षोडश पुतली मनमोहिनी: पाताल-लोक का सिंहासन, नाग-राजकुमारी और आत्म-बलिदान की अमर मणि
The Sixteenth Statue: Manmohini & The Netherworld Jewel
षोडश सूर्योदय और मनमोहिनी का प्रबोधन
The Sixteenth Dawn & Manmohini
सोलहवें प्रभात की स्वर्णिम किरणों ने धारानगरी के राजप्रासाद को आलोकित किया, जहाँ राजा भोज ने द्वितीय सत्र (सीज़न २) के समापन हेतु विशेष तपस्या पूर्ण की।

केसरिया परिधान धारण कर राजा भोज विनीत चरणों से सोलहवीं सीढ़ी—सिंहासन के मध्य-शिखर—की ओर बढ़े।

जैसे ही राजा का चरण सोलहवीं सीढ़ी के निकट पहुँचा, मणिक वेदी जामुनी-नीलम और प्रचण्ड स्वर्णिम दिव्य प्रकाश से प्रदीप्त हो उठी!

सोलहवीं कांस्य-पुतली—मनमोहिनी—की जामुनी आँखें खुलीं और वह सिंह-मुद्रा व दिव्य नागमणि हाथ में लिए दिव्य हँसी के साथ सजीव हो उठी!
ठहरो, राजा भोज! इस सोलहवीं सीढ़ी पर कदम रखने का दुस्साहस मत करो!

राजा भोज ने नतमस्तक होकर हाथ जोड़े और नागमणि धारण की हुई पुतली की ओर देखा।
हे मनमोहिनी देवि! विक्रमादित्य के किस पाताल-पराक्रम और निष्काम त्याग की अमर गाथा आज आप मुझे सुनाना चाहती हैं?

मनमोहिनी ने प्रदीप्त नागमणि उठाकर गम्भीर वाणी में कहा:
क्या तुममें विक्रमादित्य जैसा पाताल-पराक्रम और निष्काम धर्म है, जब एक निर्दोष नाग-राजकुमारी की रक्षा हेतु वे पाताल-लोक में उतरे, दुष्ट असुर सेनापति का संहार किया और अमर नागमणि व राजकुमारी का विवाह-प्रस्ताव बिना किसी लोभ के ठुकरा दिया?
शिप्रा के गुप्त कन्दरा में नाग-राजकुमारी का क्रन्दन
The Weeping Naga Princess of Shipra Gorge
चाँदनी रात में सम्राट विक्रमादित्य शिप्रा नदी के बीहड़ पथरीले कछार में गुप्त पहरे पर भ्रमण कर रहे थे।

गरजते जलप्रपात के पीछे एक गुप्त पाताल-गुहा से आर्तनाद सुनकर विक्रमादित्य जल-धार को चीरते हुए भीतर प्रविष्ट हुए।

गुहा के भीतर नागराज वासुकि की रूपवती पुत्री—राजकुमारी कुमुद्वती—मस्तक पर नाग-रत्न धारण किए फूट-फूट कर रो रही थी।

राजकुमारी ने बताया कि पाताल के दुष्ट असुर सेनापति शंखचूड़ ने उनके पिता को बन्दी बना लिया है और बलपूर्वक विवाह का षड्यन्त्र रचा है!
यदि कोई शूरवीर उस दानव का वध नहीं करेगा, तो पाताल और भूलोक दोनों पर घोर अन्धकार छा जाएगा!

विक्रमादित्य ने अपनी वूट्ज़ तलवार म्यान से निकाली: 'भय छोड़ो, राजकुमारी! विक्रमादित्य के रहते किसी भी निर्दोष कन्या का अपमान नहीं हो सकता!'
मुझे पाताल-लोक का मार्ग दिखाओ!

राजकुमारी के निर्देश पर विक्रमादित्य ने शिप्रा के तल में घूमते हुए पाताल-भँवर में निर्भय होकर छलांग लगा दी!
पाताल-लोक का अलौकिक दृश्य और भोगवती का दुर्ग
The Descent into Patala Loka
पाताल-लोक का अलौकिक दृश्य प्रकट हुआ: विशाल स्फटिक स्तम्भ, रजत-जल की नदियाँ और जगमगाते मणिक-प्रासाद!

विक्रमादित्य और राजकुमारी भोगवती के काले ओब्सिडियन पाषाण-दुर्ग के सम्मुख पहुँचे, जहाँ दानव पहरेदार तैनात थे।
यही वह दुर्ग है, महाराज, जहाँ मेरे पिता बन्दी हैं!
धैर्य रखें, राजकुमारी! आज पाताल का प्रत्येक बन्धन टूटेगा!

दुर्ग के तलघर में नागराज वासुकि और वृद्ध नाग-प्रधान लाल ऊर्जा की जंजीरों में जकड़े हुए थे।

मुख्य सभागार में असुर सेनापति शंखचूड़ अपनी भारी गदा और काले कवच में भयानक अट्टहास कर रहा था।

शंखचूड़ ने गरजकर कहा: 'मिट्टी का बना एक नश्वर मानव पाताल के अधिपति को ललकारने आया है?!'
मैं तेरी अस्थियाँ इस लावा-कुण्ड में झोंक दूँगा!

विक्रमादित्य के मस्तक का दिव्य तिलक सूर्य की भाँति प्रदीप्त हो उठा; वे युद्ध की मुद्रा में स्थिर खड़े रहे।
अधर्म का दण्ड देने हेतु धर्म का एक सेवक ही पर्याप्त है, असुर!
स्फटिक-सेतु पर द्वन्द्वयुद्ध और असुर सेनापति का संहार
The Netherworld Duel & Asura
शंखचूड़ ने तामसिक माया का प्रयोग किया; काली ज्वालाओं और विषैले ओब्सिडियन पाषाणों की वर्षा होने लगी!

