द्वादश पुतली आनन्दमयी: मानसरोवर का स्वर्ण-हंस, वन के संन्यासी का कमण्डलु और सहस्र कामधेनु का पावन दान
The Twelfth Statue: Anandamayi & The Golden Swan
द्वादश सूर्योदय और आनन्दमयी का प्रबोधन
The Twelfth Dawn & Anandamayi
बारहवें प्रभात की स्वर्णिम किरणों ने धारानगरी के राजप्रासाद को आलोकित किया, जहाँ राजा भोज ने पूर्ण निष्ठा से अपनी साधना पूर्ण की।

केसरिया परिधान धारण कर राजा भोज विनीत चरणों से बारहवीं सीढ़ी की ओर बढ़े।

जैसे ही राजा का चरण बारहवीं सीढ़ी के निकट पहुँचा, मणिक वेदी अम्बर-स्वर्ण और दिव्य सौर प्रकाश से प्रदीप्त हो उठी!

बारहवीं कांस्य-पुतली—आनन्दमयी—की अम्बर-नेत्र खुले और वह स्वर्ण-हंस हाथ में लिए दिव्य हँसी के साथ सजीव हो उठी!
ठहरो, राजा भोज! इस बारहवीं सीढ़ी पर कदम रखने का दुस्साहस मत करो!

राजा भोज ने नतमस्तक होकर हाथ जोड़े और स्वर्ण-हंस धारण की हुई पुतली की ओर देखा।
हे आनन्दमयी देवि! विक्रमादित्य के किस वैराग्य और ऋषि-सेवा की पावन गाथा आज आप मुझे सुनाना चाहती हैं?

आनन्दमयी ने स्वर्ण-हंस उठाकर गम्भीर वाणी में कहा:
क्या तुममें विक्रमादित्य जैसा असीम आध्यात्मिक वैराग्य और दान-वीरता है, जब मानसरोवर के दिव्य स्वर्ण-हंस को पाकर भी उन्होंने पाँच हजार दुधारू कपिला गायें, अन्न-काफ़िले और अपना राजमुकुट एक वनवासी संन्यासी को बिना संकोच सौंप दिया?
मानसरोवर का स्वर्ण-हंस और वेदों की मधुर वाणी
The Celestial Golden Swan of Manasarovar
उज्जयिनी में पवित्र शिप्रा के तट पर स्थित पद्म-मण्डप में सम्राट विक्रमादित्य प्रातःकालीन ध्यान में लीन थे।

उत्तरी हिमालय के मानसरोवर से उड़कर इन्द्रधनुषी आभा के मध्य एक अलौकिक 'स्वर्ण-हंस' संगमरमर की मुंडेर पर आकर बैठा!

स्वर्ण-हंस ने अपनी चोंच से एक दिव्य सुवर्ण-मोती गिराया और उपनिषदों के वैराग्य और ब्रह्मानन्द के दिव्य मन्त्रों का गान किया।
त्यागेनैकनामृतत्वमानशुः—सच्चा आनन्द त्याग में है, संचय में नहीं!

दूर-दूर के राजाओं और व्यापारियों ने मणियों के सन्दूक देकर हंस को खरीदना चाहा, परन्तु विक्रमादित्य ने विनम्रता से अस्वीकार कर दिया।
महाराज! दस सन्दूक मणियाँ लें और यह स्वर्ण-हंस मुझे दे दें!
देव-कृपा का कोई मूल्य नहीं होता, वणिकवर!

विक्रमादित्य ने हंस को कोई बन्धन नहीं दिया; वे प्रतिदिन कमल-बीज खिलाकर उसका अतिथि-सत्कार करते थे।
यह हंस प्रकृति का पावन दूत है; इसे पिंजरों में बाँधना अधर्म है!

प्रतिदिन प्रातः और सन्ध्या को हंस के वेदमन्त्रों और स्वर्ण-मोतियों से उज्जयिनी का राजमहल पावन बना रहता था।
नैमिषारण्य के महर्षि वेदगर्भ और पांच सौ अनाथ शिष्य
The Destitute Forest Hermit of Naimisharanya
नैमिषारण्य के पवित्र वन में वयोवृद्ध महर्षि वेदगर्भ अपनी पर्णकुटी में पाँच सौ अनाथ बालकों को वेदों और धर्मशास्त्रों की शिक्षा देते थे।

आसन्न शीतकालीन अकाल के भय से आश्रम में न अन्न बचा था और न दूध; महर्षि का फूटा मिट्टी का कमण्डलु खाली पड़ा था!

अपने शिष्यों के प्राण बचाने हेतु पैंसठ वर्षीय महर्षि लाठी टेकते हुए सैकड़ों मील की धूल-भरी यात्रा कर उज्जयिनी की ओर चले।
सम्राट विक्रमादित्य धर्म के रक्षक हैं; वे मेरे पाँच सौ शिष्यों को भूख से मरने नहीं देंगे!

ज्येष्ठ मास की चिलचिलाती दोपहरी में राजद्वार पर पहुँचते ही दुर्बल महर्षि प्यास और थकान से मूर्च्छित होकर गिरने लगे!

साधारण वेश में पहरा दे रहे सम्राट विक्रमादित्य ने आगे बढ़कर महर्षि को धूल पर गिरने से पूर्व ही अपनी भुजाओं में थाम लिया!

