Skip to content

द्वादश पुतली आनन्दमयी: मानसरोवर का स्वर्ण-हंस, वन के संन्यासी का कमण्डलु और सहस्र कामधेनु का पावन दान

सिंहासन बत्तीसी (३२ पुतलियों की अमर गाथा)• katha

द्वादश पुतली आनन्दमयी: मानसरोवर का स्वर्ण-हंस, वन के संन्यासी का कमण्डलु और सहस्र कामधेनु का पावन दान

The Twelfth Statue: Anandamayi & The Golden Swan

ऑडियो सुनें•0:00 / --:--
0:00 / --:--
दृश्य 1

द्वादश सूर्योदय और आनन्दमयी का प्रबोधन

The Twelfth Dawn & Anandamayi
Morning sunlight streams across the sandstone colonnade onto the 32-step golden throne

बारहवें प्रभात की स्वर्णिम किरणों ने धारानगरी के राजप्रासाद को आलोकित किया, जहाँ राजा भोज ने पूर्ण निष्ठा से अपनी साधना पूर्ण की।

Panel 1
•
King Bhoja in sacred saffron silks approaches the twelfth step of the throne

केसरिया परिधान धारण कर राजा भोज विनीत चरणों से बारहवीं सीढ़ी की ओर बढ़े।

Panel 2
•
The marble dais erupts with brilliant amber-gold and solar radiance

जैसे ही राजा का चरण बारहवीं सीढ़ी के निकट पहुँचा, मणिक वेदी अम्बर-स्वर्ण और दिव्य सौर प्रकाश से प्रदीप्त हो उठी!

Panel 3
•
The twelfth carved statue Anandamayi opens her glowing golden-amber eyes, laughing musically
पुतली आनन्दमयी
ठहरो, राजा भोज! इस बारहवीं सीढ़ी पर कदम रखने का दुस्साहस मत करो!

बारहवीं कांस्य-पुतली—आनन्दमयी—की अम्बर-नेत्र खुले और वह स्वर्ण-हंस हाथ में लिए दिव्य हँसी के साथ सजीव हो उठी!

पुतली आनन्दमयी

ठहरो, राजा भोज! इस बारहवीं सीढ़ी पर कदम रखने का दुस्साहस मत करो!

Panel 4
•
King Bhoja halts in deep reverence with folded hands, gazing at the living bronze maiden
राजा भोज
हे आनन्दमयी देवि! विक्रमादित्य के किस वैराग्य और ऋषि-सेवा की पावन गाथा आज आप मुझे सुनाना चाहती हैं?

राजा भोज ने नतमस्तक होकर हाथ जोड़े और स्वर्ण-हंस धारण की हुई पुतली की ओर देखा।

राजा भोज

हे आनन्दमयी देवि! विक्रमादित्य के किस वैराग्य और ऋषि-सेवा की पावन गाथा आज आप मुझे सुनाना चाहती हैं?

Panel 5
•
Anandamayi speaks: 'Do you possess the boundless spiritual detachment and charity of Vikramaditya?'
पुतली आनन्दमयी
क्या तुममें विक्रमादित्य जैसा असीम आध्यात्मिक वैराग्य और दान-वीरता है, जब मानसरोवर के दिव्य स्वर्ण-हंस को पाकर भी उन्होंने पाँच हजार दुधारू कपिला गायें, अन्न-काफ़िले और अपना राजमुकुट एक वनवासी संन्यासी को बिना संकोच सौंप दिया?

आनन्दमयी ने स्वर्ण-हंस उठाकर गम्भीर वाणी में कहा:

पुतली आनन्दमयी

क्या तुममें विक्रमादित्य जैसा असीम आध्यात्मिक वैराग्य और दान-वीरता है, जब मानसरोवर के दिव्य स्वर्ण-हंस को पाकर भी उन्होंने पाँच हजार दुधारू कपिला गायें, अन्न-काफ़िले और अपना राजमुकुट एक वनवासी संन्यासी को बिना संकोच सौंप दिया?