विक्रमादित्य ने वैदिक अस्त्र-विद्या के तेज से अपनी वूट्ज़ तलवार से स्वर्णिम रक्षा-मण्डल रचकर समस्त तमस को भस्म कर दिया!

उबलते लावा के ऊपर बने संकीर्ण स्फटिक-पुल पर दोनों महायोद्धाओं के बीच प्रचण्ड अस्त्र-युद्ध छिड़ गया!

विक्रमादित्य ने विद्युत-वेग से वार कर शंखचूड़ की भारी गदा और खड्ग को टुकड़े-टुकड़े कर दिया!

एक ही अन्तिम निर्णायक प्रहार से विक्रमादित्य ने असुर सेनापति को धराशायी कर पाताल के आतंक का अन्त कर दिया!
अधर्म का नाश हुआ! पाताल अब भयमुक्त है!

मायावी जंजीरें टूटकर बिखर गईं; नागराज वासुकि और समस्त नाग-प्रजा जयघोष करते हुए मुक्त हो गई!
हे चक्रवर्ती सम्राट! आपने पाताल-लोक के वंश को विनाश से बचा लिया!
अमर नागमणि का उपहार और निष्काम त्याग
The Nagaratna & Supreme Renunciation
भोगवती का पाताल-दरबार पुनः मरकत-मणियों और पुष्पों की सुगन्ध से जगमगा उठा।

नागराज वासुकि ने पाताल का सर्वोच्च कुल-रत्न 'अमर नागमणि' थाल में सजाकर विक्रमादित्य को अर्पित किया, जो समस्त विषों को अमृत बनाने और असीम सम्पत्ति देने में समर्थ थी।

साथ ही नागराज ने अपनी सुन्दरी पुत्री कुमुद्वती का पाणिग्रहण करने का विनम्र प्रस्ताव रखा।
यह नागमणि और मेरी पुत्री दोनों को स्वीकार कर हमारा आतिथ्य स्वीकार करें, महाराज!

विक्रमादित्य ने हाथ जोड़कर मन्द मुस्कान से कहा: 'धर्म-रक्षा क्षत्रिय का पावन कर्तव्य है, किसी सौदे का नाम नहीं! राजकुमारी कुमुद्वती मेरी भगिनी के समान पूज्य हैं, और यह नागमणि पाताल की प्रजा की धरोहर है!'
मुझे किसी उपहार या कर की आवश्यकता नहीं है!

समस्त नाग-जाति उस निष्काम सम्राट के चरणों में अश्रुपूरित होकर झुक गई; वासुकि ने विक्रमादित्य को जीवन-भर समस्त विषों से अभेद्य रहने का वरदान दिया।

प्रातःकाल की स्वर्णिम धूप में विक्रमादित्य शिप्रा के जल से बाहर निकले; उनका हृदय आत्म-सन्तोष और शान्ति से परिपूर्ण था।
मनमोहिनी का निर्णय और द्वितीय सत्र (सीज़न २) का पावन समापन
Manmohini
धारानगरी के सभा-भवन में सजीव पुतली मनमोहिनी ने राजा भोज को गम्भीर जामुनी नयनों से देखा।

मनमोहिनी ने सोलहवीं सीढ़ी (मध्य-शिखर) की चुनौती दी:
अब कहो, राजा भोज—क्या तुमने कभी पाताल में उतरकर किसी निर्दोष राजकुमारी की रक्षा की है, असुर का संहार किया है, और नागमणि व राज्य-सुख का प्रस्ताव बिना लोभ के लौटाया है? यदि ऐसा अदम्य पराक्रम और निष्काम शील तुममें है, तो कदम बढ़ाओ! अन्यथा लौट जाओ!

राजा भोज ने लज्जा और श्रद्धा से सिर झुका लिया:
मुझमें विक्रमादित्य जैसा पाताल-पराक्रम, त्रैलोक्य-रक्षा का शौर्य और नागमणि जैसी सम्पदा को तृणवत् त्यागने का वैराग्य नहीं है, देवि। मैं इस सोलहवीं सीढ़ी के भी योग्य नहीं हूँ।

राजा भोज सोलहवीं सीढ़ी से नीचे उतरे और धारानगरी तथा पूरे मालवा में सभी खदानों, जल-स्रोतों और वन्यजीवों की रक्षा हेतु पर्यावरण व सुरक्षा-न्यास स्थापित करने की आज्ञा दी।

राज्य-भर में प्राकृतिक सम्पदा और निर्दोष प्राणियों की रक्षा हेतु विशेष सुरक्षा-परिषदों का गठन हुआ।

संध्याकाल के शंख गूँज उठे और मनमोहिनी मन्द मुस्कान के साथ पुनः मौन कांस्य-प्रतिमा बन गई। **सिंहासन बत्तीसी का सोलहवाँ दिन एवं द्वितीय सत्र (सीज़न २) पूर्ण हुआ!**

बत्तीस में से सोलह पुतलियों ने विक्रमादित्य के अमर धर्म और विवेक की अमर गाथाएँ सुना दीं; सिंहासन का आधा शिखर पार हो चुका था!

राजा भोज त्याग, शौर्य और निष्काम सेवा के उच्चतर सत्यों को आत्मसात करते हुए मौन भाव से राजसभा से प्रस्थान कर गए।
कल प्रातःकाल हम सत्रहवीं सीढ़ी पर कदम रखेंगे और तृतीय सत्र (सीज़न ३: पुतली १७ विद्यावती) का शुभारम्भ करेंगे!