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सप्तम पुतली कौशल्या: दो दिव्य उपहार, दरिद्र ब्राह्मण और अक्षय-पात्र का पावन दान

सिंहासन बत्तीसी (३२ पुतलियों की अमर गाथा)• katha

सप्तम पुतली कौशल्या: दो दिव्य उपहार, दरिद्र ब्राह्मण और अक्षय-पात्र का पावन दान

The Seventh Statue: Kaushalya & The Inexhaustible Urn

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दृश्य 1

सप्तम सूर्योदय और कौशल्या का प्रबोधन

The Seventh Dawn & Kaushalya
Golden sunlight streams across the white lotus marble dais toward the 32-step throne

सप्तम प्रभात की स्वर्णिम रश्मियों ने धारानगरी के राजप्रासाद को आलोकित किया, जहाँ राजा भोज ने पूर्ण निष्ठा से अपनी साधना पूर्ण की।

Panel 1
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King Bhoja in sacred saffron silks approaches the seventh step with solemn stride

केसरिया परिधान धारण कर राजा भोज विनीत चरणों से सातवीं सीढ़ी की ओर बढ़े।

Panel 2
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The marble floor erupts with brilliant topaz-golden and solar radiance

जैसे ही राजा का चरण सातवीं सीढ़ी के निकट पहुँचा, संगमरमर का फर्श पुखराज-पीत और स्वर्णिम दिव्य प्रकाश से धधक उठा!

Panel 3
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The seventh carved statue Kaushalya opens her glowing topaz-golden eyes, laughing musically
पुतली कौशल्या
ठहरो, राजा भोज! इस सातवीं सीढ़ी पर पैर धरने का दुस्साहस मत करो!

सातवीं कांस्य-पुतली—कौशल्या—की पुखराज आँखें खुलीं और वह स्वर्ण-अक्षय-पात्र हाथ में लिए दिव्य हँसी के साथ सजीव हो उठी!

पुतली कौशल्या

ठहरो, राजा भोज! इस सातवीं सीढ़ी पर पैर धरने का दुस्साहस मत करो!

Panel 4
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King Bhoja halts in deep reverence with folded hands, gazing at the living bronze maiden
राजा भोज
हे कौशल्या देवि! विक्रमादित्य के किस दान-वीर चरित्र की पावन गाथा आज आप मुझे सुनाना चाहती हैं?

राजा भोज ने नतमस्तक होकर हाथ जोड़े और दिव्य अक्षय-कुम्भ धारण की हुई पुतली की ओर देखा।

राजा भोज

हे कौशल्या देवि! विक्रमादित्य के किस दान-वीर चरित्र की पावन गाथा आज आप मुझे सुनाना चाहती हैं?

Panel 5
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Kaushalya speaks: 'Do you possess the boundless charity and generosity of Vikramaditya?'
पुतली कौशल्या
क्या तुममें विक्रमादित्य जैसा असीम दान-भाव है, जब देवराज इन्द्र से प्राप्त कामधेनु-समान अक्षय-पात्र और सुवर्ण-शंख दोनों दिव्य उपहार उन्होंने एक दरिद्र ईर्ष्यालु ब्राह्मण को बिना संकोच सौंप दिए थे?

कौशल्या ने स्वर्ण-कलश उठाकर गम्भीर वाणी में कहा:

पुतली कौशल्या

क्या तुममें विक्रमादित्य जैसा असीम दान-भाव है, जब देवराज इन्द्र से प्राप्त कामधेनु-समान अक्षय-पात्र और सुवर्ण-शंख दोनों दिव्य उपहार उन्होंने एक दरिद्र ईर्ष्यालु ब्राह्मण को बिना संकोच सौंप दिए थे?

Panel 6
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दृश्य 2

शिप्रा तट पर विश्व-कल्याण यज्ञ और देवराज इन्द्र का वरदान

The Vishwa-Kalyana Yajna & Indra
On the banks of Shipra river, Vikramaditya performs a magnificent Vishwa-Kalyana Yajna

प्राचीन उज्जयिनी में पवित्र शिप्रा नदी के तट पर सम्राट विक्रमादित्य ने समस्त आर्यावर्त के दुर्भिक्ष-निवारण हेतु महा-यज्ञ सम्पन्न किया।

Panel 7
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The skies part with golden light as Lord Indra descends upon a cloud with Parijata petals

यज्ञ की पूर्णाहुति पर आकाश से पारिजात पुष्पों की वर्षा हुई और देवराज इन्द्र ऐरावत-सहित स्वर्णिम मेघ पर प्रकट हुए!