विक्रमादित्य ने महर्षि को शीतल कक्ष में ले जाकर स्वयं अपने हाथों से उनके चरण धोए और गुलाब-जल व सुगन्धित शीतल दुग्ध अर्पित किया।
ऋषि का कमण्डलु और सम्राट का महा-संकल्प
The Hermit
स्वस्थ होकर चन्दन-आसन पर बैठे महर्षि ने अपना फूटा कमण्डलु सम्राट के सम्मुख रखा।
महाराज! मुझे अपने लिए कुछ नहीं चाहिए; नैमिषारण्य के पाँच सौ अनाथ शिष्यों के शीतकाल के भोजन हेतु भिक्षा चाहिए!

विक्रमादित्य ने स्वर्ण-हंस द्वारा दिए गए दिव्य सुवर्ण-मोतियों से महर्षि का कमण्डलु ऊपर तक भर दिया।

महर्षि ने मन्द मुस्कान से कहा: 'स्वर्ण के मोती बच्चों को दूध नहीं दे सकते, राजन! वन के गुरुकुल को जीवित गऊएँ और अन्न चाहिए!'
सोने से पेट नहीं भरता; कामधेनु ही शिष्यों का पालन कर सकती है!

ऋषि की निस्वार्थ दृष्टि देखकर विक्रमादित्य ने राज-वेदी के सम्मुख खड़े होकर महा-संकल्प लिया!
जिस राज्य में ब्रह्मचारियों को भिक्षा माँगनी पड़े, वह राज्य धिक्कार योग्य है! आपके आश्रम को मालवा का सर्वश्रेष्ठ ऐश्वर्य प्राप्त होगा!

विक्रमादित्य ने उज्जयिनी के राजकीय गोष्ठों और अन्न-भण्डारों को तुरन्त मुक्त करने की आज्ञा दी।

उज्जयिनी के इतिहास का सबसे विशाल दान-उत्सव आरम्भ हुआ।
पाँच सहस्र कपिला गऊओं और राजमुकुट का पावन दान
The Gift of Five Thousand Cows & Royal Crown
उज्जयिनी के सिंहद्वार के बाहर पाँच हज़ार श्वेत कपिला गऊएँ स्वर्ण-मण्डित सींगों, रेशमी झूलों और कांसी की घंटियों से सुसज्जित होकर खड़ी थीं!

दो सौ विशाल गाड़ियाँ गेहूँ, शुद्ध घृत, शहद, उड़द और जौ से लदी हुई राजमार्ग पर कतारबद्ध थीं।

विक्रमादित्य ने आजीवन गोचर भूमि का ताम्र-पत्र, पचास सशस्त्र रक्षक और अपनी निजी राजसी पालकी महर्षि को सौंप दी।

परम वैराग्य के साथ विक्रमादित्य ने अपने मस्तक से रत्न-जड़ित राजमुकुट उतारकर पालकी में रख दिया: 'यह मुकुट आपके गुरुकुल के मन्दिर की सेवा में समर्पित है!'
विद्या और तपस्या का स्थान राजमुकुट से सदैव ऊँचा है, महर्षि!

स्वर्ण-हंस स्वर्णिम प्रभात में आकाश की ओर उड़ा और उसने विक्रमादित्य पर दिव्य आशीर्वादों की वृष्टि की!

महर्षि वेदगर्भ कृतज्ञता के अश्रुओं से पाँच हज़ार गऊओं के साथ नैमिषारण्य लौटे; नगरवासियों ने मार्ग-भर पुष्प बरसाए।
जब तक सूर्य और चन्द्रमा आकाश में रहेंगे, सम्राट विक्रमादित्य का यश अमर रहेगा!
आनन्दमयी का निर्णय और राजा भोज का संकोच
Anandamayi
धारानगरी के सभा-भवन में सजीव पुतली आनन्दमयी ने राजा भोज को गम्भीर अम्बर-नयनों से देखा।

आनन्दमयी ने बारहवीं सीढ़ी की चुनौती दी:
अब कहो, राजा भोज—क्या तुमने कभी पाँच सहस्र कामधेनु गऊएँ, विशाल अन्न-काफ़िले और अपना राजमुकुट किसी वनवासी संन्यासी को बिना अहंकार के दान दिया है? यदि ऐसा त्याग तुममें है, तो कदम बढ़ाओ! अन्यथा लौट जाओ!

राजा भोज ने लज्जा और श्रद्धा से सिर झुका लिया:
मुझमें विक्रमादित्य जैसा असीम ऋषि-पूजन और अपने राजमुकुट को भी तुच्छ समझकर त्याग देने का वैराग्य नहीं है, देवि। मैं इस बारहवीं सीढ़ी के भी योग्य नहीं हूँ।

राजा भोज बारहवीं सीढ़ी से नीचे उतरे और धारानगरी तथा पूरे मालवा के सभी गुरुकुलों और आश्रमों हेतु कर-मुक्त गोचर भूमि और निःशुल्क अन्न-आपूर्ति की आज्ञा दी।

राज्य-भर के अरण्यों में विद्यार्थियों के पोषण हेतु नित्य दुग्ध-सत्रों का शुभारम्भ हुआ।

संध्याकाल के शंख गूँज उठे और आनन्दमयी मन्द मुस्कान के साथ पुनः मौन कांस्य-प्रतिमा बन गई। **सिंहासन बत्तीसी का बारहवाँ दिन सम्पन्न हुआ!**

शेष बीस कांस्य-पुतलियाँ सन्ध्या की मशालों में जगमगाती रहीं, तेरहवीं पुतली की अमर गाथा की प्रतीक्षा करते हुए।

राजा भोज धर्म के अमर आदर्शों से प्रेरित होकर मौन भाव से राजसभा से प्रस्थान कर गए।
कल प्रातःकाल हम तेरहवीं सीढ़ी पर कदम रखेंगे और तेरहवीं पुतली—रतिप्रिया—की अमर गाथा सुनेंगे!