Panel 6
•
दृश्य 2

मानसरोवर का स्वर्ण-हंस और वेदों की मधुर वाणी

The Celestial Golden Swan of Manasarovar
In the royal lotus pavilion beside the Shipra river, Vikramaditya sits in contemplation

उज्जयिनी में पवित्र शिप्रा के तट पर स्थित पद्म-मण्डप में सम्राट विक्रमादित्य प्रातःकालीन ध्यान में लीन थे।

Panel 7
•
Gliding from Himalayan skies amidst a rainbow aura, the Golden Swan lands upon the balustrade

उत्तरी हिमालय के मानसरोवर से उड़कर इन्द्रधनुषी आभा के मध्य एक अलौकिक 'स्वर्ण-हंस' संगमरमर की मुंडेर पर आकर बैठा!

Panel 8
•
The Golden Swan drops a radiant golden pearl, singing melodic Sanskrit verses of detachment
स्वर्ण-हंस
त्यागेनैकनामृतत्वमानशुः—सच्चा आनन्द त्याग में है, संचय में नहीं!

स्वर्ण-हंस ने अपनी चोंच से एक दिव्य सुवर्ण-मोती गिराया और उपनिषदों के वैराग्य और ब्रह्मानन्द के दिव्य मन्त्रों का गान किया।

स्वर्ण-हंस

त्यागेनैकनामृतत्वमानशुः—सच्चा आनन्द त्याग में है, संचय में नहीं!

Panel 9
•
Traders and visiting kings offer chests of rubies to purchase the miraculous swan
विदेशी वणिक
महाराज! दस सन्दूक मणियाँ लें और यह स्वर्ण-हंस मुझे दे दें!
सम्राट विक्रमादित्य
देव-कृपा का कोई मूल्य नहीं होता, वणिकवर!

दूर-दूर के राजाओं और व्यापारियों ने मणियों के सन्दूक देकर हंस को खरीदना चाहा, परन्तु विक्रमादित्य ने विनम्रता से अस्वीकार कर दिया।

विदेशी वणिक

महाराज! दस सन्दूक मणियाँ लें और यह स्वर्ण-हंस मुझे दे दें!

सम्राट विक्रमादित्य

देव-कृपा का कोई मूल्य नहीं होता, वणिकवर!

Panel 10
•
Vikramaditya gently feeds the celestial swan fresh lotus seeds, treating it as a sacred guest
सम्राट विक्रमादित्य
यह हंस प्रकृति का पावन दूत है; इसे पिंजरों में बाँधना अधर्म है!

विक्रमादित्य ने हंस को कोई बन्धन नहीं दिया; वे प्रतिदिन कमल-बीज खिलाकर उसका अतिथि-सत्कार करते थे।

सम्राट विक्रमादित्य

यह हंस प्रकृति का पावन दूत है; इसे पिंजरों में बाँधना अधर्म है!

Panel 11
•
Every dawn and dusk, the Golden Swan fills the palace corridors with Vedic chants and golden pearls

प्रतिदिन प्रातः और सन्ध्या को हंस के वेदमन्त्रों और स्वर्ण-मोतियों से उज्जयिनी का राजमहल पावन बना रहता था।

Panel 12
•
दृश्य 3

नैमिषारण्य के महर्षि वेदगर्भ और पांच सौ अनाथ शिष्य

The Destitute Forest Hermit of Naimisharanya
In the dense ancient forest of Naimisharanya, Sage Veda-Garbha teaches orphan disciples

नैमिषारण्य के पवित्र वन में वयोवृद्ध महर्षि वेदगर्भ अपनी पर्णकुटी में पाँच सौ अनाथ बालकों को वेदों और धर्मशास्त्रों की शिक्षा देते थे।

Panel 13
•
Facing severe winter drought, the hermit watches his disciples study on empty stomachs

आसन्न शीतकालीन अकाल के भय से आश्रम में न अन्न बचा था और न दूध; महर्षि का फूटा मिट्टी का कमण्डलु खाली पड़ा था!