Panel 8
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Lord Indra presents two blazing celestial treasures: the Akshaya-Kumbha and Suvarna-Shankha
देवराज इन्द्र
हे चक्रवर्ती सम्राट! इन दिव्य उपहारों से तुम्हारा राज्य सहस्रों वर्षों तक अकाल और निर्धनता से मुक्त रहेगा!

इन्द्रदेव ने दो दिव्य रत्न-उपहार विक्रमादित्य को सौंपे: अनन्त मिष्टान्न देने वाला 'अक्षय-कुम्भ' और अपार स्वर्ण बरसाने वाला 'सुवर्ण-शंख'।

देवराज इन्द्र

हे चक्रवर्ती सम्राट! इन दिव्य उपहारों से तुम्हारा राज्य सहस्रों वर्षों तक अकाल और निर्धनता से मुक्त रहेगा!

Panel 9
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Close-up of the two miraculous artifacts resting upon the sacred altar

दोनों दिव्य उपहार पवित्र चन्दन-वेदी पर स्थापित हुए, जिनसे अनन्त सौर-तेज और समृद्धि की किरणें फूट रही थीं।

Panel 10
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Vikramaditya bows in humble gratitude before Lord Indra, accepting the gifts for all beings
सम्राट विक्रमादित्य
यह ईश्वरीय धरोहर समस्त आर्यावर्त के क्षुधातुर जनों की सेवा में रहेगी!

विक्रमादित्य ने हाथ जोड़कर नमन किया: 'यह देव-कृपा समस्त प्रजा के कल्याण के लिए समर्पित है।'

सम्राट विक्रमादित्य

यह ईश्वरीय धरोहर समस्त आर्यावर्त के क्षुधातुर जनों की सेवा में रहेगी!

Panel 11
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The two celestial treasures installed upon a sandalwood dais in Ujjayini palace
महामन्त्री
महाराज! इन निधियों से हमारा साम्राज्य अनन्त काल तक समृद्ध रहेगा!

उज्जयिनी के सभा-भवन में दोनों दिव्य निधियाँ स्थापित की गईं और समस्त प्रजा में उत्सव मनाया गया।

महामन्त्री

महाराज! इन निधियों से हमारा साम्राज्य अनन्त काल तक समृद्ध रहेगा!

Panel 12
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दृश्य 3

दरिद्र पण्डित देवस्वामी और ईर्ष्या का संताप

The Destitute Brahmin & The Test of Envy
In a dilapidated mud cottage, Devasvami watches his weeping family shiver on straw mats

अवन्ती के एक सुदूर ग्राम में दरिद्र विद्वान् देवस्वामी अपनी भूखी पत्नी और बच्चों को फटे बिछौने पर तड़पते देख दुःखी हो रहे थे।

Panel 13
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Bitter with poverty, Devasvami takes his wooden staff and journeys toward Ujjayini
पण्डित देवस्वामी
राजा स्वर्ण-महलों में चमत्कारिक कुम्भ रखते हैं, जबकि धर्मात्मा पण्डित सूखी घास पर भूख से मरते हैं!

इन्द्र के दिव्य उपहारों का समाचार सुनकर देवस्वामी लाठी टेकते हुए उज्जयिनी की ओर चले, मन में राजाओं के प्रति कड़वाहट थी।

पण्डित देवस्वामी

राजा स्वर्ण-महलों में चमत्कारिक कुम्भ रखते हैं, जबकि धर्मात्मा पण्डित सूखी घास पर भूख से मरते हैं!

Panel 14
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Outside the palace gates, Vikramaditya in simple citizen's robes encounters the weary Brahmin

राजप्रासाद के सिंहद्वार पर साधारण नागरिक के वेश में सम्राट विक्रमादित्य उस थके-हारे लँगड़ाते पण्डित से मिले।

Panel 15
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Devasvami complains to the disguised king about royal hoarding

देवस्वामी ने उस अपरिचित से व्यथा कही: 'कहाँ है उज्जयिनी का धर्म? राजा अपनी तिजोरियाँ भरते हैं और विद्वान् भीख माँगते हैं!'

Panel 16
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Instead of anger, Vikramaditya smiles with empathy, escorting the scholar inside
विक्रमादित्य
आइए, पण्डित जी! आपके संताप का निवारण आज ही होगा!

क्रोधित होने के बजाय विक्रमादित्य ने परम आदर से पण्डित का हाथ थामा और उन्हें राज-सभागार में ले आए।

विक्रमादित्य

आइए, पण्डित जी! आपके संताप का निवारण आज ही होगा!

