की तृप्ति में है, राजकोष के भण्डारण में नहीं।'

देवस्वामी दिव्य उपहारों के साथ अपने गाँव लौटे और उनका कुल सदा के लिए समृद्ध और धर्मपरायण हो गया।
कौशल्या का निर्णय और राजा भोज का संकोच
Kaushalya
धारानगरी के सभा-भवन में सजीव पुतली कौशल्या ने राजा भोज को गम्भीर पुखराज-नयनों से देखा।

कौशल्या ने अन्तिम चुनौती प्रस्तुत की:
अब कहो, राजा भोज—क्या तुमने कभी देवों से प्राप्त अनमोल अक्षय-पात्र और सुवर्ण-शंख दोनों दिव्य उपहार किसी निर्धन याचक को बिना एक कौड़ी रखे दान दिए हैं? यदि ऐसा महा-दान तुमने किया है, तो कदम बढ़ाओ!

राजा भोज ने लज्जा और श्रद्धा से सिर झुका लिया:
मुझमें विक्रमादित्य जैसा असीम दान-भाव और दोनों दिव्य निधियों को त्यागने की उदारता नहीं है, देवि। मैं इस सातवीं सीढ़ी के भी योग्य नहीं हूँ।

राजा भोज सातवीं सीढ़ी से नीचे उतरे और धारानगरी तथा पूरे मालवा के प्रत्येक नगर में निःशुल्क अन्न-क्षेत्र और सार्वजनिक भण्डार स्थापित करने की आज्ञा दी।

राज्य-भर में अन्न-सत्रों का निर्माण हुआ ताकि कोई भी निर्धन नागरिक भूखा न सोए।

संध्याकाल के शंख गूँज उठे और कौशल्या मन्द मुस्कान के साथ पुनः मौन कांस्य-प्रतिमा बन गई। **सिंहासन बत्तीसी का सातवाँ दिन सम्पन्न हुआ!**
कल प्रातःकाल मैं आठवीं सीढ़ी पर चरण रखूँगा और आठवीं पुतली—सुखाविका—की अमर गाथा सुनूँगा!