Panel 14
•
Sage Veda-Garbha journeys on foot across hundreds of miles of dusty roads toward Ujjayini
महर्षि वेदगर्भ
सम्राट विक्रमादित्य धर्म के रक्षक हैं; वे मेरे पाँच सौ शिष्यों को भूख से मरने नहीं देंगे!

अपने शिष्यों के प्राण बचाने हेतु पैंसठ वर्षीय महर्षि लाठी टेकते हुए सैकड़ों मील की धूल-भरी यात्रा कर उज्जयिनी की ओर चले।

महर्षि वेदगर्भ

सम्राट विक्रमादित्य धर्म के रक्षक हैं; वे मेरे पाँच सौ शिष्यों को भूख से मरने नहीं देंगे!

Panel 15
•
On a scorching summer noon outside the palace gates, the exhausted hermit collapses

ज्येष्ठ मास की चिलचिलाती दोपहरी में राजद्वार पर पहुँचते ही दुर्बल महर्षि प्यास और थकान से मूर्च्छित होकर गिरने लगे!

Panel 16
•
Patrolling in simple robes, Vikramaditya catches the falling sage in his strong arms

साधारण वेश में पहरा दे रहे सम्राट विक्रमादित्य ने आगे बढ़कर महर्षि को धूल पर गिरने से पूर्व ही अपनी भुजाओं में थाम लिया!

Panel 17
•
Vikramaditya washes the sage's dust-covered feet with rose water and offers cool sweet milk

विक्रमादित्य ने महर्षि को शीतल कक्ष में ले जाकर स्वयं अपने हाथों से उनके चरण धोए और गुलाब-जल व सुगन्धित शीतल दुग्ध अर्पित किया।

Panel 18
•
दृश्य 4

ऋषि का कमण्डलु और सम्राट का महा-संकल्प

The Hermit
Revived and seated upon a sandalwood dais, Sage Veda-Garbha presents his cracked clay begging bowl
महर्षि वेदगर्भ
महाराज! मुझे अपने लिए कुछ नहीं चाहिए; नैमिषारण्य के पाँच सौ अनाथ शिष्यों के शीतकाल के भोजन हेतु भिक्षा चाहिए!

स्वस्थ होकर चन्दन-आसन पर बैठे महर्षि ने अपना फूटा कमण्डलु सम्राट के सम्मुख रखा।

महर्षि वेदगर्भ

महाराज! मुझे अपने लिए कुछ नहीं चाहिए; नैमिषारण्य के पाँच सौ अनाथ शिष्यों के शीतकाल के भोजन हेतु भिक्षा चाहिए!

Panel 19
•
Vikramaditya fills the hermit's clay bowl with heaps of glowing golden pearls

विक्रमादित्य ने स्वर्ण-हंस द्वारा दिए गए दिव्य सुवर्ण-मोतियों से महर्षि का कमण्डलु ऊपर तक भर दिया।

Panel 20
•
The sage smiles gently: 'Gold cannot give milk to starving children; an ashram needs living cattle!'
महर्षि वेदगर्भ
सोने से पेट नहीं भरता; कामधेनु ही शिष्यों का पालन कर सकती है!

महर्षि ने मन्द मुस्कान से कहा: 'स्वर्ण के मोती बच्चों को दूध नहीं दे सकते, राजन! वन के गुरुकुल को जीवित गऊएँ और अन्न चाहिए!'

महर्षि वेदगर्भ

सोने से पेट नहीं भरता; कामधेनु ही शिष्यों का पालन कर सकती है!

Panel 21
•
Realizing the sage's pure wisdom, Vikramaditya stands tall, making a solemn royal vow
सम्राट विक्रमादित्य
जिस राज्य में ब्रह्मचारियों को भिक्षा माँगनी पड़े, वह राज्य धिक्कार योग्य है! आपके आश्रम को मालवा का सर्वश्रेष्ठ ऐश्वर्य प्राप्त होगा!