Panel 17
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Vikramaditya seats the astonished poor Brahmin upon an ivory throne in the audience hall

विक्रमादित्य ने उस फटेहाल ब्राह्मण को हाथीदांत के राजसी आसन पर बैठाया और चन्दन की माला पहनाकर शीतल जल अर्पित किया।

Panel 18
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दृश्य 4

दिव्य उपहारों की परीक्षा और पण्डित का धर्म-संकट

The Royal Choice & The Overnight Test
Vikramaditya presents both celestial treasures before Devasvami
सम्राट विक्रमादित्य
माँगिए, पण्डित जी! इन दोनों में से जो भी निधि आपका मन चाहे, वह इसी क्षण आपकी होगी!

विक्रमादित्य ने दोनों दिव्य निधियाँ देवस्वामी के सम्मुख रखीं—स्वर्णिम अक्षय-कुम्भ और जगमगाता सुवर्ण-शंख!

सम्राट विक्रमादित्य

माँगिए, पण्डित जी! इन दोनों में से जो भी निधि आपका मन चाहे, वह इसी क्षण आपकी होगी!

Panel 19
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Devasvami gazes between the two artifacts in overwhelming turmoil
पण्डित देवस्वामी
एक ओर भुखमरी का समूल नाश है और दूसरी ओर जीवन-भर का स्वर्ण-ऐश्वर्य!

देवस्वामी दोनों उपहारों को देखकर असमंजस में पड़ गए; अनन्त भोजन और अगाध स्वर्ण में से किसे चुनें?

पण्डित देवस्वामी

एक ओर भुखमरी का समूल नाश है और दूसरी ओर जीवन-भर का स्वर्ण-ऐश्वर्य!

Panel 20
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Vikramaditya smiles warmly: 'Take both artifacts to your cottage tonight; choose tomorrow!'

विक्रमादित्य ने उदारता से कहा: 'आप दोनों उपहार रात-भर के लिए अपनी कुटिया ले जाएँ; परखकर कल प्रातः निर्णय करें!'

Panel 21
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In his humble hut, Devasvami touches the Akshaya-Kumbha, producing endless platters of feast

कुटिया में अक्षय-कुम्भ को छूते ही षड्रस पकवानों और क्षीर-थालों का अनन्त प्रवाह फूट पड़ा, जिससे पूरे भूखे गाँव को तृप्त कर दिया गया!

Panel 22
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Devasvami blows the Suvarna-Shankha; sparkling rubies and gold coins flood his earthen floor

जब उन्होंने सुवर्ण-शंख बजाया, तब मणिक, पन्ने और चमचमाती स्वर्ण-मुद्राओं का अम्बार कच्ची मिट्टी के फर्श पर लग गया!

Panel 23
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At dawn, Devasvami returns to court with head bowed in deep distress

प्रातःकाल देवस्वामी दोनों उपहार लेकर राजसभा लौटे, परन्तु उनका मुख गम्भीर धर्म-संकट और संकोच से झुका हुआ था।

Panel 24
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दृश्य 5

महाराज का अकल्पनीय दान और पण्डित का पश्चाताप

The Double Gift & The Supreme Grant
Devasvami confesses: 'My wife desires the food urn, while my sons weep for the gold conch!'
पण्डित देवस्वामी
मैं इन दोनों में से किसी एक को चुनने में असमर्थ हूँ, महाराज!

देवस्वामी ने अश्रुपूरित नेत्रों से कहा: 'मेरी पत्नी भोजन का कुम्भ चाहती है और पुत्र स्वर्ण-शंख के लिए रो रहे हैं! मैं एक को चुनकर दूसरे का हृदय नहीं तोड़ सकता!'

पण्डित देवस्वामी

मैं इन दोनों में से किसी एक को चुनने में असमर्थ हूँ, महाराज!

Panel 25
•
Without a second's hesitation, Vikramaditya places both celestial treasures into the Brahmin's hands

बिना एक पल सोचे विक्रमादित्य आगे बढ़े और दोनों दिव्य निधियाँ उस विस्मय-चकित पण्डित की झोली में रख दीं!

Panel 26
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Vikramaditya declares: 'Then take both treasures forever!'
सम्राट विक्रमादित्य
तो दोनों उपहार सदैव के लिए आपके हुए, पण्डित जी! धर्मात्मा राजा किसी निर्धन परिवार को अन्न और ऐश्वर्य के मध्य चुनाव करने के लिए विवश नहीं करता!

विक्रमादित्य ने गम्भीर वाणी में कहा:

सम्राट विक्रमादित्य

तो दोनों उपहार सदैव के लिए आपके हुए, पण्डित जी! धर्मात्मा राजा किसी निर्धन परिवार को अन्न और ऐश्वर्य के मध्य चुनाव करने के लिए विवश नहीं करता!