ऋषि की निस्वार्थ दृष्टि देखकर विक्रमादित्य ने राज-वेदी के सम्मुख खड़े होकर महा-संकल्प लिया!

सम्राट विक्रमादित्य

जिस राज्य में ब्रह्मचारियों को भिक्षा माँगनी पड़े, वह राज्य धिक्कार योग्य है! आपके आश्रम को मालवा का सर्वश्रेष्ठ ऐश्वर्य प्राप्त होगा!

Panel 22
•
Vikramaditya decrees the mobilization of imperial herds and granaries

विक्रमादित्य ने उज्जयिनी के राजकीय गोष्ठों और अन्न-भण्डारों को तुरन्त मुक्त करने की आज्ञा दी।

Panel 23
•
The entire royal court prepares for the grandest charity mobilization in Ujjayini's history

उज्जयिनी के इतिहास का सबसे विशाल दान-उत्सव आरम्भ हुआ।

Panel 24
•
दृश्य 5

पाँच सहस्र कपिला गऊओं और राजमुकुट का पावन दान

The Gift of Five Thousand Cows & Royal Crown
Five thousand magnificent white Kapila milk-cows with gilded horns and brass bells assembled

उज्जयिनी के सिंहद्वार के बाहर पाँच हज़ार श्वेत कपिला गऊएँ स्वर्ण-मण्डित सींगों, रेशमी झूलों और कांसी की घंटियों से सुसज्जित होकर खड़ी थीं!

Panel 25
•
Two hundred heavy wooden wagons loaded with wheat, ghee, honey, and barley line the highway

दो सौ विशाल गाड़ियाँ गेहूँ, शुद्ध घृत, शहद, उड़द और जौ से लदी हुई राजमार्ग पर कतारबद्ध थीं।

Panel 26
•
Vikramaditya hands the golden deed of perpetual pasture ownership to Sage Veda-Garbha

विक्रमादित्य ने आजीवन गोचर भूमि का ताम्र-पत्र, पचास सशस्त्र रक्षक और अपनी निजी राजसी पालकी महर्षि को सौंप दी।

Panel 27
•
In supreme humility, Vikramaditya removes his own jewel-studded crown, placing it upon the palanquin
सम्राट विक्रमादित्य
विद्या और तपस्या का स्थान राजमुकुट से सदैव ऊँचा है, महर्षि!

परम वैराग्य के साथ विक्रमादित्य ने अपने मस्तक से रत्न-जड़ित राजमुकुट उतारकर पालकी में रख दिया: 'यह मुकुट आपके गुरुकुल के मन्दिर की सेवा में समर्पित है!'

सम्राट विक्रमादित्य

विद्या और तपस्या का स्थान राजमुकुट से सदैव ऊँचा है, महर्षि!

Panel 28
•
The Golden Swan takes flight into the sunrise, showering sparkling blessings over the Emperor

स्वर्ण-हंस स्वर्णिम प्रभात में आकाश की ओर उड़ा और उसने विक्रमादित्य पर दिव्य आशीर्वादों की वृष्टि की!

Panel 29
•
Sage Veda-Garbha weeps in overwhelming gratitude, leading the five-thousand-cow procession
महर्षि वेदगर्भ
जब तक सूर्य और चन्द्रमा आकाश में रहेंगे, सम्राट विक्रमादित्य का यश अमर रहेगा!

महर्षि वेदगर्भ कृतज्ञता के अश्रुओं से पाँच हज़ार गऊओं के साथ नैमिषारण्य लौटे; नगरवासियों ने मार्ग-भर पुष्प बरसाए।

महर्षि वेदगर्भ

जब तक सूर्य और चन्द्रमा आकाश में रहेंगे, सम्राट विक्रमादित्य का यश अमर रहेगा!

Panel 30
•
दृश्य 6

आनन्दमयी का निर्णय और राजा भोज का संकोच

Anandamayi
Back in Dharanagari palace, Anandamayi looks directly at King Bhoja with golden-amber eyes

धारानगरी के सभा-भवन में सजीव पुतली आनन्दमयी ने राजा भोज को गम्भीर अम्बर-नयनों से देखा।

Panel 31
•
Anandamayi challenges: 'Have you ever bestowed five thousand cattle, grain fleets, and your crown upon a hermit?'
पुतली आनन्दमयी
अब कहो, राजा भोज—क्या तुमने कभी पाँच सहस्र कामधेनु गऊएँ, विशाल अन्न-काफ़िले और अपना राजमुकुट किसी वनवासी संन्यासी को बिना अहंकार के दान दिया है? यदि ऐसा त्याग तुममें है, तो कदम बढ़ाओ! अन्यथा लौट जाओ!

आनन्दमयी ने बारहवीं सीढ़ी की चुनौती दी:

पुतली आनन्दमयी

अब कहो, राजा भोज—क्या तुमने कभी पाँच सहस्र कामधेनु गऊएँ, विशाल अन्न-काफ़िले और अपना राजमुकुट किसी वनवासी संन्यासी को बिना अहंकार के दान दिया है? यदि ऐसा त्याग तुममें है, तो कदम बढ़ाओ! अन्यथा लौट जाओ!

Panel 32
•
King Bhoja lowers his head in deep humility and introspection, acknowledging Vikramaditya's detachment
राजा भोज
मुझमें विक्रमादित्य जैसा असीम ऋषि-पूजन और अपने राजमुकुट को भी तुच्छ समझकर त्याग देने का वैराग्य नहीं है, देवि। मैं इस बारहवीं सीढ़ी के भी योग्य नहीं हूँ।

राजा भोज ने लज्जा और श्रद्धा से सिर झुका लिया:

राजा भोज

मुझमें विक्रमादित्य जैसा असीम ऋषि-पूजन और अपने राजमुकुट को भी तुच्छ समझकर त्याग देने का वैराग्य नहीं है, देवि। मैं इस बारहवीं सीढ़ी के भी योग्य नहीं हूँ।

Panel 33
•
King Bhoja steps down from the twelfth step, ordering tax-free dairy grants for all gurukuls

राजा भोज बारहवीं सीढ़ी से नीचे उतरे और धारानगरी तथा पूरे मालवा के सभी गुरुकुलों और आश्रमों हेतु कर-मुक्त गोचर भूमि और निःशुल्क अन्न-आपूर्ति की आज्ञा दी।

Panel 34
•
King Bhoja issues royal edicts granting tax-free pastures and Gaushalas

राज्य-भर के अरण्यों में विद्यार्थियों के पोषण हेतु नित्य दुग्ध-सत्रों का शुभारम्भ हुआ।

Panel 35
•
Twilight conches echo across Dharanagari as Anandamayi smiles and freezes back into silent bronze

संध्याकाल के शंख गूँज उठे और आनन्दमयी मन्द मुस्कान के साथ पुनः मौन कांस्य-प्रतिमा बन गई। **सिंहासन बत्तीसी का बारहवाँ दिन सम्पन्न हुआ!**

Panel 36
•
The remaining twenty celestial statues gleam in the evening torchlight

शेष बीस कांस्य-पुतलियाँ सन्ध्या की मशालों में जगमगाती रहीं, तेरहवीं पुतली की अमर गाथा की प्रतीक्षा करते हुए।

Panel 37
•
King Bhoja departs the throne hall in quiet contemplation, inspired by Vikramaditya's Dharma
राजा भोज
कल प्रातःकाल हम तेरहवीं सीढ़ी पर कदम रखेंगे और तेरहवीं पुतली—रतिप्रिया—की अमर गाथा सुनेंगे!

राजा भोज धर्म के अमर आदर्शों से प्रेरित होकर मौन भाव से राजसभा से प्रस्थान कर गए।

राजा भोज

कल प्रातःकाल हम तेरहवीं सीढ़ी पर कदम रखेंगे और तेरहवीं पुतली—रतिप्रिया—की अमर गाथा सुनेंगे!

Panel 38
•