Panel 27
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Devasvami drops to his knees in tears of repentance and reverence
पण्डित देवस्वामी
मैंने आपके प्रति जो कटु विचार रखे थे, उसके लिए मुझे क्षमा करें, हे दानवीर सम्राट!

देवस्वामी लज्जा और कृतज्ञता के आँसुओं से सम्राट के चरणों में गिर पड़े: 'आप साधारण राजा नहीं—इस पृथ्वी पर साक्षात् धर्म के अवतार हैं!'

पण्डित देवस्वामी

मैंने आपके प्रति जो कटु विचार रखे थे, उसके लिए मुझे क्षमा करें, हे दानवीर सम्राट!

Panel 28
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Emperor Vikramaditya embraces the weeping scholar, watching him return to his village

विक्रमादित्य ने पण्डित को गले लगाया: 'सच्चा ऐश्वर्य याचक की तृप्ति में है, राजकोष के भण्डारण में नहीं।'

Panel 29
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Emperor Vikramaditya stands in quiet humility as the scholar departs with the divine treasures

देवस्वामी दिव्य उपहारों के साथ अपने गाँव लौटे और उनका कुल सदा के लिए समृद्ध और धर्मपरायण हो गया।

Panel 30
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दृश्य 6

कौशल्या का निर्णय और राजा भोज का संकोच

Kaushalya
Back in Dharanagari palace, Kaushalya looks directly at King Bhoja with glowing topaz-golden eyes

धारानगरी के सभा-भवन में सजीव पुतली कौशल्या ने राजा भोज को गम्भीर पुखराज-नयनों से देखा।

Panel 31
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Kaushalya challenges: 'Have you ever handed both celestial treasures to a beggar?'
पुतली कौशल्या
अब कहो, राजा भोज—क्या तुमने कभी देवों से प्राप्त अनमोल अक्षय-पात्र और सुवर्ण-शंख दोनों दिव्य उपहार किसी निर्धन याचक को बिना एक कौड़ी रखे दान दिए हैं? यदि ऐसा महा-दान तुमने किया है, तो कदम बढ़ाओ!

कौशल्या ने अन्तिम चुनौती प्रस्तुत की:

पुतली कौशल्या

अब कहो, राजा भोज—क्या तुमने कभी देवों से प्राप्त अनमोल अक्षय-पात्र और सुवर्ण-शंख दोनों दिव्य उपहार किसी निर्धन याचक को बिना एक कौड़ी रखे दान दिए हैं? यदि ऐसा महा-दान तुमने किया है, तो कदम बढ़ाओ!

Panel 32
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King Bhoja lowers his head in deep humility and introspection, acknowledging Vikramaditya's charity
राजा भोज
मुझमें विक्रमादित्य जैसा असीम दान-भाव और दोनों दिव्य निधियों को त्यागने की उदारता नहीं है, देवि। मैं इस सातवीं सीढ़ी के भी योग्य नहीं हूँ।

राजा भोज ने लज्जा और श्रद्धा से सिर झुका लिया:

राजा भोज

मुझमें विक्रमादित्य जैसा असीम दान-भाव और दोनों दिव्य निधियों को त्यागने की उदारता नहीं है, देवि। मैं इस सातवीं सीढ़ी के भी योग्य नहीं हूँ।

Panel 33
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King Bhoja steps down from the seventh step, ordering free community kitchens built

राजा भोज सातवीं सीढ़ी से नीचे उतरे और धारानगरी तथा पूरे मालवा के प्रत्येक नगर में निःशुल्क अन्न-क्षेत्र और सार्वजनिक भण्डार स्थापित करने की आज्ञा दी।

Panel 34
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King Bhoja issues royal proclamations establishing free Annakshetras in every city

राज्य-भर में अन्न-सत्रों का निर्माण हुआ ताकि कोई भी निर्धन नागरिक भूखा न सोए।

Panel 35
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Twilight conches sound across Dharanagari as Kaushalya smiles and freezes back into silent bronze
राजा भोज
कल प्रातःकाल मैं आठवीं सीढ़ी पर चरण रखूँगा और आठवीं पुतली—सुखाविका—की अमर गाथा सुनूँगा!

संध्याकाल के शंख गूँज उठे और कौशल्या मन्द मुस्कान के साथ पुनः मौन कांस्य-प्रतिमा बन गई। **सिंहासन बत्तीसी का सातवाँ दिन सम्पन्न हुआ!**

राजा भोज

कल प्रातःकाल मैं आठवीं सीढ़ी पर चरण रखूँगा और आठवीं पुतली—सुखाविका—की अमर गाथा सुनूँगा!

Panel 36
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